केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आने वाले गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 के स्थान पर लाये जाने वाले गन्ना नियंत्रण आदेश, 2026 पर कोई भी फैसला किसानों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद ही लिया जाएगा। गुरुवार को पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. संजीव बालियान के नेतृत्व में किसानों और गुड़ व खांडसारी उद्योग के प्रतिनिधियों का एक प्रतिनिधिमंडल गन्ना नियंत्रण आदेश, 2026 के मुद्दे पर केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी से मिला। उनके साथ बैठक में केंद्रीय खाद्य मंत्री ने कहा कि किसानों के साथ विस्तृत चर्चा और उनके हितों को सुरक्षित करने के बाद ही इस आदेश पर कोई फैसला लिया जाएगा।
गन्ना नियंत्रण आदेश, 2026 के ड्राफ्ट में प्रस्तावित बदलावों के प्रावधानों को लेकर गन्ना किसानों और गुड़ व खांडसारी उद्योग के साथ ही किसान संगठनों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। इन प्रावधानों के गन्ना किसानों और गुड़ व खांडसारी उद्योग के हितों के प्रतिकूल होने की बात कही जा रही है। साथ ही इन बदलावों को चीनी उद्योग के हितों के आगे गन्ना किसानों के हितों की बलि देने के बयान किसान संगठन दे रहे हैं।
बैठक के बाद डॉ. संजीव बालियान ने रूरल वॉयस को बताया कि प्रस्तावित आदेश के अधिकांश प्रावधान चीनी मिलों के हितों के अनुरूप हैं। हमने कहा है कि जब इस आदेश में किसानों के हित में कोई प्रावधान ही नहीं है तो इसकी जरूरत ही क्यों है। साथ ही यह साफ किया कि दो चीनी मिलों के बीच 15 किलोमीटर की दूरी का मौजूदा प्रावधान बरकरार रहना चाहिए। इसके साथ ही गुड़ व खांडसारी के लिए जो मौजूदा नियमन और लाइसेंसिंग की व्यवस्था है, वही जारी रहनी चाहिए। उनके ऊपर चीनी मिलों जैसा कोई नया प्रावधान लागू नहीं किया जाना चाहिए। अगर गुड़ व खांडसारी इकाइयां गन्ना किसानों को उचित एवं पारिश्रमिक मूल्य (एफआरपी) या राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) से अधिक दाम देना चाहती हैं तो उनके उपर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।
इस बैठक में जैगरी एंड खांडसारी मैन्यूफैक्चर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के नेशनल कन्वीनर यशपाल मलिक और दूसरे सदस्य शामिल थे। यशपाल मलिक का कहना है कि गन्ना नियंत्रण आदेश, 2026 के प्रावधान चीनी मिलों के पक्ष हैं और इससे ग्रामीण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार देने और आर्थिक गतिविधियों में बड़ी भूमिका निभाने वाले गुड़ व खांडसारी उद्योग का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।
ड्राफ्ट में इस्तेमाल किए गए शब्दों ‘खांडसारी शुगर सिरप’ को डिलीट किया जाना चाहिए और इसकी जगह ‘शुगर सिरप’ शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि चीनी मिलें खांडसारी नहीं बनाती हैं। खांडसारी फैक्ट्री की परिभाषा भी स्पष्ट नहीं है, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। उद्योग की भाषा में इन्हें अक्सर पावर कोल्हू या पावर क्रशर कहा जाता है। पावर कोल्हू/क्रशर और खांडसारी इकाइयों के लिए गन्ना खरीदने के रिजर्व एरिया की कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए।
संगठन का कहना है कि पावर कोल्हू/क्रशर या खांडसारी इकाई का लाइसेंस देने का अधिकार राज्य सरकारों के पास रहे, केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप न करे क्योंकि गन्ना राज्यों का मामला है। राज्य सरकारें जब पावर कोल्हू/क्रशर और खांडसारी यूनिट को परमिट दें तो उसमें कोऑपरेटिव सोसायटी अथवा एजेंट के माध्यम से गन्ना खरीदने और उन्हें कमीशन देने का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए। अभी ये इकाइयां किसानों से सीधे गन्ने की खरीद करती हैं और यही व्यवस्था रहनी चाहिए।
संगठन की मांग है कि इन इकाइयों पर समय और काम के घंटे की भी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये स्थानीय परिस्थितियों और मांग के अनुसार काम करती हैं। इसके अलावा श्रमिकों के काम के घंटे, बिजली और कच्चे माल के उपलब्धता पर भी इनका काम निर्भर करता है। इनके लिए अधिक संख्या में कागजात रखने की बाध्यता भी नहीं रहनी चाहिए। छोटी इकाइयां ज्यादा डॉक्यूमेंटेशन नहीं कर सकती हैं। चीनी मिल और पावर कोल्हू/क्रशर इकाई के बीच दूरी की भी कोई सीमा नहीं रहनी चाहिए। गुड़ और खांडसारी इकाइयां गन्ना सीजन में लाखों लोगों को रोजगार देती हैं। संगठन का कहना है कि गन्ने का विकास उन्हीं क्षेत्रों में अधिक हुआ है जहां पावर कोल्हू/क्रशर और चीनी मिलें एक साथ मौजूद हैं।