भारत सरकार कपास के ड्यूटी-फ्री आयात की छूट 31 अक्टूबर से बढ़ाकर दिसंबर 2026 के अंत तक जारी रख सकती है। घरेलू कपड़ा उद्योग को सस्ती दरों पर कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार नई फसल की आवक के दौरान भी कपास का शुल्क-मुक्त आयात जारी रख सकती है। इस मामले में कपड़ा उद्योग ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है और उद्योग की लॉबिंग का असर जल्द ही सरकारी आदेश के रूप में दिखाई दे सकता है।
कपास आयात पर सीमा शुल्क की छूट दिसंबर तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर मंत्रालयों के बीच विचार-विमर्श चल रहा है और जल्द ही इस संबंध में आदेश जारी हो सकता है। इस कदम के पक्ष में कपड़ा उद्योग को कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने, उत्पादन लागत घटाने और घरेलू बाजार में कपास की कीमतों को नियंत्रित रखने जैसे तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन अक्टूबर से दिसंबर के दौरान देश में नई कपास की आवक बढ़ने के बीच इस छूट को जारी रखने का असर किसानों को मिलने वाले दाम पर पड़ेगा। इससे कपास उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ गई है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के किसान और ग्रामीण किसान मजदूर समिति (GKS) के अध्यक्ष रणजीत सिंह राजू ने रूरल वॉयस को बताया कि इस साल मौसम की मार और उर्वरकों की किल्लत के बीच कपास की पैदावार प्रभावित हुई है। उत्पादन में कमी के कारण किसानों को कपास का भाव लगभग 9,000 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है। यह पिछले साल के मुकाबले बेहतर दाम है। हालांकि, तीन साल पहले कपास का भाव 12,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था।
राजू का कहना है कि जैसे ही किसानों को बाजार में बेहतर भाव मिलने लगता है, सरकार आयात जैसे कदम उठाकर कीमतों में गिरावट का रास्ता खोल देती है। दलहन और तिलहन के मामले में भी किसान सस्ते आयात की मार झेल रहे हैं।
उत्पादन और मांग के बीच बढ़ता अंतर
कपास के आयात पर बढ़ती निर्भरता कृषि उपजों के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की केंद्र सरकार की कोशिशों पर भी सवाल खड़े करती है। हाल के वर्षों में देश में कपास का उत्पादन तेजी से घटा है। वर्ष 2013-14 में देश में कपास का उत्पादन 398 लाख गांठ (170 किलो प्रति गांठ) तक पहुंच गया था। लेकिन 2024-25 में कपास उत्पादन उच्चतम स्तर से करीब 100 लाख गांठ कम होकर 297 लाख गांठ पर आ गया था। वर्ष 2025-26 में देश में 290 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ। चालू वर्ष में सूखे की वजह से इसमें और गिरावट आने की आशंका है।
उद्योग का कहना है कि देश में कटन की मांग लगभग 350 लाख गांठ रहने की संभावना है। यदि उत्पादन और मांग के बीच यह अंतर बना रहता है, तो कपड़ा उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।
पिछले दो वर्षों में कपास का बुवाई क्षेत्र घटकर लगभग 115 लाख हेक्टेयर रह गया था। चालू वर्ष में कपास का क्षेत्रफल करीब 111 लाख हेक्टेयर रहा है। क्षेत्रफल घटने और महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के कपास उत्पादक क्षेत्रों में सूखे से फसल प्रभावित हुई है, जबकि कई इलाकों में बेमौसम बारिश ने भी नुकसान पहुंचाया है।
उपज पर मौसम की मार
महाराष्ट्र के किसान नेता और शेतकरी संगठन के पूर्व अध्यक्ष अनिल घनवट का कहना है कि अल नीनो के प्रभाव और कपास उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की स्थिति के कारण घरेलू उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ा है। घनवट का अनुमान है कि सरकार अगले एक साल तक कपास का ड्यूटी-फ्री आयात जारी रख सकती है। हालांकि, उनका मानना है कि इससे किसानों के हित प्रभावित होंगे। इसके बावजूद कपड़ा उद्योग की मांग पूरी करने के लिए सरकार कपास के शुल्क-मुक्त आयात को जारी रख सकती है।
केंद्र सरकार ने कपड़ा उद्योग की जरूरतों को देखते हुए 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास के आयात पर लागू 11 प्रतिशत सीमा शुल्क से छूट दी थी। अब इस छूट को दो महीने और बढ़ाने की संभावना है।
आयात से बढ़ेगा कीमतों पर दबाव
अक्टूबर से दिसंबर के दौरान उत्तर भारत और मध्य भारत के कई प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में नई फसल की आवक मंडियों में बढ़ने लगती है। सामान्यतः नई फसल आने पर घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन इस साल उत्पादन की संभावनाएं कमजोर रहने के कारण कीमतें ऊंची बनी हुई हैं।
फिलहाल प्रमुख घरेलू बाजारों में कपास की कीमतें 9,000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर चल रही हैं। जबकि केंद्र सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए मध्यम रेशा कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 8,267 रुपये और लंबे रेशे वाले कपास का 8,667 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। इस तरह किसानों को एमएसपी से बेहतर भाव मिल रहा है।
यदि शुल्क-मुक्त आयात की अवधि बढ़ाई जाती है और आयातित कपास की उपलब्धता बढ़ती है, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
दो साल में कपास आयात तीन गुना
घरेलू उत्पादन में गिरावट के साथ कपास के आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ रही है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कपास का आयात वित्त वर्ष 2023-24 के लगभग 57.92 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 120 करोड़ डॉलर और 2025-26 में 186 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया।
चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान भारत का कपास आयात सालाना आधार पर 63 प्रतिशत बढ़कर लगभग 110 करोड़ डॉलर पहुंच गया। यदि आयात की यही रफ्तार बनी रहती है, तो पूरे वित्त वर्ष में आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है।
कपास पर आयात शुल्क हटाने से दोहरा नुकसान हो सकता है। घरेलू बाजार में कपास के दाम गिरने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ेगा और वे अगले सीजन में कपास की बुवाई घटा सकते हैं। इससे उत्पादन गिरेगा और आयात पर निर्भरता बढ़ेगी।
सरकार के सामने चुनौती कपड़ा उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराने के साथ-साथ कपास किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने और घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत करने की है। अल्पकाल में सस्ते आयात से उद्योग को राहत मिल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में कपास की उत्पादकता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।