राजस्थान: किसानों का धनिया की खेती से घट रहा रुझान, बुआई क्षेत्र और उत्पादन में कमी

राजस्थान की प्रमुख धनिया मंडी रामगंज में धनिया की आवक लगातार घट रही है। रोग प्रकोप, उत्पादन में गिरावट और सही दाम न मिलने से हाड़ौती क्षेत्र के किसान धनिया छोड़कर लहसुन, चिया और अश्वगंधा जैसी फसलों का रुख कर रहे हैं।

धनिया की खेती करने वाले कोटा जिले के देवली खुर्द गांव के किसान रामनिवास

राजस्थान का हाड़ौती क्षेत्र धनिया की खेती के लिए देश-विदेश में जाना जाता है। इस क्षेत्र में रामगंज मंडी देश की प्रमुख धनिया मंडी है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यहां के किसान धनिया की बजाय अन्य फसलों को प्राथमिकता देने लगे हैं। इस कारण रामगंज मंडी में धनिया की आवक लगातार घटती जा रही है, जो कृषि व्यापार के लिए चिंता का विषय है। 

हाड़ौती क्षेत्र में उगने वाले धनिया की मुख्य विशेषता इसकी सुगंध और रंग है। यहां के धनिया में सुगंध लंबे समय तक बनी रहती है और इसके बीजों का रंग गहरा हरा होता है। देश भर की मसाला कंपनियों में हाड़ौती के धनिया की मांग रहती है।

क्षेत्र और उत्पादन में गिरावट

रबी मौसम में हाड़ौती क्षेत्र की मुख्य और परंपरागत फसल होने के बावजूद हर साल धनिया की बुआई का क्षेत्र और उत्पादन घट रहा है। हाड़ौती क्षेत्र के कृषि अनुसंधान केंद्र से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025–26 में किसानों ने लगभग 35,000 हेक्टेयर क्षेत्र में धनिया की बुआई की है। वहीं, कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022–23 में धनिया का कुल बुआई क्षेत्रफल 87,536 हेक्टेयर था और उत्पादन 1,05,360 टन रहा। लेकिन वर्ष 2024–25 में यह घटकर 39,974 हेक्टेयर रह गया और उत्पादन 51,347 टन तक सीमित हो गया।

धनिया की खेती में घाटा

धनिया की खेती करने वाले रामगंज मंडी क्षेत्र के किसान रामनिवास ने बताया कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से धनिया की खेती करता आ रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने धनिया की बुआई काफी कम कर दी है। इस वर्ष उन्होंने 13 बीघा में धनिया बोया है, जबकि पिछले वर्ष 20 बीघा में बुआई की थी। कुछ वर्षों पहले वह 50-60 बीघा में धनिया की खेती करते थे।

रामनिवास कहते हैं कि बाजार में उचित भाव न मिलने, उत्पादन में गिरावट, और फसल में रोगों से तंग आकर उन्होंने धनिया की खेती कम कर दी। वर्ष 2025 में उन्हें प्रति बीघा केवल 2 क्विंटल उपज मिली और बाजार में 8,400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला, जो काफी कम था। इसके चलते उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा।

रोग का प्रकोप

धनिया की बुआई के क्षेत्र और पैदावार में गिरावट के बारे में कृषि विश्वविद्यालय, कोटा के कृषि अनुसंधान केंद्र, उम्मेदगंज के प्रोफेसर डॉ. बनवारी लाल नागर ने बताया कि 2017–18 के बाद हाड़ौती क्षेत्र में धनिया में अधिक नमी के कारण पत्ता पट्टिका (स्टेम गॉल) रोग का प्रकोप बढ़ा है। इससे पौधा कमजोर हो जाता है और दाना नहीं बन पाता, जिससे 30 से 70 प्रतिशत तक फसल का नुकसान होता है।

डॉ. नागर ने बताया कि रोग से बचाव के लिए एसीआर-1 और एसीआर-2 जैसी प्रतिरोधक किस्में विकसित की गईं, लेकिन इनसे कम उपज के कारण किसानों ने इन्हें नहीं अपनाया। इसके अलावा, फसल में रोग लगने के बाद फसल चक्र नहीं अपनाने से किसानों को और नुकसान हुआ। मंडी में अन्य फसलों के बेहतर दाम मिलने के कारण भी किसान धनिया से दूरी बना रहे हैं।

धनिया की जगह लहसुन, चिया व अश्वगंधा

हाड़ौती क्षेत्र के किसानों ने बताया कि उन्होंने धनिया की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की तरफ रुख किया है। कोटा के किसान कालूराम धाकड़ पहले 10 बीघा में धनिया की खेती करते थे, लेकिन इस वर्ष उन्होंने धनिया की जगह लहसुन, चिया और अश्वगंधा की खेती शुरू कर दी है, जिन्हें वे बेहतर दाम के लिए नीमच (मध्य प्रदेश) की मंडियों में बेचते हैं।

किसान बताते हैं कि धनिया की फसल काफी नाजुक होती है और बारिश या पाले से फसल को नुकसान होता है। इसके बाद मंडी में भी अच्छे भाव नहीं मिलते। धनिया की पैदावार में गिरावट और सही दाम न मिल पाने के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है।

रामगंज मंडी में घटी आवक   

धनिया की खेती घटने से रामगंज मंडी की रौनक भी कम होती जा रही है। मंडी के व्यापारी विनोद धाकड़ का कहना है कि मंडी में धनिया की आवक कम होती जा रही है। सबसे अधिक आवक वर्ष 2017–18 में हुई थी, जब सीजन के दौरान प्रतिदिन 40–45 हजार बोरियां (40 किग्रा की बोरी) आती थीं। अब आवक करीब 25 प्रतिशत तक घट चुकी है। हालांकि, इस वर्ष अब तक पाला या बारिश न होने से बेहतर फसल और आवक की उम्मीद की जा रही है।

अच्छी किस्मों का अभाव, GI टैग का इंतजार

धनिया की रोगमुक्त, बेहतर किस्मों के नए बीज किसानों को नहीं मिल पा रहे हैं, जिसके कारण वे पुराने बीजों की बुआई करते आ रहे हैं। किसान रामनिवास ने बताया कि गेहूं, चना और अन्य फसलों की तरह धनिया की उन्नत किस्मों का विकल्प नहीं हैं। इसलिए किसान अपने खेतों की फसल से ही अगले सीजन के लिए बीज तैयार करते हैं और आपस में आदान-प्रदान कर लेते हैं। धनिया की उन्नत किस्मों के शोध को बढ़ावा देकर नई किस्में किसानों तक पहुंचाने के प्रयास भी बहुत कारगार साबित नहीं हुए हैं।

कृषि विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुसार, राज्य सरकार और कृषि विभाग हाड़ौती क्षेत्र के धनिया को जीआई टैग (भौगोलिक संकेत) दिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। देश में कई क्षेत्र विशेष फसलों को जीआई टैग मिल चुका है, लेकिन इसके बावजूद किसान बाजार और बेहतर भाव के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि जीआई टैग मिलने से हाड़ौती की इस प्रमुख फसल की खेती को कितनी मदद मिल पाती है।