वैश्विक अनाज उत्पादन 2025-26 में बढ़कर 2.98 अरब टन रहने का अनुमान, मोटे अनाज की प्रमुख भूमिकाः यूएसडीए रिपोर्ट

अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुसार वर्ष 2025-26 में वैश्विक कृषि उत्पादन मिश्रित रुझान दिखा रहा है। कुछ क्षेत्रों में अनुकूल मौसम के कारण उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि अन्य क्षेत्रों में प्रतिकूल मौसम की वजह से तेज गिरावट देखने को मिली है। इस उतार-चढ़ाव के बीच भारत में उत्पादन का परिदृश्य स्थिर है। यहां गेहूं, मक्का और मोटे अनाज के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान है।

मौसम में उतार-चढ़ाव, फसली पैटर्न में बदलाव और क्षेत्रीय असमानताओं के कारण वर्ष 2025-26 में वैश्विक कृषि उत्पादन मिश्रित रुझान दिखा रहा है। अमेरिका के कृषि विभाग (USDA) की तरफ से 9 अप्रैल 2026 को जारी वर्ल्ड एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अनुकूल जलवायु परिस्थितियों का लाभ उठा रहे हैं, वहीं उरुग्वे और मैक्सिको जैसे देश सूखे के कारण उत्पादन में गिरावट से जूझ रहे हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में वैश्विक कृषि उत्पादन में व्यापक वृद्धि देखने को मिल रही है, जिसका प्रमुख कारण अनाज और तिलहनों के उत्पादन में बढ़ोतरी है। गेहूं, मोटे अनाज और चावल सहित कुल अनाज उत्पादन लगभग 298.4 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि को दर्शाता है। इसमें गेहूं का उत्पादन लगभग 84.4 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि मोटे अनाज का हिस्सा सबसे अधिक, 159.8 करोड़ टन से अधिक रहने की संभावना है। चावल का उत्पादन लगभग 54.1 करोड़ टन के स्तर पर स्थिर रहने का अनुमान है। वैश्विक तिलहन उत्पादन लगभग 69.8 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है, जो प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में निरंतर मांग और विस्तार को दर्शाता है। कपास उत्पादन में भी मामूली वृद्धि का अनुमान है।

भारत का कृषि परिदृश्य 2025-26 के लिए सकारात्मक बना हुआ है। यहां गेहूं, मक्का और मोटे अनाज जैसी प्रमुख फसलों में वृद्धि की उम्मीद है। यूएसडीए की रिपोर्ट के अनुसार यह वृद्धि मुख्य रूप से खेती के रकबे में विस्तार और उत्पादकता में क्रमिक सुधार के कारण हो रही है। हालांकि, हाल के मौसमीय घटनाक्रम कई राज्यों में रबी फसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

गेहूं उत्पादन में स्थिर वृद्धि

भारत में 2025-26 विपणन वर्ष के लिए गेहूं उत्पादन का अनुमान 11.79 करोड़ टन लगाया गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। इस बढ़ोतरी के पीछे गेहूं की बुवाई के रकबे में विस्तार प्रमुख कारण है, जो बढ़कर 328 लाख हेक्टेयर होने का अनुमान है। उपज स्तर में भी सुधार देखा गया है, जो लगभग 3.60 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया है। यह बेहतर फसल प्रबंधन और उन्नत बीज किस्मों का परिणाम है। रकबे और उत्पादकता दोनों में लगातार बढ़ोतरी भारत के गेहूं क्षेत्र की मजबूती को दर्शाती है।

अधिक रकबे के चलते मक्का उत्पादन में वृद्धि

भारत में वर्ष 2025-26 के लिए मक्का (कॉर्न) उत्पादन 430 लाख टन रहने का अनुमान है, जो इस क्षेत्र में लगातार विस्तार का संकेत देता है। इस वृद्धि का प्रमुख कारण रकबे में बढ़ोतरी है, जो बढ़कर 130 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है।

हालांकि, प्रति हेक्टेयर उपज में मामूली गिरावट देखी गई है और यह लगभग 3.55 टन प्रति हेक्टेयर पर आ गई है। इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से रकबे के विस्तार के कारण हो रही है, न कि उत्पादकता में सुधार के चलते। यह रुझान किसानों की मक्का की खेती में बढ़ती रुचि को दर्शाता है, जिसका कारण पशु आहार, एथेनॉल और औद्योगिक क्षेत्रों में इसकी बढ़ती मांग है।

मक्का के रकबे में यह विस्तार भारत की फसल प्रणाली में धीरे-धीरे हो रहे विविधीकरण को भी दर्शाता है, जहां किसान बदलती बाजार परिस्थितियों और मांग के अनुसार अपनी फसल चयन में बदलाव कर रहे हैं।

मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ा

भारत ज्वार, बाजरा और जौ जैसी फसलों सहित मोटे अनाज के उत्पादन में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है। कुल मोटे अनाज का उत्पादन 621.2 लाख टन रहने का अनुमान है। इनका रकबा 263.3 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है।

मोटे अनाज की उत्पादकता में भी सुधार हुआ है और यह लगभग 2.47 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जो उत्पादकता में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि को दर्शाता है। यह वृद्धि जलवायु अनुकूलता के दृष्टिकोण से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोटे अनाज प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन करने में सक्षम होते हैं।

वैश्विक फसल परिदृश्य

यूएसडीए ने वैश्विक फसल परिदृश्य की मिश्रित तस्वीर पेश की है:

  • दक्षिण अफ्रीका में ला नीना से जुड़ी अनुकूल वर्षा के कारण मक्का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंचने की उम्मीद है।
  • ब्राज़ील मक्का और सोयाबीन दोनों के उत्पादन में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है, जिसे समय पर बुवाई और बड़े पैमाने पर खेती का समर्थन मिला है।
  • इंडोनेशिया में अनुकूल वर्षा की वजह से मक्का उत्पादन में सीमित वृद्धि देखी जा रही है।
  • वहीं, उरुग्वे में लगातार सूखे के कारण मक्का और सोयाबीन दोनों के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
  • मेक्सिको में ज्वार का उत्पादन घटकर तीन दशकों के सबसे निचले स्तर पर आ गया है, जिसका कारण कम रकबा और प्रतिकूल मौसम है।

मौसम अब भी विश्वभर में कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। जिन क्षेत्रों में समय पर और पर्याप्त वर्षा हो रही है, वहां उत्पादन मजबूत बना हुआ है, जबकि सूखा या अनियमित वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्पादन में तेज गिरावट देखी जा रही है।

यूएसडीए के ताजा आकलन के अनुसार, वैश्विक कृषि परिदृश्य असमान वृद्धि और जलवायु अस्थिरता के बढ़ते जोखिम से प्रभावित है। जहां कुछ क्षेत्रों में अनुकूल मौसम और बेहतर पैदावार का लाभ मिल रहा है, वहीं अन्य क्षेत्र सूखा, बदलते फसल पैटर्न और आर्थिक दबावों से जूझ रहे हैं। यह असमानता वैश्विक खाद्य प्रणालियों की बढ़ती जटिलता को दर्शाती है, जहां एक क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने के बावजूद दूसरे क्षेत्र में गिरावट इसकी भरपाई कर देती है। जैसे-जैसे अनाज की वैश्विक मांग बढ़ रही है, आपूर्ति में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए जलवायु अनुकूलन क्षमता को मजबूत करना, उत्पादकता बढ़ाना और कृषि बाजारों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना आवश्यक होगा।