एशिया के धान उत्पादक क्षेत्रों पर अल नीनो का खतरा, बदलते मौसम पैटर्न से बढ़ी चिंता, जुलाई से दिखने लगेगा असर

अल नीनो परिस्थितियां विकसित होने के कारण 2026 की दूसरी छमाही में उष्णकटिबंधीय धान उत्पादक क्षेत्रों में मौसम संबंधी अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है, जिससे धान, गन्ना, कॉफी और कोको उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जबकि दक्षिण अमेरिका और दक्षिणी चीन के कुछ हिस्सों में अधिक वर्षा का अनुमान है।

वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में विकसित हो रहा अल नीनो मौसम पैटर्न उष्णकटिबंधीय कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विशेष रूप से एशिया के धान उत्पादक देशों में उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी मौसम असामान्य हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार हाल के महीनों में वैश्विक मौसम परिस्थितियां सामान्य और कृषि के लिए अनुकूल रही हैं, लेकिन आने वाले हफ्तों में प्रशांत महासागर में अल नीनो के मजबूत होने के साथ स्थिति तेजी से बदल सकती है। पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में तेजी से वृद्धि के कारण मौसम एजेंसियां अगले 30 से 45 दिनों में आधिकारिक रूप से अल नीनो की घोषणा कर सकती हैं।

एशिया के प्रमुख धान उत्पादक देश इस बदलाव से सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना जताई गई है, जिससे धान की खेती, सिंचाई व्यवस्था और किसानों की आय पर दबाव बढ़ सकता है।

अल नीनो का प्रभाव वैश्विक अनाज और तिलहन उत्पादन की तुलना में उष्णकटिबंधीय कृषि पर अधिक पड़ता है। धान, गन्ना, कॉफी और कोको जैसी फसलें विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि इनका उत्पादन मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता है जहां अल नीनो के दौरान सूखे जैसी परिस्थितियां बनती हैं।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में जुलाई से मौसम में बदलाव दिखाई देना शुरू हो सकता है, जबकि अगस्त से अक्टूबर के बीच इसका असर अधिक स्पष्ट रहने की संभावना है। भारत में कई क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा कमजोर पड़ सकती है। वहीं इंडोनेशिया और मलेशिया में तेजी से शुष्क परिस्थितियां विकसित होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि सितंबर के अंत से फरवरी तक दक्षिण-पूर्व एशिया में वर्षा में सबसे अधिक कमी दर्ज हो सकती है।

कम वर्षा के कारण धान की बुवाई प्रभावित हो सकती है और उत्पादन घट सकता है। मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम ऑयल उत्पादन पर भी असर पड़ने की आशंका है, जिसका असर वैश्विक खाद्य तेल बाजार पर पड़ सकता है। दक्षिणी चीन में इसके विपरीत सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है। इससे बाढ़, फसल नुकसान और कृषि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पैदा हो सकते हैं।

एशिया के अलावा अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में भी अल नीनो का व्यापक असर देखने को मिल सकता है। पश्चिम-मध्य अफ्रीका में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है, जिससे कोको और कॉफी उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि इथियोपिया और तंजानिया सहित पूर्वी-मध्य अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है।

दक्षिण अफ्रीका में वसंत और ग्रीष्मकालीन मौसम के दौरान शुष्क परिस्थितियां कृषि और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। वहीं दक्षिणी ब्राजील और आसपास के क्षेत्रों में 2026-27 के वसंत और ग्रीष्मकाल में सामान्य से अधिक वर्षा होने का अनुमान है।

उत्तरी-पश्चिमी दक्षिण अमेरिका, विशेषकर पेरू, इक्वाडोर और कोलंबिया के कुछ हिस्सों में अल नीनो मजबूत होने के बाद भारी वर्षा हो सकती है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि 2027 की शुरुआत में इन क्षेत्रों में सबसे अधिक बारिश देखने को मिल सकती है। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर ब्राजील में नवंबर से फरवरी के बीच सूखे जैसी स्थिति बनने की संभावना है, जिससे स्थानीय कृषि और जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

प्रत्येक अल नीनो घटना अलग होती है क्योंकि इसके प्रभाव कई समुद्री और वायुमंडलीय कारकों पर निर्भर करते हैं। कुछ मौसम एजेंसियां मौजूदा स्थिति को संभावित “सुपर अल नीनो” बता रही हैं, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों ने अत्यधिक चिंता से बचने की सलाह दी है। उनका कहना है कि सामान्य तौर पर मजबूत अल नीनो और “सुपर” अल नीनो के बीच अंतर बहुत कम होता है और इसका वैश्विक मौसम पर हमेशा बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता।

उत्तर अमेरिका और यूरोप में फिलहाल इसका असर सीमित रहने की संभावना है। आमतौर पर अल नीनो का प्रभाव इन क्षेत्रों में वर्ष के अंतिम महीनों में अधिक दिखाई देता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय उत्तर अमेरिकी कृषि पर किसी बड़े विनाशकारी प्रभाव की आशंका को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए। हालांकि 2026 के अंत और 2027 की शुरुआत में कनाडा और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क सर्दी हो सकती है, जबकि दक्षिणी हिस्सों में अधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।