उर्वरक उत्पादन बढ़ाने के लिए अमेरिका का 50 करोड़ डॉलर का कार्यक्रम, होर्मुज संकट से निपटने की तैयारी

पश्चिम एशिया संकट से वैश्विक उर्वरक आपूर्ति प्रभावित होने और कीमतों में तेज उछाल के बीच अमेरिका ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए 50 करोड़ डॉलर के नए कार्यक्रम का ऐलान किया है।

अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस | Pic: USDA

पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते अन्य देशों के साथ-साथ अमेरिका को भी उर्वरकों के मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक आपूर्ति संकट और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के बीच अमेरिका ने घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने के लिए 50 करोड़ डॉलर (500 मिलियन डॉलर) के एक नए कार्यक्रम का ऐलान किया है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का यह कदम ईरान युद्ध के बाद उर्वरक व्यापार में आई बाधाओं और किसानों की बढ़ती उत्पादन लागत के मद्देनजर उठाया गया है। इस पहल का उद्देश्य अमेरिका में नए उर्वरक संयंत्रों की स्थापना के साथ-साथ मौजूदा उत्पादन इकाइयों की क्षमता बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है।

अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने इस कार्यक्रम की घोषणा करते हुए कहा कि ‘फर्टिलाइजर इन्वेस्टमेंट एंड एक्सपैंशन फॉर लॉन्ग टर्म डोमेस्टिक सप्लाई’ (FIELDS) कार्यक्रम के तहत नए उर्वरक संयंत्रों के निर्माण और मौजूदा संयंत्रों के विस्तार के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार की प्राथमिकता उन परियोजनाओं को सहायता देने की है, जिनसे कम समय में उत्पादन शुरू किया जा सकता है या जिनमें पहले से निजी क्षेत्र का निवेश हो चुका है।

कार्यक्रम के तहत नाइट्रोजन, फॉस्फेट, पोटाश, सल्फर और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। विभिन्न परियोजनाओं को 1.5 करोड़ डॉलर से लेकर 15 करोड़ डॉलर तक की सहायता दी जा सकती है।

होर्मुज संकट ने बढ़ाई चिंता

अमेरिका का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया के संघर्ष ने वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही लगभग बंद हो जाने के कारण दुनिया के 30 प्रतिशत से अधिक उर्वरक निर्यात पर असर पड़ा है। पश्चिम एशियाई बंदरगाहों से अमेरिका का उर्वरक आयात मई में शून्य हो गया था।

इस संकट के कारण अमेरिकी किसानों पर उत्पादन लागत का दबाव बढ़ गया है। वे पहले से ही अनाज की कमजोर कीमतों और ईंधन, बीज तथा अन्य कृषि आदानों की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं। इस बीच अमेरिका ने मोरक्को से आयात होने वाले कुछ फॉस्फेट उर्वरकों पर शुल्क अस्थायी रूप से हटाने का फैसला भी किया है। अमेरिकी संघीय व्यापार आयोग (FTC) उर्वरकों की कीमतों में तेज वृद्धि की जांच कर रहा है।

भारत के सामने भी चुनौती

भारत के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता बढ़ाने, कच्चे माल के स्रोतों में विविधता लाने, दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करने और पोषक तत्वों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने की रणनीति कितनी तेजी से आगे बढ़ाई जाती है।

पश्चिम एशिया संकट से पहले भारत अपने यूरिया आयात का लगभग 20 से 30 प्रतिशत और डीएपी आयात का करीब 30 प्रतिशत खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता था। इसके अलावा, भारत अपनी एलएनजी जरूरतों के लगभग आधे हिस्से के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर रहा है। प्राकृतिक गैस नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है।

पश्चिम एशिया में आपूर्ति संकट बढ़ने के बाद भारत ने रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों से उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की है। भारतीय कंपनियों ने दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते भी किए हैं।

भारत के लिए स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल 2026 में देश ने एक ही टेंडर के जरिए रिकॉर्ड 25 लाख टन यूरिया आयात का सौदा किया। यह मात्रा 2025 के लगभग एक करोड़ टन वार्षिक यूरिया आयात के करीब एक-चौथाई के बराबर थी। पश्चिम एशिया संकट के कारण इस आयात की कीमत दो महीने पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई थी।

भारत सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास कर रही है। हाल में दो नए उर्वरक संयंत्रों से जल्द उत्पादन शुरू होने की जानकारी सामने आई है। इन संयंत्रों से सालाना यूरिया उत्पादन क्षमता में करीब 25.4 लाख टन की वृद्धि होने की उम्मीद है। इससे आयात पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है।

वहीं, सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में उर्वरकों की आपूर्ति की स्थिति नियंत्रण में है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम एशिया में व्यवधान के बावजूद भारत के लिए यूरिया, डीएपी और सल्फर लेकर आ रहे 15 जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। साथ ही, घरेलू उत्पादन भी लक्ष्य से अधिक रहा है।