भारत में 2025-26 के दौरान करीब 23 लाख टन राइस ब्रान ऑयल (RBO) उत्पादन की क्षमता है, लेकिन वर्तमान उत्पादन केवल 11 लाख टन रहने का अनुमान है। करीब 12 लाख टन राइस ब्रान ऑयल की संभावित क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने बैंकॉक में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन राइस ब्रान ऑयल (ICRBO) में यह जानकारी दी।
13-14 अगस्त को आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के राइस ब्रान ऑयल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ और हितधारक शामिल हुए। SEA के कार्यकारी निदेशक डॉ. बी.वी. मेहता ने सम्मेलन में भारत के अनुभव और संभावनाओं को सामने रखा। डॉ. मेहता इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ राइस ब्रान ऑयल (IARBO) के महासचिव भी हैं।
SEA के अनुसार, भारत में 2025-26 में करीब 23 करोड़ टन धान और 15.4 करोड़ टन चावल का उत्पादन होने का अनुमान है। इससे लगभग 1.31 करोड़ टन राइस ब्रान उपलब्ध हो सकता है, जिससे करीब 23 लाख टन राइस ब्रान ऑयल का उत्पादन संभव है।
हालांकि, वास्तविक RBO उत्पादन इस क्षमता से काफी कम है। 2016-17 में राइस ब्रान ऑयल की अनुमानित क्षमता 16 लाख टन थी, जो 2025-26 में बढ़कर 23 लाख टन हो गई। इसके विपरीत, वास्तविक उत्पादन इस अवधि में केवल 9.8 लाख टन से बढ़कर 11 लाख टन हुआ है। SEA के अनुसार, यह अंतर बताता है कि भारत में राइस ब्रान की उपलब्धता बढ़ रही है, लेकिन इसकी तेल उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा अब भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
GST ढांचे में बदलाव की मांग
इस क्षमता का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए SEA ने राइस ब्रान की पूरे वैल्यू चेन को मजबूत करने की जरूरत बताई है। संगठन ने डी-ऑयल्ड राइस ब्रान (DORB) को 5 फीसदी GST स्लैब में लाने का सुझाव दिया है। इसके अलावा राइस ब्रान फैटी एसिड डिस्टिलेट (RBFAD) पर GST को मौजूदा 18 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी करने की मांग की है। SEA के अनुसार, इससे टैक्स संबंधी विसंगतियों और इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर की समस्या को दूर करने में मदद मिलेगी।
उत्पादन स्तर पर SEA ने लो-लाइपेज धान की किस्मों पर अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने, आधुनिक राइस मिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने और राइस मिलों में ब्रान स्टेबिलाइजेशन के लिए प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया है। इससे तेल निकालने के लिए उपलब्ध राइस ब्रान की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में सुधार हो सकता है।
राइस ब्रान से वैल्यू एडिशन पर जोर
SEA ने राइस ब्रान ऑयल रिफाइनिंग से निकलने वाले अवशेषों के बेहतर उपयोग और वैल्यू एडिशन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया है। संगठन ने उपयुक्त क्रूड राइस ब्रान ऑयल को एडिबल-ग्रेड तेल में रिफाइन करने को बढ़ावा देने की बात कही है। SEA ने कहा कि गुणवत्ता और नियामकीय आवश्यकताओं के अधीन, घरेलू रिफाइनिंग क्षमता के बेहतर इस्तेमाल के लिए पड़ोसी देशों से एडिबल-ग्रेड राइस ब्रान के शुल्क-मुक्त आयात पर भी विचार किया जा सकता है।
उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने की जरूरत
SEA ने कहा कि केवल नीतिगत उपायों से राइस ब्रान ऑयल की पूरी क्षमता का इस्तेमाल संभव नहीं होगा। इसके लिए उपभोक्ताओं के बीच राइस ब्रान ऑयल को लेकर वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। संगठन ने सरकार, शोध संस्थानों, राइस मिलर्स, प्रोसेसर, रिफाइनर्स और उद्योग संगठनों के बीच समन्वित प्रयास की जरूरत पर भी जोर दिया।
भारत खाद्य तेलों की अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में देश की प्रमुख फसल चावल से निकलने वाले राइस ब्रान का बेहतर उपयोग खाद्य तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। SEA के अनुसार, 2026 में सवाल यह नहीं है कि भारत के पास पर्याप्त राइस ब्रान है या नहीं, बल्कि यह है कि बढ़ते इस संसाधन को कितनी कुशलता से खाद्य तेल में बदला जा सकता है।