राजस्थान के भरतपुर जिले की बयाना तहसील में अरावली पर्वत श्रृंखला से सटे खरैरी, बागरैन और खानखेड़ा गांव कभी पान की खेती के लिए पहचाने जाते थे। सदियों से यहां तम्बोली समुदाय पान उगाता आया है और यही खेती इन गांवों की आर्थिक धुरी थी। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में बदलते मौसम ने इस परंपरागत खेती को गहरी चोट पहुंचाई है। अत्यधिक सर्दी, असामान्य गर्मी और अनियमित वर्षा ने पान की खेती को कमजोर कर दिया है, जिसके कारण उत्पादन लगातार घट रहा है और किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
खरैरी गांव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी यहां लगभग पांच सौ लोग पान की खेती से जुड़े थे, आज यह संख्या घटकर सौ के आसपास रह गई है। खेती सिमटने के साथ ही आर्थिक गतिविधियां भी थम गईं। गांव में कभी अलवर-भरतपुर ग्रामीण आंचलिक बैंक की लीड ब्रांच खुली थी जो स्थानीय समृद्धि का संकेत थी। पान का कारोबार के घटते ही बैंक ने भी अपना कामकाज समेट लिया। एक समय तम्बोली समुदाय इतना संपन्न था कि अन्य जातियों को रोजगार देता था और ब्याज पर धन उधार देने का काम भी करता था। आज वही परिवार रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहे हैं।
बदलते मौसम के साथ बदले हालात
खरैरी के किसान विजेन्द्र तम्बोली बताते हैं कि पंद्रह साल पहले तक यहां का मौसम पान के लिए अनुकूल था। न ज्यादा सर्दी पड़ती थी, न तेज गर्मी। बारिश भी समय पर हो जाती थी। पान की बेल पंद्रह फीट तक चढ़ती थी और एक बेल से सौ से अधिक पत्ते मिलते थे। अब स्थिति उलट चुकी है। सर्दियों में तापमान बीस डिग्री से नीचे जाते ही पत्तों पर धब्बे पड़ जाते हैं और वे जल जाते हैं। अधिक सर्दी से शीतलहर का असर पड़ता है, जबकि वर्षा में कमी या असमय बारिश से बेल सूख जाती है। यदि अधिक वर्षा हो जाए तो जड़ों में गलन रोग लग जाता है। पान की फसल में फूल या फल नहीं होते, सिर्फ पत्ते ही आय का आधार हैं। पत्ते खराब हुए तो पूरी मेहनत व्यर्थ।
भरतपुर जिले में बयाना तहसील के खरैरी गांव मेंं पान के खेत में खड़े किसान विजेन्द्र तम्बोली। फोटो: अमरपाल सिंह वर्मा
उत्पादन में गिरावट साफ दिखाई देती है। जहां पहले बेल पंद्रह फीट तक बढ़कर 100–105 पत्ते देती थी, अब मुश्किल से सात–आठ फीट तक पहुंचती है और 70–80 पत्ते ही मिलते हैं। लागत बढ़ी है। बांस, पन्नी, छाया संरचना पर खर्च पहले से ज्यादा है लेकिन आमदनी घट गई है। खेती छोड़ चुके किसान सुरेश कुमार तम्बोली कहते हैं, “जब मेहनत ज्यादा और आमदनी कम हो जाए तो खेती कैसे टिकेगी?” यही कारण है कि तम्बोली समुदाय के अनेक परिवार इस पेशे से विमुख हो गए हैं।
पान की खेती फसल बीमा योजना में नहीं
नीतिगत स्तर पर भी किसानों को राहत नहीं मिल रही। कृषि स्नातक युवा कोमल कुमार तम्बोली बताते हैं कि राजस्थान में पान की खेती फसल बीमा योजना में शामिल नहीं है। जलवायु जोखिम बढ़ रहा है, लेकिन हमें बीमा का संरक्षण नहीं मिलता। वर्षों से मांग कर रहे हैं, पर सुनवाई नहीं होती। इससे किसानों की असुरक्षा और बढ़ गई है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में उन्हें कोई आर्थिक सहारा नहीं मिलता।
बाजार और परिवहन की समस्या अलग है। आसपास कोई मंडी नहीं है जहां पान के पत्ते बेचे जा सकें। किसानों को अपनी उपज लेकर दिल्ली, अलीगढ़, बनारस, आगरा, सहारनपुर और मेरठ जैसे शहरों तक जाना पड़ता है। एक समय गांवों से दिल्ली और आगरा के लिए राजस्थान परिवहन निगम की बसें चलती थीं, जिससे आवागमन आसान था। पिछले एक दशक से यह सुविधा बंद है। अब निजी साधनों पर निर्भरता बढ़ी है, जिससे लागत और जोखिम दोनों बढ़ते हैं।
तीन-चार वर्ष पहले खेती छोड़ चुके गुड्डू तम्बोली कहते हैं कि राज्य स्तर पर पान की खेती को बढ़ावा देने की कोई ठोस योजना नहीं बनी। वे बताते हैं कि कई राज्यों में पान के बरेजा लगाने के लिए अनुदान दिया जाता है। इसके विपरीत राजस्थान में पान उत्पादकों को न अनुदान मिलता है, न प्रशिक्षण और न ही संस्थागत समर्थन।
पलायन कर रह गांव वाले
खेती के संकट ने सामाजिक ढांचे को भी बदल दिया है। पान की खेती सिमटते ही पलायन तेज हो गया। खरैरी, बागरैन और खानखेड़ा से बड़ी संख्या में लोग जयपुर, दिल्ली और अन्य शहरों की ओर चले गए। कोई सिक्योरिटी गार्ड है, कोई हलवाई का सहायक, कोई ऑटो रिक्शा चला रहा है, तो कोई दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है। कोमल कुमार बताते हैं कि उनके कई हमउम्र साथी गांव छोड़ चुके हैं। अब यहां उनका कोई हमउम्र नहीं बचा। वे एक-एक कर नाम गिनाने लगते हैं - उत्तमचंद जयपुर में सुरक्षा गार्ड हैं, महेश हलवाई के यहां काम करते हैं, दिनेश और राजीव ऑटो चलाते हैं, अरविंद और कैलाश दिल्ली में छोटे-मोटे काम कर रहे हैं…। यह सूची लंबी होती जा रही है। गांव में अधिकतर बुजुर्ग ही रह गए हैं।

भरतपुर जिले की बयाना तहसील के खरैरी गांव मेंं पान की खेती छोड़ चुके किसान सुरेश कुमार तम्बोली और गुड्डू तम्बोली। फोटो: अमरपाल सिंह वर्मा
पलायन का असर केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। दर्जनों घरों में ताले लटके हैं, गलियां सूनी हैं। सामुदायिक जीवन की रौनक कम हो गई है। जो परिवार शहरों में गए, वे वहां अस्थायी बस्तियों या किराए के कमरों में रहकर गुजर-बसर कर रहे हैं। कई बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट गई। परंपरागत खेती से जुड़ा कौशल पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता था; अब वह कड़ी टूट रही है।
तम्बोली समुदाय के लिए पान केवल फसल नहीं, पहचान भी था। खेतों में बांस और पन्नी से बने बरेजे, सुबह-सुबह पत्तों की तोड़ाई और दूर-दराज के बाजारों तक आपूर्ति- यह सब स्थानीय संस्कृति का हिस्सा था। आज वही बरेजे जर्जर पड़े हैं या पूरी तरह हटा दिए गए हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अक्सर आंकड़ों में दर्ज होता है, पर यहां उसका चेहरा साफ दिखाई देता है—घटती बेलें, जले हुए पत्ते, खाली घर और शहरों की ओर जाती बसें। कोमल कुमार तम्बोली कहते हैं, यदि समय रहते पान की खेती को बीमा, बाजार, परिवहन और तकनीकी सहयोग से जोड़ा नहीं गया तो संभव है कि अरावली की तलहटी में सदियों से चली आ रही यह परंपरा पूरी तरह इतिहास बन जाए। अभी कुछ किसान डटे हैं, लेकिन अकेले उनके प्रयास से यह खेती नहीं बच सकती।