हिमाचल की नई सेब खरीद नीति से बढ़ी बागवानों की चिंता, 30 बोरी की लिमिट और फार्मर आईडी अनिवार्य करने की तैयारी

हिमाचल प्रदेश सरकार की प्रस्तावित नई एमआईएस नीति से राज्य के सेब उत्पादकों में चिंता बढ़ गई है। नीति में एक बागवान से अधिकतम 30 बोरी सी-ग्रेड सेब खरीद, फार्मर आईडी (एग्रीस्टैक) की अनिवार्यता और खरीद प्रक्रिया के डिजिटलीकरण जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश सरकार की प्रस्तावित मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (MIS) नीति को लेकर राज्य के सेब उत्पादकों और बागवानों में चिंता बढ़ गई है। नई नीति के तहत सेब खरीद की अधिकतम सीमा 30 बोरी निर्धारित करने, फार्मर आईडी को अनिवार्य बनाने तथा अन्य कई नए प्रावधान लागू किए जा सकते हैं।

सरकार 20 जुलाई को होने वाली राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में नई एमआईएस नीति का मसौदा मंजूरी के लिए रख सकती है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो इस वर्ष से ही सी-ग्रेड सेब की खरीद नई व्यवस्था के तहत की जाएगी।

हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक किसानों के नेता और संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान ने रूरल वॉयस को बताया कि केंद्र सरकार वर्ष 2023 में ही एमआईएस योजना से हाथ खींच चुकी है। अब राज्य सरकार भी इस योजना को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उनका कहना है कि प्रस्तावित एमआईएस नीति के तहत एक बागवान से अधिकतम 30 बोरी सी-ग्रेड सेब खरीदने जैसे किसान-विरोधी प्रावधान किए जा सकते हैं। चौहान के मुताबिक, यदि ऐसा होता है तो बड़ी मात्रा में जूस ग्रेड (सी-ग्रेड) सेब खरीद से बाहर रह जाएगा, जिससे हजारों बागवानों को सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

नई नीति के अनुसार पहली बार एमआईएस के तहत सेब बेचने वाले प्रत्येक बागवान के लिए फार्मर आईडी (एग्रीस्टैक) अनिवार्य होगी। इसके साथ ही जमाबंदी और भूमि संबंधी दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे। बिना फार्मर आईडी के सेब की खरीद नहीं होगी। सरकार पूरी खरीद प्रक्रिया को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की तैयारी कर रही है, जहां किसानों का पंजीकरण, दस्तावेजों का सत्यापन और खरीद का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध रहेगा।

नई व्यवस्था के तहत खरीद केंद्रों की संख्या भी पिछले वर्ष की तुलना में कम की जा सकती है। पिछले वर्ष प्रदेशभर में लगभग 300 खरीद केंद्र संचालित किए गए थे। यदि इस बार खरीद केंद्रों की संख्या घटाई जाती है, तो दूरदराज के बागवानों को सेब बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी। इससे परिवहन लागत बढ़ेगी और छोटे तथा सीमांत बागवान सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

किसान संगठनों का कहना है कि यदि एमआईएस में किसी प्रकार का सुधार आवश्यक है, तो सरकार को सभी किसान एवं बागवान संगठनों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों को विश्वास में लेकर व्यापक चर्चा के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए। उनका कहना है कि एमआईएस योजना को कमजोर करने के बजाय इसे अधिक प्रभावी और किसान हितैषी बनाया जाना चाहिए।

वर्ष 1986 से लागू है एमआईएस योजना

वर्ष 1986 में हिमाचल प्रदेश सरकार की मांग पर केंद्र प्रायोजित मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) की शुरुआत की गई थी। इस योजना का उद्देश्य सेब, किन्नू, माल्टा और संतरा जैसे बागवानी उत्पादों के लिए किसानों और बागवानों को न्यूनतम मूल्य सुरक्षा प्रदान करना था, ताकि बाजार में कीमतें गिरने की स्थिति में उनकी आय सुरक्षित रह सके। पिछले लगभग चार दशकों से यह योजना हिमाचल प्रदेश के लाखों बागवानों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बनी हुई है।

केंद्र ने झाड़ा पल्ला

वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने इस योजना को बड़ा झटका दिया। वर्ष 2022-23 तक देशभर में लगभग 22 बागवानी उत्पादों के लिए करीब 1,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाता था, लेकिन बाद में इसे लगभग समाप्त कर केवल 1 लाख रुपये कर दिया गया। इसके बाद योजना का पूरा वित्तीय दायित्व राज्य सरकारों पर आ गया।

1990 में हुआ था बड़ा आंदोलन

एमआईएस के तहत सेब खरीद को लेकर वर्ष 1990 में हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों का सबसे बड़ा आंदोलन हुआ था। उस समय राज्य में भाजपा की सरकार थी और शांता कुमार मुख्यमंत्री थे। उस समय भी सरकार एमआईएस व्यवस्था में बदलाव करना चाहती थी। आंदोलन के बाद सरकार को अपने प्रस्तावित बदलावों पर पुनर्विचार करना पड़ा और एमआईएस व्यवस्था को जारी रखना पड़ा।

अब सभी की निगाहें 20 जुलाई को होने वाली राज्य मंत्रिमंडल की बैठक पर हैं। यदि प्रस्तावित एमआईएस नीति को मंजूरी मिलती है, तो हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों के लिए इस सीजन में खरीद व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वहीं, बागवान संगठनों को उम्मीद है कि सरकार अंतिम निर्णय लेने से पहले उनकी आपत्तियों और सुझावों पर भी विचार करेगी।