चावल उत्पादन में भारत के चीन को पीछे छोड़ने की असल कहानी, उत्पादकता बढ़ाना बड़ी चुनौती  

भारत में चावल की औसत उत्पादकता धान के रूप में 3.5 टन और चावल के रूप में 2.3 टन प्रति हेक्टेयर है। वहीं, चीन में यह उत्पादकता 4 टन प्रति हेक्टेयर है। असली कहानी यही है कि चीन की उत्पादकता भारत से करीब 70 प्रतिशत अधिक है।

पिछले दिनों भारत के विश्व में सबसे बड़े चावल उत्पादक देश का दर्जा हासिल करने को लेकर काफी चर्चा हुई। पिछले साल देश का उत्पादन 15 करोड़ टन पहुंच गया, जबकि चीन का उत्पादन 14.50 करोड़ टन रहा। यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। क्योंकि भारत में जहां चावल का रकबा रिकॉर्ड स्तर पर है, वहीं चीन ने रणनीतिक रूप से अपने चावल के रकबे में कमी की है।

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने चावल के रकबे में 40 लाख हेक्टेयर की कमी की है और उसे 3.2 करोड़ हेक्टेयर से घटाकर 2.8 करोड़ हेक्टेयर पर ले आया है, जबकि भारत में चावल का क्षेत्रफल 4.4 करोड़ हेक्टेयर है। अब आप समझ सकते हैं कि चीन का चावल उत्पादन क्षेत्र भारत से 1.6 करोड़ हेक्टेयर कम है, लेकिन उत्पादन का अंतर केवल 50 लाख टन का है।

भारत में भी लगातार यह कोशिश होती रही है कि चावल का क्षेत्रफल कम किया जाए, खासकर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तेलंगाना सहित उन क्षेत्रों में जहां पानी की अधिक खपत जल संसाधनों का संकट पैदा कर रही है। साथ ही अधिक उत्पादन के कारण केंद्रीय पूल में चावल का रिकॉर्ड भंडार मौजूद है।

दुनिया में सबसे अधिक चावल उत्पादन करना उपलब्धि के साथ-साथ एक चुनौती भी है। भारत में चावल की औसत उत्पादकता 3.5 टन प्रति हेक्टेयर (धान के रूप में) और 2.3 टन प्रति हेक्टेयर (चावल के रूप में) है, जबकि चीन में चावल की उत्पादकता करीब 4 टन प्रति हेक्टेयर है। असली कहानी यही है कि चीन की उत्पादकता भारत से करीब 70 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में केवल सबसे बड़े उत्पादक बनने की तुलना बहुत तर्कसंगत नहीं है।

इसके साथ ही एक अहम तथ्य यह भी है कि जरूरत से अधिक चावल उत्पादन के चलते हम दालों और खाद्य तेलों में आयात पर अधिक निर्भर हो गए हैं। एमएसपी व्यवस्था के तहत देश के अधिकांश हिस्सों में धान की खरीद बेहतर होती है, जबकि खरीफ की अन्य फसलों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसी कारण किसान धान उत्पादन को प्राथमिकता दे रहे हैं।

अधिक उत्पादन के कारण ही हम पिछले कई वर्षों से दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक बने हुए हैं। गैर-बासमती चावल का निर्यात हम अपेक्षाकृत कम कीमतों पर करते हैं, जिसके चलते 200 लाख टन से अधिक चावल का निर्यात हो रहा है। लेकिन हाल में बांग्लादेश को किए गए निर्यात सौदे करीब 32 रुपये प्रति किलो के स्तर पर हुए, जिससे स्पष्ट है कि हम काफी कम कीमत पर चावल निर्यात कर रहे हैं, जबकि चालू खरीफ विपणन सत्र में सरकारी खरीद के तहत चावल की आर्थिक लागत करीब 40 रुपये प्रति किलो रही है। इसलिए 32 रुपये प्रति किलो की दर पर निर्यात सौदे सामान्य नहीं माने जा सकते।

देश के प्रतिष्ठित चावल वैज्ञानिक और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह का कहना है कि चावल उत्पादन के मामले में हमें अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है। उच्च गुणवत्ता वाले चावल, विशेषकर बासमती और अन्य गैर-बासमती खुशबूदार (एरोमैटिक) किस्मों के उत्पादन और निर्यात पर जोर दिया जाना चाहिए। वर्तमान में हम लगभग 90 हजार करोड़ रुपये मूल्य का चावल निर्यात कर रहे हैं, जिसमें करीब 50 हजार करोड़ रुपये की हिस्सेदारी बासमती चावल की है। कुल 200 लाख टन चावल निर्यात में बासमती की मात्रा लगभग 60 लाख टन है, जबकि गैर-बासमती चावल की मात्रा करीब 140 लाख टन है।

इसके साथ ही बासमती चावल का रकबा बढ़ाने की भी पर्याप्त गुंजाइश है, खासकर ज्योग्राफिक इंडिकेशन (जीआई) वाले राज्यों में। पंजाब में लगभग 30 लाख हेक्टेयर में चावल की खेती होती है, लेकिन उसमें बासमती का हिस्सा केवल छह लाख हेक्टेयर है। हरियाणा में 14 लाख हेक्टेयर के कुल चावल क्षेत्र में करीब छह लाख हेक्टेयर में बासमती की खेती होती है। पंजाब में बासमती का रकबा बढ़ाया जा सकता है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और गैर-बासमती धान का क्षेत्र घटाकर उसे अन्य फसलों की ओर मोड़ा जा सकता है।

दूसरे विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सबसे बड़ा उत्पादक बनने से उत्साहित होने के बजाय हमें चीन और भारत के बीच उत्पादकता के अंतर को कम करने पर ध्यान देना चाहिए। औसत उत्पादकता बढ़ाकर देश में धान का कुल रकबा घटाना अधिक व्यावहारिक रणनीति होगी।