देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों की मतगणना जारी है। अब तक के रुझानों और नतीजों के अनुसार केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) बहुमत की ओर बढ़ता दिख रहा है और लेफ्ट का आखिरी गढ़ भी ढह गया है। 140 सीटों वाली विधानसभा में यूडीएफ स्पष्ट बढ़त बनाते हुए सत्ता में वापसी की राह पर है।
चुनाव आयोग के ताज़ा रुझानों के अनुसार, यूडीएफ लगभग 90 सीटों पर आगे है और बहुमत के आंकड़े (71 सीटें) से आगे निकलता दिख रहा है। कांग्रेस 63 और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) 27 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) 35 सीटों तक सिमटता दिख रहा है। एनडीए (बीजेपी गठबंधन) 2 सीटों पर आगे है। इन रुझानों से स्पष्ट है कि केरल में 10 साल बाद सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है।
कर्नाटक और तेलंगाना के बाद अब केरल में भी कांग्रेस की सरकार बनती दिख रही है। पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में निराशाजनक प्रदर्शन के बीच यह कांग्रेस के लिए राहत की खबर है। वहीं, केरल में वामपंथी दलों का आख़िरी मजबूत गढ़ भी ढह गया है। 10 साल की सत्ता विरोधी लहर से पार पाने में सीपीएम और सीपीआई नाकाम रही हैं।
पिछले पांच दशकों में यह पहली बार है कि देश के किसी भी राज्य में वामपंथी दलों की सरकार नहीं होगी। इससे राष्ट्रीय राजनीति में लेफ्ट का प्रभाव और कमजोर पड़ सकता है। केरल में एलडीएफ ने मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा, लेकिन सत्ता विरोधी माहौल में उनकी अपनी सीट भी चुनौतीपूर्ण हो गई और कई मंत्रियों पर हार का खतरा मंडरा रहा है।
माइनॉरिटी वोटों के एकजुट होने का फायदा कांग्रेस और यूडीएफ को मिला। लगातार तीसरी बार यूडीएफ की हार से राज्य में बीजेपी के लिए जगह बनने की आशंकाओं को कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भुनाने में सफल रहे। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद हिंदू वोटों को आकर्षित करने की सीपीआई(एम) की कोशिशों ने माइनॉरिटी वोटर्स को और दूर कर दिया।
उत्तर केरल जैसे पारंपरिक गढ़ों में एलडीएफ की हार और अन्य क्षेत्रों में वोट शेयर में गिरावट उसके आधार में बढ़ती नाराज़गी को दर्शाती है। विकास के मुद्दों, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और सोशल मीडिया कैंपेन के बावजूद एलडीएफ इन प्रयासों को वोट में तब्दील नहीं कर सका। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और जंगली जानवरों के हमलों जैसे स्थानीय मुद्दों ने भी एलडीएफ के समर्थन को प्रभावित किया।
कांग्रेस को सेंट्रल केरल में ईसाई मतदाताओं का भी अच्छा समर्थन मिला, जो 2021 में उससे दूर हो गए थे। ईसाई और मुस्लिम समुदायों के बीच मतभेद कम होने से कई सीटों पर यूडीएफ को फायदा मिला और उसका सामाजिक आधार मजबूत हुआ।
यूडीएफ ने इस बार 99 सीटों पर नए चेहरे उतारे और 14 विधायकों के टिकट काटे, जो एक सफल रणनीति साबित होती दिख रही है। तटीय इलाकों में मछुआरा समुदाय की नाराज़गी भी एलडीएफ पर भारी पड़ी। राज्य की करीब 40 सीटें तटीय प्रभाव वाली मानी जाती हैं।
खाड़ी देशों में काम कर रहे प्रवासी मतदाताओं की कम मौजूदगी और गैस आपूर्ति संकट का असर भी चुनाव पर पड़ा। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी वोटर इस बार केरल नहीं लौट सके।
2021 के चुनाव में एलडीएफ ने 99 सीटें जीती थीं और पिनाराई विजयन दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन इस बार एंटी-इनकंबेंसी, स्थानीय मुद्दों और यूडीएफ की मजबूत रणनीति ने एलडीएफ को पीछे धकेल दिया। पिछले 50 वर्षों में राज्य में कोई भी गठबंधन दो बार से ज्यादा सत्ता में नहीं टिक पाया है।
बीजेपी-नीत एनडीए को 2 सीटों पर सीमित सफलता मिलती दिख रही है और वह अब भी राज्य की मुख्यधारा की राजनीति से दूर है। यूडीएफ की सरकार बनने की स्थिति में वी.डी. सतीशन या के.सी. वेणुगोपाल के मुख्यमंत्री बनने की संभावना है।
जैसे-जैसे यूडीएफ की बढ़त मजबूत हुई, पार्टी मुख्यालय में जश्न का माहौल बन गया। वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला सबसे पहले पहुंचने वालों में रहे, जो हरिपद सीट से 10,000 से अधिक वोटों से आगे चल रहे हैं। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं ने जोरदार नारेबाजी की।