चुनाव प्रचार में जनता के मुद्दे गायब, पिछली सरकार की खामियों या धर्म के आधार पर ही मतदाताओं को लुभाने की कोशिश

लगता है सत्तारूढ़ पार्टियों को 5 साल तक अपने किए गए कार्यों पर भरोसा नहीं रह गया है। राज्यों में सरकार चाहे जिस पार्टी की हो, चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ पार्टियां या तो पिछले सरकार की खामियां गिनाने में व्यस्त हैं या फिर धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है। जाति का भी बोलबाला है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आ रही है, जनता के मुद्दे पार्टियों के प्रचार से गायब होते जा रहे हैं। प्रचार अभियान में बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था, समाज कल्याण जैसे जनता के मुद्दों पर कम ही सुनने को मिल रहा है। कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी यह नहीं कह रही है कि हमने विकास के ये कार्य किए हैं, इसलिए हमें वोट दीजिए।
गृह मंत्री अमित शाह के उत्तर प्रदेश में चल रहे चुनाव अभियान को ही लीजिए। शनिवार को उन्होंने फिर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की बात उठाई। उन्होंने बिना किसी संकोच के सीधे-सीधे यह भी कह दिया कि अगर लोगों ने गलत पार्टी को वोट दिया तो फिर दंगे होंगे। शनिवार को ही गाजियाबाद के मुरादनगर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी मुजफ्फरनगर दंगों का मुद्दा उठाया। बल्कि मतदाताओं को लुभाने के लिए तो वे और पीछे चले गए और बोले, "राम भक्तों के ऊपर गोलियों से जिनकी टोपियां रंगी हो, वे आज शांति और सौहार्द का संदेश दे रहे हैं।" विरोधी दलों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, "एक पार्टी है चाचा-भतीजे की, एक है भाई-बहन की और तीसरी है बुआ-भतीजा की। इनकी पार्टियों में और किसी के लिए जगह नहीं है।" लेकिन अपने पूरे भाषण में योगी ने यह नहीं बताया कि मुरादनगर या गाजियाबाद में विकास के लिए कौन-कौन से काम उन्होंने कराए।
प्रदेश में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। नीति आयोग ने ही पिछले दिनों जो मल्टीडाइमेंशनल गरीबी इंडेक्स जारी किया उसमें उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक गरीबी वाले राज्यों में शामिल किया है। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी इन समस्याओं को दूर करने का कोई रोड मैप नहीं बता रही है। वैसे प्रदेश में भाजपा को सबसे अधिक टक्कर देने वाली समाजवादी पार्टी के नेता भी चुनाव प्रचार में ऐसे किसी रोड मैप की बात नहीं करते हैं।
उत्तराखंड में भी नौकरियों की कमी, जिसके चलते युवाओं को प्रदेश से पलायन करना पड़ता है, उच्च शिक्षण संस्थाओं की कमी, पानी की समस्या, गांवों को सड़कों से जोड़ने की समस्या- यह सब आम जनता के मुद्दे हैं। लेकिन ना तो सत्तारूढ़ भाजपा ना ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस यह बता रही है की इन समस्याओं को दूर करने के लिए वे क्या रणनीति अपनाएंगी। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी 5 वर्षों के अपने काम कम गिना रही है, कांग्रेस की पिछली सरकारों की खामियां अधिक बता रही है। यही स्थिति गोवा और मणिपुर में भी है। मणिपुर में स्थानीय लोगों के लिए ससस्त्र बल कानून (अफस्पा) बड़ा मुद्दा है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस दोनों इस पर खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल एनपीपी ने जरूर कहा है कि वह इस कानून को वापस लेने की मांग करेगी।
ऐसा नहीं कि सिर्फ भाजपा शासित राज्यों में चुनाव प्रचार से जनता के मुद्दे गायब हैं। पंजाब में भी कमोबेश यही स्थिति है। यहां आम आदमी पार्टी के 'मुफ्त' सुविधाओं की घोषणाओं के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस भी उसी राह पर चल पड़ी है। पार्टी यह नहीं बता रही है कि इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी हों या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, या तो 'मुफ्त' की घोषणाएं कर रहे हैं या पिछली अकाली-भाजपा सरकार की खामियां गिना रहे हैं। पांच साल में कांग्रेस सरकार ने प्रदेश में विकास के क्या कार्य किए इसका उल्लेख नेताओं के भाषणों में बहुत कम होता है। यहां तो पार्टी का ज्यादा समय यह तय करने में जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन होगा।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) के अनुसार देश में बेरोजगारी दर लगातार आठ फीसदी के आसपास बनी हुई है। ऐसे में किसी भी चुनाव में बेरोजगारी सबसे अहम मुद्दा होना चाहिए था। गरीबी हो, प्रेस की आजादी हो या कोई और मुद्दा, ग्लोबल इंडेक्स में हम लगातार नीचे रह रहे हैं। लेकिन चुनावों में इनकी कहीं कोई चर्चा नहीं होती है। स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे बेहतर की जाएंगी ताकि भविष्य में कोरोना जैसी किसी और महामारी का सामना आसानी से किया जा सके, इसकी चर्चा कोई नहीं करता। महामारी के दौरान बंद हुई करोड़ों लघु और छोटी औद्योगिक इकाइयों का कैसे रिवाइवल किया जाए, इसकी बात कोई नहीं करता। ना ही कोई यह कहता है कि भविष्य में फिर कभी मजदूरों के पलायन की स्थिति ना आए, उसके लिए उनकी पार्टी की सरकार क्या करेगी।