देश की आजादी के वक्त कौन बड़ा था और कौन छोटा, इस बहस में जाए बिना इतना स्पष्ट है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय आंदोलन के वैचारिक ध्वजवाहक थे। पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को गहराई से देखें तो गांधी ने केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं चलाया, बल्कि रचनात्मक कार्यों के माध्यम से जनता को जागृत और संगठित किया। उनका अहिंसा का सिद्धांत निहत्थे, गरीब और कुपोषित लोगों के लिए एक बड़ा संबल बना। इसी जनशक्ति के बल पर उस ताकतवर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती मिली, जिसके साम्राज्य के बारे में कहा जाता था कि उसमें सूरज कभी नहीं डूबता।
1947 में देश आजाद हुआ और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका निभाने वाले अनेक लोगों के सामने उस समय दो रास्ते थे। वे सत्ता की व्यवस्था का हिस्सा बनकर, चुनाव लड़कर और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से देश की सेवा कर सकते थे या गांधी के साथ गांवों में जाकर रचनात्मक कार्यों के जरिए समाज निर्माण का रास्ता चुन सकते थे।
उस समय अधिकांश भारतीयों को सत्ता के स्वाद का अनुभव तक नहीं था। गांधी का प्रभाव इतना व्यापक था कि सत्ता और पद की संभावनाओं के बावजूद अनेक लोग उनके बताए रास्ते पर चल पड़े। यही वे लोग थे, जिन्होंने आजादी के बाद सत्ता से दूर रहकर गांवों, समुदायों और समाज के बीच काम करना चुना।
गांधी के बाद: भुला दिए गए सर्वोदय कार्यकर्ता
दुर्भाग्य से आजादी के महज छह महीने बाद, 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या कर दी गई। इसके बाद देश की राजनीति तेजी से नेहरू के नेतृत्व में आगे बढ़ी। गांधी के साथ रचनात्मक कार्यों के रास्ते पर गए लोगों के लिए सत्ता के केंद्र दिल्ली में कोई ऐसा संरक्षक नहीं बचा, जो उनके विचारों और कार्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में जगह दिला सके। आचार्य कृपलानी, जे. सी. कुमारप्पा और विनोबा भावे जैसे लोगों ने गांधी दर्शन को जीवित रखने और सत्ता तक उसकी आवाज पहुंचाने का प्रयास जरूर किया, लेकिन देश की तत्कालीन प्राथमिकताएं अलग थीं।
भारत को भोजन, ऊर्जा, दवाइयों, रोजगार और शिक्षा की जरूरत थी। सरकार बड़े बांध, सड़कें, नहरें, आईआईटी और आईआईएम जैसी आधुनिक संस्थाएं बनाने में जुट गई। इस विकास मॉडल की अपनी उपलब्धियां थीं, लेकिन गांधी के रास्ते पर गांवों में रचनात्मक कार्य कर रहे सर्वोदय कार्यकर्ता धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श से बाहर होते गए।
बाद के वर्षों में, खासकर चीन के साथ युद्ध और नेहरू के कमजोर स्वास्थ्य तथा निधन के बाद, सर्वोदय कार्यकर्ताओं की सक्रियता फिर दिखाई देने लगी। 1961 में उत्तराखंड में सर्वोदय समूह का उदय हुआ। इसने लोगों को प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और सरकारी नीतियों के खिलाफ जनप्रतिरोध खड़ा किया। पहाड़ी समाज में केंद्र की नीतियों के प्रति असंतोष धीरे-धीरे संगठित स्वर लेने लगा।
संस्थाएं मजबूत हुईं, विचार कमजोर पड़ने लगा
समय के साथ सर्वोदय की अनेक संस्थाएं मजबूत हुईं और कई बड़े गैर-सरकारी संगठनों में बदल गईं। कुछ संस्थाओं का नाम और कागजी ढांचा भले ही गांधीवादी-सर्वोदय बना रहा, लेकिन उनके भीतर गांधी के मूल सिद्धांतों से अलग प्रवृत्तियां भी दिखाई देने लगीं। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, हिंसा और पूंजी के केंद्रीकरण जैसी प्रवृत्तियों ने कुछ संस्थाओं को प्रभावित किया।
यह स्थिति केवल सर्वोदय संस्थाओं तक सीमित नहीं रही। कई वैचारिक संस्थाओं में दूसरी पीढ़ी ने अपने पूर्ववर्तियों के विचारों को उसी रूप में आगे नहीं बढ़ाया। परिणाम यह हुआ कि जिन संस्थाओं की स्थापना सामाजिक परिवर्तन के लिए हुई थी, उनमें से कुछ समय के साथ अपने मूल उद्देश्य से दूर होती गईं।
इसी संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि किसी संस्था का नाम या उसकी विरासत अपने आप उसके मूल विचारों की रक्षा नहीं कर सकती। विचार तभी जीवित रहते हैं, जब उन्हें नई परिस्थितियों में लगातार व्यवहार में उतारा जाए।
उत्तराखंड आंदोलन और गांधीवादी विकास मॉडल
इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड के आंदोलन को देखने की जरूरत है। उत्तराखंड राज्य का आंदोलन केवल एक छोटी प्रशासनिक इकाई बनाने का आंदोलन नहीं था। उसके भीतर केंद्रीकृत विकास मॉडल के खिलाफ स्थानीय, जैविक और विकेंद्रीकृत विकास की आकांक्षा भी मौजूद थी। इस सोच की आधारशिला गांधीवादी सर्वोदय और ग्राम स्वराज की अवधारणाओं में दिखाई देती है।
लेकिन 43 शहादतों के बाद बने राज्य में विकास का मॉडल बड़े पैमाने पर उसी केंद्रीकृत ढांचे की ओर बढ़ा, जिसके कारण पहाड़ के बड़े हिस्से में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पानी और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें आज भी गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। दूसरी ओर, आर्थिक गतिविधियां और संसाधन कुछ चुनिंदा शहरों में अधिक केंद्रित होते जा रहे हैं।
ऐसे में सवाल है कि विकल्प क्या हो सकता है?
इसका एक महत्वपूर्ण उत्तर गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम में मिलता है।
गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम और उत्तराखंड
गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम इस विचार पर आधारित था कि समाज परिवर्तन केवल सरकार बदलने या आंदोलन करने से नहीं होता। गांव, समुदाय और व्यक्ति के स्तर पर लगातार रचनात्मक काम खड़ा करके भी समाज को बदला जा सकता है।
उनके रचनात्मक कार्यक्रम में साम्प्रदायिक एकता, अस्पृश्यता उन्मूलन, नशामुक्ति, खादी, ग्रामोद्योग, स्वच्छता, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, किसान, श्रमिक, आदिवासी और आर्थिक समानता जैसे विषय शामिल थे।
गांधी के लिए खादी केवल वस्त्र नहीं थी। यह उत्पादन के विकेंद्रीकरण, स्थानीय रोजगार और आवश्यक वस्तुओं तथा सेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण की अवधारणा थी। उनका सपना ऐसा गांव था जो अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्वयं पूरा करे और अतिरिक्त उत्पादन के माध्यम से अपनी आय बढ़ाए। यानी गांधी का सपना केवल चरखा चलाने का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर गांव, स्थानीय अर्थव्यवस्था, विकेंद्रीकृत उत्पादन और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था बनाने का था।
उत्तराखंड में आज का गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम
उत्तराखंड में इस विचार को आज की परिस्थितियों के अनुसार नए रूप में समझने की जरूरत है। हिमालय की परिस्थितियां मैदानी भारत से अलग हैं। जल, जंगल, जमीन, खेती, पशुपालन, वन-आधारित आजीविका, स्थानीय कारीगरी, महिला श्रम और सामुदायिक संसाधन यहां केवल अर्थव्यवस्था के साधन नहीं, बल्कि पहाड़ी जीवन के आधार हैं।
इसलिए आज गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम का अर्थ ग्राम स्वराज, स्थानीय रोजगार, जल स्रोतों का संरक्षण, जंगल और जमीन में समुदाय की भागीदारी, महिला शक्ति, नशामुक्ति, स्थानीय उत्पादन, छोटे ग्रामीण उद्योग और प्रकृति के साथ संतुलित विकास हो सकता है।
ग्राम स्वराज को केवल पंचायत चुनाव या प्रशासनिक विकेंद्रीकरण तक सीमित नहीं किया जा सकता। गांवों को सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के बजाय स्थानीय उत्पादन, रोजगार और निर्णय के केंद्र के रूप में विकसित करना होगा। खेती, बागवानी, पशुपालन, हस्तशिल्प, स्थानीय खाद्य पदार्थ और छोटे ग्रामीण उद्यमों को आपस में जोड़ना होगा।
खादी और ग्रामोद्योग की अवधारणा को भी नए अर्थ में अपनाया जा सकता है। उत्तराखंड में ऊन, हस्तशिल्प, मंडुवा, झंगोरा, दालें, फल, मसाले, जड़ी-बूटियां, शहद और वन-आधारित उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार बन सकते हैं। केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं होगा। गांव या ब्लॉक स्तर पर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन की व्यवस्था भी जरूरी होगी।
जल, जंगल और जमीन का सामुदायिक संरक्षण इस मॉडल का दूसरा महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए। नौले-धारे, चाल-खाल, स्प्रिंगशेड, जंगल और चरागाह केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं। वे कृषि, पशुपालन और ग्रामीण जीवन के आधार हैं। इसलिए संरक्षण को आजीविका से अलग देखने के बजाय दोनों को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।
महिलाओं को भी इस पूरी अर्थव्यवस्था के केंद्र में रखना होगा। स्वयं सहायता समूहों को केवल बचत और ऋण तक सीमित रखने के बजाय उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और स्थानीय उद्यमों से जोड़ा जा सकता है। इससे महिलाएं योजनाओं की लाभार्थी भर नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की निर्माता बनेंगी।
नशामुक्ति, स्वच्छता, स्वास्थ्य और शिक्षा को भी सामुदायिक जिम्मेदारी से जोड़ना होगा। स्कूल केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र के केंद्र न रहें, बल्कि स्थानीय जंगल, जल स्रोत, कृषि, जैव विविधता, हस्तशिल्प और स्थानीय ज्ञान से जुड़ें।
किसानों को भी केवल उत्पादक के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्यमी के रूप में देखना होगा। एफपीओ, सहकारी संस्थाओं और सामूहिक विपणन के माध्यम से प्रसंस्करण, भंडारण और सीधे बाजार तक पहुंच की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे स्थानीय उत्पाद का अधिक मूल्य गांव में ही रह सकेगा।
इस पूरे प्रयास में युवाओं की भूमिका निर्णायक होगी। गांव और विद्यालय स्तर पर युवा समूह जल स्रोतों की निगरानी, वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण, स्वच्छता, नशामुक्ति, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय इतिहास-संस्कृति के संरक्षण जैसे कार्यों में भाग ले सकते हैं। इससे गांव से उनका रिश्ता केवल रोजगार पाने या गांव छोड़ने तक सीमित नहीं रहेगा।
सेवा से स्वराज, ग्राम स्वराज से हिमालयी स्वराज
इन प्रयासों का उद्देश्य केवल कुछ योजनाएं चलाना नहीं होना चाहिए। आवश्यकता ऐसे व्यापक रचनात्मक अभियान की है, जिसमें स्वयंसेवक, महिलाएं, युवा, किसान, शिक्षक, पंचायतें, सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय उद्यमी मिलकर काम करें। इसे ‘सेवा से स्वराज’ के विचार से जोड़ा जा सकता है।
गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम का मूल संदेश यही था कि समाज का परिवर्तन केवल सत्ता और कानून के माध्यम से नहीं होता। वह तब होता है, जब सामान्य नागरिक अपने गांव, समाज और पर्यावरण के निर्माण की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है।
उत्तराखंड के संदर्भ में यही विचार ग्राम स्वराज से हिमालयी स्वराज की दिशा में आगे बढ़ सकता है—जहां स्थानीय संसाधनों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो, स्थानीय उत्पादन से स्थानीय रोजगार पैदा हो, महिलाएं और युवा विकास के केंद्र में हों और विकास प्रकृति के साथ संघर्ष करने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े।
गांधी से हिमालय तक की यह यात्रा अतीत को दोहराने की नहीं, बल्कि गांधी के रचनात्मक विचारों को उत्तराखंड की आज की वास्तविकताओं के अनुरूप नए रूप में गढ़ने की यात्रा हो सकती है।
(लेखक सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता तथा उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष हैं)