पश्चिम बंगाल चुनाव: अधिकारियों के तबादलों और हाई-टेक निगरानी से चुनाव आयोग ने बढ़ाई सख्ती

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने अधिकारियों के फेरबदल और कारों पर लगे निगरानी कैमरों के जरिए सख्ती बढ़ाई है। पूर्व कोलकाता पुलिस आयुक्त सुप्रतिम सरकार को तमिलनाडु का पर्यवेक्षक बनाए जाने पर सवाल उठे हैं, वहीं तकनीकी निगरानी से गड़बड़ियों पर रोक लगाने की कोशिश हो रही है, जिससे निजता को लेकर चिंता भी बढ़ी है।

पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को होने वाले दो चरणों के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने प्रशासनिक फेरबदल और तकनीक आधारित निगरानी के जरिए अपनी पकड़ और मजबूत कर दी है। एक अहम घटनाक्रम में, कोलकाता के पूर्व पुलिस आयुक्त सुप्रतिम सरकार जिन्हें हाल ही आयोग ने पद से हटाया था, को तमिलनाडु में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है। वर्तमान में वे अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (CID) के रूप में कार्यरत हैं। वे बंगाल कैडर के अपने रैंक के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें राज्य के बाहर यह जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, उन्होंने इस तैनाती से छूट की मांग की है और उनका आवेदन अभी लंबित है।

सुप्रतिम सरकार का कोलकाता पुलिस आयुक्त के रूप में कार्यकाल बेहद छोटा रहा। उन्हें 30 जनवरी को नियुक्त किया गया था। लेकिन 16 मार्च को, यानी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के एक दिन बाद, हटा दिया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें CID प्रमुख के रूप में नियुक्त कर दिया। अब उनकी पर्यवेक्षक के रूप में नई तैनाती ने खासकर राज्य प्रशासन के कुछ वर्गों में बहस छेड़ दी है, जो इसे चुनाव आयोग के रुख में विरोधाभास मानते हैं।

अधिकारियों का कहना है कि चुनाव आयोग ने पहले सुप्रतिम सरकार समेत कई अधिकारियों को बंगाल में चुनाव ड्यूटी के लिए अनुपयुक्त बताते हुए उन्हें गैर-चुनावी भूमिकाओं में भेजने को कहा था। लेकिन अब उन्हीं में से कुछ अधिकारियों को अन्य राज्यों में चुनाव पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है।

आयोग ने शुरू में बंगाल कैडर के 15 अधिकारियों को तमिलनाडु, केरल और नगालैंड में पर्यवेक्षक के तौर पर भेजने का आदेश दिया था। बाद में इनमें से पांच अधिकारियों, जिनमें बिधाननगर और सिलीगुड़ी के पुलिस आयुक्त शामिल हैं, के आदेश वापस ले लिए गए। शेष 10 अधिकारियों में से दो ने व्यक्तिगत कारणों से छूट मांगी है, जबकि सुप्रतिम सरकार का आवेदन अभी विचाराधीन है।

इस बीच, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हालिया घटनाओं को लेकर विपक्ष पर हमला तेज कर दिया है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों पर हमले के कथित मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई स्थानीय पुलिस नहीं, बल्कि राज्य के अधीन सीआईडी ने की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में बाहरी तत्व शामिल थे, जिन्हें सीआईडी ने गिरफ्तार किया है।

प्रशासनिक कदमों के साथ-साथ, चुनाव आयोग ने मॉनिटरिंग के लिए पूरे राज्य में व्यापक निगरानी व्यवस्था भी लागू की है। कोलकाता समेत विभिन्न जिलों में कारों पर लगे लाइव IP कैमरे तैनात किए गए हैं, जो चलते-फिरते निगरानी यूनिट में बदल गए हैं।

ये कैमरे, खासकर उन्नत PTZ (पैन-टिल्ट-ज़ूम) तकनीक वाले, स्टैटिक सर्विलांस टीम (SST) और फ्लाइंग सर्विलांस टीम (FST) के वाहनों पर लगाए गए हैं। पहले ऐसे कैमरे केवल क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) तक सीमित थे, लेकिन इस बार इनका इस्तेमाल ज्यादा स्तर पर किया गया है।

यह निगरानी तंत्र नकदी, शराब और हथियारों की अवैध आवाजाही के साथ-साथ मतदाताओं को डराने-धमकाने और हिंसा की घटनाओं पर नजर रखने के लिए तैयार किया गया है। हर कैमरा इंटरनेट या लोकल नेटवर्क के जरिए लाइव फुटेज जिला कंट्रोल रूम और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय तक भेजता है, जिससे रियल-टाइम निगरानी संभव हो पाती है।

राज्यभर में 2,600 से अधिक SST और FST तैनात किए गए हैं, जिनके वाहनों में ये कैमरे लगे हैं। QRT की संख्या और उनकी तैनाती मतदान के करीब कानून-व्यवस्था की स्थिति के आधार पर तय की जाएगी।

चुनाव आयोग का कहना है कि ये कदम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं, लेकिन IP आधारित निगरानी प्रणाली ने निजता और डेटा सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसके लिए कड़े सुरक्षा उपाय जरूरी हैं।

हाल ही भारत में कुछ विदेशी निगरानी उपकरणों पर लगाए गए प्रतिबंध भी इन चिंताओं को दर्शाते हैं। 1 अप्रैल से इंटरनेट आधारित सीसीटीवी कैमरों के लिए एन्क्रिप्शन, फर्मवेयर सुरक्षा और हार्डवेयर गुणवत्ता से जुड़े कड़े प्रमाणन मानदंड लागू कर दिए गए हैं। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जिम्मेदारी से उपयोग किया जाए तो AI-सक्षम IP कैमरे चुनाव निगरानी को काफी मजबूत बना सकते हैं।