अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी, ईरान में जारी राजनीतिक अशांति और मुद्रा अस्थिरता ने भारत के बासमती चावल निर्यात के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन घटनाक्रमों का असर न केवल निर्यात सौदों पर पड़ा है, बल्कि घरेलू बाजार की कीमतों पर भी दिख रहा है।
भारत के बासमती निर्यात बाजार के लिए ईरान की अहमियत बहुत अधिक है। सऊदी अरब और इराक के बाद ईरान भारतीय बासमती का सबसे बड़ा आयातक है। पिछले साल करीब छह अरब डॉलर के बासमती निर्यात में ईरान ने भारत से 75.32 करोड़ डॉलर का बासमती आयात किया था। वहीं सऊदी अरब को 1.20 अरब ड़ॉलर और इराक को85 करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ था। हालांकि यह निर्यात का स्तर प्रत्यक्ष निर्यात है जबकि काफी बड़ी मात्रा में ईरान को सऊदी अरब और यूएई के जरिेये बासमती निर्यात होता है। इसकी वजह प्रतिबंधों के चलते परोक्ष निर्यात को भुगतान के लिए कुछ निर्यातक सुरक्षित मानते हैं।
वहीं चालू साल में अप्रैल से नवंबर के दौरान ईरान को बासमती चावल का निर्यात इराक से अधिक रहा है और इस दौरान 20.9 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ ईरान को 5.99 लाख टन बासमती निर्यात किया गया जबकि इराक को 5.01 लाख टन और सऊदी अरब को इस दौरान 6.70 लाख टन बासमती निर्यात किया गया। इराक और सऊदी अरब को बासमती के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले इस अवधि में गिरावट दर्ज की गई है।
ईरान सराकर बासमती और दूसरी आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए रियायती दर पर विदेशी मुद्रा (डॉलर) उपलब्ध कराती थी लेकिन जनवरी से इसे बंद कर दिया गया है। इसका सीधा असर बासमती निर्यात पर पड़ेगा। वहीं ट्रंप की ओर से ईरान के साथ व्यापार करने पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी के बाद बासमती की खेपों में देरी और भुगतान अटकने की आशंका पैदा हो गई है। ट्रंप के इस फैसले के बाद घरेलू बाजार में बासमती की कीमतों में गिरावट शुरू हो गई है। इस स्थिति में जिन किसानों ने बेहतर दाम की उम्मीद में बासमती धान रोक कर रखा है उनके लिए कीमतों में गिरावट नुकसानदेह साबित होगी।
चावल निर्यात उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ईरान से जुड़े करीब 2,000 करोड़ रुपये के निर्यात भुगतान फिलहाल फंसे हुए हैं। इंटरनेट बंद होने और बैंकिंग चैनलों में दिक्कतों के कारण भारतीय निर्यातकों और ईरानी आयातकों के बीच संचार बाधित हुआ है। नतीजतन नए सौदे लगभग थम गए हैं और बंदरगाहों तथा मिल गोदामों में स्टॉक का दबाव बढ़ गया है। कुछ निर्यातक ईरान जाने वाली खेपों को यूएई जैसे मध्यस्थ रास्तों से भेजने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लागत बढ़ रही है और भुगतान चक्र लंबा हो रहा है।
ईरान से व्यापार में आई बाधा का असर घरेलू कीमतों पर भी पड़ा है। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख मंडियों में थोक बासमती कीमतें पिछले एक हफ्ते में करीब 5–7 फीसदी तक गिर गई हैं। प्रमुख किस्मों के दाम में 5–10 रुपये प्रति किलो की गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारियों का कहना है कि निर्यातकों की खरीद कमजोर पड़ने से बाजार में दबाव बना हुआ है।
निर्यातकों के अनुसार, निर्यात-ग्रेड बासमती, जो इस तिमाही की शुरुआत में करीब 950 डॉलर प्रति टन पर कारोबार कर रहा था, अब 900 डॉलर प्रति टन के आसपास बोला जा रहा है। मिलर्स का कहना है कि मिड-रेंज किस्मों में गिरावट ज्यादा तेज है, जबकि प्रीमियम एज्ड बासमती को अमेरिका और यूरोप से स्थिर मांग के चलते कुछ हद तक सहारा मिला हुआ है। हालांकि, ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक और टैरिफ जोखिम बने रहने से बासमती बाजार का निकट भविष्य फिलहाल कमजोर और अनिश्चित बना हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बासमती निर्यात में बढ़ोतरी तो हुई है, लेकिन इसकी वृद्धि दर अधिक नहीं रही है। वहीं, यूरोप के प्रीमियम बाजार में पाकिस्तान ने बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया है। दूसरी ओर, बासमती के निर्यात दाम बढ़े हैं, लेकिन बासमती धान उत्पादन करने वाले किसानों को मिलने वाले दाम कई साल पहले 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए थे, जो अब घटकर तीन से साढ़े तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही रह गए हैं।