जम्मू-कश्मीर के प्रमुख कारोबारी समूह खैबर ग्रुप ने खैबर एक्वाकल्चर के नाम से भारत की सबसे बड़ी एकीकृत रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) आधारित हिमालयन ट्राउट मछली पालन इकाई का शुभारंभ किया है। कंपनी का उद्देश्य अत्याधुनिक मत्स्य पालन तकनीक को स्थानीय किसानों से जोड़ते हुए कश्मीर के ट्राउट उद्योग को एकीकृत और निर्यातोन्मुखी स्वरूप देना है।
यह परियोजना गांदरबल जिले के कंगन स्थित अखाल में सिंध नदी के किनारे 8 एकड़ क्षेत्र में विकसित की गई है। इस पर 100 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया है। वर्तमान में इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 1,500 मीट्रिक टन है, जिसे अगले तीन से पांच वर्षों में बढ़ाकर 7,000 मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस इकाई की हैचरी में प्रतिवर्ष 2 करोड़ फिंगरलिंग (मछली के बच्चे) तैयार करने की क्षमता है। कंपनी के अनुसार, RAS तकनीक के माध्यम से पानी की रीसाइकलिंग की जाती जाता है, जिससे कम पानी में पूरे वर्ष नियंत्रित तापमान पर ट्राउट उत्पादन संभव हो सकेगा।
खैबर एक्वाकल्चर के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक उमर ट्रंबू ने कहा कि यह परियोजना हैचरी, उत्पादन, प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला को एकीकृत करने वाला मॉडल है। उन्होंने बताया कि यह पहल होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (HADP) के तहत 300 से अधिक स्थानीय किसानों को आधुनिक मछली पालन तकनीक और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराएगी। कंपनी का कहना है कि उत्पादन, प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयों के माध्यम से इस परियोजना से क्षेत्र में 3,000 से अधिक परोक्ष रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
खैबर एक्वाकल्चर ने अमेरिका से उच्च गुणवत्ता वाले ट्राउट अंडों (Eyed Ova) तथा डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी की अत्याधुनिक नियंत्रित प्रणालियों का उपयोग किया है। इससे मछलियों की जीवित रहने की दर में 25-30 प्रतिशत तक सुधार, फीड कन्वर्जन रेशियो में कमी तथा रोगाणुओं के संपर्क में कमी आने की उम्मीद है। यह इकाई अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और निर्यात मानकों के अनुरूप विकसित की गई है।
प्रसंस्करण इकाई में मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग (MAP) और अत्यधिक स्वच्छ प्रसंस्करण प्रणाली का उपयोग किया गया है, जिससे ताजी ट्राउट मछली को 10 दिन तक चिलिंग अवस्था में तथा 6 महीने तक फ्रीजिंग अवस्था में सुरक्षित रखा जा सकेगा। कंपनी की योजना वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही से ताजी, चिलिंग और फ्रीजिंग ट्राउट की व्यावसायिक आपूर्ति शुरू करने की है।
मछली पालन के लिए लगाए गए प्रिसीजन चिलिंग सिस्टम पानी का तापमान 10 से 14 डिग्री सेल्सियस के बीच बनाए रखते हैं, जबकि निरंतर ऑक्सीजन आपूर्ति से ट्राउट पालन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन स्तर सुनिश्चित किया जाता है।
कंपनी ने बताया कि परियोजना में पानी की रीसाइकलिंग, जैव सुरक्षा प्रबंधन, जिम्मेदार फीड प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरणीय निगरानी पर आधारित व्यापक स्थिरता ढांचा अपनाया गया है। बढ़ती वैश्विक मांग को देखते हुए कंपनी घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की योजना बना रही है।
आईमार्क (IMARC) के अनुसार, भारत का ट्राउट बाजार वर्ष 2025 में 4,698.7 टन का था, जो 2034 तक 7,964.7 टन तक पहुंचने का अनुमान है। उच्च प्रोटीन और ओमेगा-3 युक्त खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग तथा मछली पालन को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलों से इस क्षेत्र के विस्तार की संभावना बढ़ रही है।