नगालैंड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में नगालैंड और मेघालय के विभिन्न गांवों में 47 गैर-काष्ठ (नॉन-टिंबर) वन उत्पादों (NTFP) की पहचान की गई है। ये उत्पाद आदिवासी समुदायों की आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्ययन में इन मूल्यवान वन संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने के मकसद से इनके टिकाऊ उपयोग और प्रबंधन की जरूरत पर जोर दिया गया है।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जंगलों पर निर्भर आदिवासी समुदाय इन संसाधनों का इस्तेमाल भोजन, पेय पदार्थ, औषधियों और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के रूप में घरेलू जरूरतों के लिए करते हैं। अतिरिक्त उत्पादन को स्थानीय बाजारों में बेचकर परिवार अपनी आय बढ़ाते हैं। इस तरह ये उत्पादन इन समुदायों के लिए आजीविका और अतिरिक्त घरेलू आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी दर्ज किया कि किन पौधों के हिस्सों का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है, वे किस मौसम में उपलब्ध होते हैं, कितनी बार उनका संग्रह किया जाता है, संग्रहण के लिए औसतन कितना समय लगता है और ग्रामीणों को इसके लिए कितनी दूरी तय करनी पड़ती है। अध्ययन के अनुसार, मेघालय में बांस की कोपलें सबसे अधिक आय देने वाले उत्पादों में शामिल हैं, जबकि नगालैंड में जंगली काली मिर्च को सबसे अधिक प्रचलित और अधिक आय देने वाला उत्पाद पाया गया।
पूर्वोत्तर में वन उत्पादों की बड़ी भूमिका
पूर्वोत्तर भारत में देश की कुल वनस्पति का 33 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाया जाता है। यह क्षेत्र 100 से अधिक आदिवासी समुदायों का घर है, जो भोजन और आय के लिए वन संसाधनों पर निर्भर हैं। गैर-काष्ठ वन उत्पाद जंगलों पर निर्भर समुदायों की आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनके आर्थिक महत्व को अभी पर्याप्त पहचान नहीं मिली है।
भारत में करीब 3,000 नॉन-टिंबर वन उत्पाद प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन इनमें से केवल 126 बाजार में व्यापक रूप से पहचान बना पाई हैं। यह स्थिति इन उत्पादों की वैज्ञानिक पहचान, आर्थिक मूल्यांकन और बेहतर बाजार व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, नॉन-टिंबर वन उत्पाद दूरदराज के वन क्षेत्रों में रहने वाले वंचित समुदायों के लिए रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा कर सकते हैं। इससे पारंपरिक कृषि के अलावा आय का एक अतिरिक्त स्रोत विकसित किया जा सकता है।
250 परिवारों पर किया गया अध्ययन
इस अध्ययन में 20 गांवों के 250 परिवारों को शामिल किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष इंडियन जर्नल ऑफ इकोलॉजी (Indian Journal of Ecology) में प्रकाशित हुए हैं। यह एक पीयर-रिव्यूड जर्नल है, जिसमें पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता से संबंधित शोध प्रकाशित होते हैं।
इस शोध पत्र के सह-लेखकों में नगालैंड विश्वविद्यालय के मेडजिफेमा कैंपस स्थित स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के लिमासुनेप ओजुकुम, प्रो. संजय दास, प्रो. अमोद शर्मा, प्रो. आर. नखरो, प्रो. एन.के. पाट्रा, प्रो. मनोज दत्ता और एम. जांग्युकाला शामिल हैं।
स्थानीय समुदायों से जुड़े विषयों पर शोध के महत्व को रेखांकित करते हुए नगालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश कुमार पटनायक ने कहा कि विश्वविद्यालय पूर्वोत्तर क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक प्राथमिकताओं से जुड़े महत्वपूर्ण शोध में योगदान दे रहा है।
उन्होंने कहा कि अध्ययन के निष्कर्ष ग्रामीण आजीविका मजबूत करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में वन संसाधनों की विशाल क्षमता को पहचानने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह शोध बेहतर नीतिगत फैसलों और समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग में मदद करेगा, ताकि वर्तमान और भावी पीढ़ियों को इसका लाभ मिल सके।
उत्पादों का इस्तेमाल पोषण और भोजन के लिए
अध्ययन की प्रमुख उपलब्धि 47 गैर-काष्ठ वन उत्पादों की वैज्ञानिक पहचान और वर्गीकरण है। इनमें से अधिकांश उत्पादों का इस्तेमाल पोषण और भोजन के लिए किया जाता है, जिसके बाद औषधीय उपयोग का स्थान है।
नगालैंड विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. संजय दास ने कहा कि भारत की समृद्ध जैव विविधता के बावजूद नॉन-टिंबर वन उत्पादों के आर्थिक मूल्य को अभी पर्याप्त पहचान नहीं मिली है। अध्ययन के माध्यम से नगालैंड और मेघालय के चयनित क्षेत्रों में उपलब्ध प्रमुख नॉन-टिंबर वन उत्पादों की पहचान, उनके संग्रहण और उपयोग के तौर-तरीकों का दस्तावेजीकरण तथा उनके आर्थिक मूल्य का आकलन किया गया है।
उन्होंने कहा कि निष्कर्ष ग्रामीण आजीविका में इन उत्पादों के महत्व और इनके टिकाऊ उपयोग एवं प्रबंधन की आवश्यकता को सामने लाते हैं। अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि नॉन-टिंबर वन उत्पादों का महत्व केवल बाजार से मिलने वाली आय तक सीमित नहीं है। ये उत्पाद पारिस्थितिक सेवाओं, घरेलू जरूरतों और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़े हैं। यही कारण है कि आदिवासी समुदायों के लिए इन वन उत्पादों का महत्व आर्थिक होने के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरणीय भी है।