वर्ष 2025 के अंतिम महीनों में लगातार मासिक गिरावट के बावजूद FAO खाद्य मूल्य सूचकांक (FFPI) का वार्षिक औसत 2024 की तुलना में अधिक रहा। दिसंबर 2025 में सूचकांक 124.3 अंक पर रहा, जो नवंबर की तुलना में 0.6 प्रतिशत कम है। दुग्ध उत्पादों, मांस और वनस्पति तेलों की कीमतों में गिरावट ने अनाज और चीनी की बढ़ती कीमतों के प्रभाव को संतुलित कर दिया। यह सूचकांक दिसंबर 2024 की तुलना में 2.3 प्रतिशत कम और मार्च 2022 के ऐतिहासिक उच्च स्तर से 22.4 प्रतिशत नीचे रहा। हालांकि पूरे वर्ष 2025 में FFPI का औसत 127.2 अंक रहा, जो 2024 की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है।
दिसंबर में FAO अनाज मूल्य सूचकांक बढ़कर 107.3 अंक हो गया। ब्लैक सी क्षेत्र से निर्यात को लेकर नई चिंताओं के चलते गेहूं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को समर्थन मिला, लेकिन अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में अच्छी फसल के कारण कीमतों पर दबाव बना रहा। ब्राजील और अमेरिका में मजबूत निर्यात मांग और एथनॉल उत्पादन बढ़ने से मक्का की कीमतों में तेजी आई। चावल की कीमतों में सभी श्रेणियों में वृद्धि दर्ज की गई, जिसका कारण बेहतर मांग, कटाई का दबाव कम होना और नीतिगत समर्थन रहा। पूरे वर्ष 2025 में अनाज की कीमतें 2024 की तुलना में 4.9 प्रतिशत कम रहीं, जो 2020 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
पिछले महीने वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। अमेरिका से आपूर्ति बढ़ने और ऑस्ट्रेलिया व कनाडा में अधिक उत्पादन के कारण सोयाबीन, रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में गिरावट आई। वहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया में मौसमी उत्पादन में कमी की आशंका के चलते पाम तेल की कीमतों में हल्की बढ़त देखी गई। बावजूद इसके, 2025 में वनस्पति तेलों का औसत मूल्य 17.1 प्रतिशत अधिक रहा, जो तीन वर्षों का उच्च स्तर है।
दिसंबर में सभी श्रेणियों में मांस की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, खासकर पोल्ट्री में। हालांकि पूरे वर्ष 2025 में मांस मूल्य सूचकांक 5.1 प्रतिशत बढ़ा। डेयरी उत्पादों की कीमतों में दिसंबर में तेज गिरावट आई, विशेष रूप से मक्खन और फुल क्रीम मिल्क पाउडर में, क्योंकि यूरोप और ओशिनिया में मौसमी आपूर्ति बढ़ी। इसके बावजूद, 2025 में डेयरी मूल्य औसतन 13.2 प्रतिशत अधिक रहे।
दिसंबर में चीनी की कीमतों में ब्राजील में उत्पादन घटने के कारण उछाल आया, लेकिन पूरे वर्ष 2025 में यह सूचकांक 2020 के बाद सबसे निचले स्तर पर रहा। इसे वैश्विक आपूर्ति की प्रचुरता और भारत में बेहतर उत्पादन संभावनाओं ने संतुलित किया।