कटहल का छिलका हटा सकता है पानी से फ्लोराइड, एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने खोजा तरीका

एनआईटी राउरकेला (NIT Rourkela) के शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलके से बने जिरकोनियम-युक्त सक्रिय कार्बन की मदद से प्रयोगशाला परीक्षणों में दूषित पानी से 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने वाली सामग्री विकसित की है। आगे के परीक्षणों के बाद यह किफायती और टिकाऊ पेयजल शोधन विकल्प बन सकती है।

कटहल का छिलका हटा सकता है पानी से फ्लोराइड, एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने खोजा तरीका
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी राउरकेला (NIT Rourkela) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी सामग्री विकसित की है, जो दूषित भूजल से अतिरिक्त फ्लोराइड को कम खर्च में हटा सकती है। इसके लिए उन्होंने कटहल के छिलके से तैयार सक्रिय कार्बन (एक्टिवेटेड कार्बन) का इस्तेमाल किया और फ्लोराइड को पकड़ने की इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए इसमें जिरकोनियम मिलाकर संशोधित किया। पेटेंट प्राप्त यह सामग्री भारत के विभिन्न हिस्सों में पेयजल संबंधी चुनौती से निपटने का एक संभावित विकल्प प्रस्तुत करती है।
प्रयोगशाला स्तर पर किए गए परीक्षणों के आधार पर शोधकर्ताओं ने इस सामग्री को तैयार करने की लागत लगभग 37 रुपये प्रति ग्राम आंकी है। इसमें इस्तेमाल होने वाली बिजली और रसायनों की लागत भी शामिल है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से दांतों और हड्डियों से संबंधित फ्लोरोसिस जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसका असर बच्चों और वयस्कों, दोनों पर पड़ता है। देश के कई हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड प्रदूषण की समस्या सामने आई है। ऐसे में पानी को शुद्ध करने के लिए किफायती और टिकाऊ तरीकों का विकास जनस्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
भूजल से फ्लोराइड हटाने के कई पारंपरिक तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर उनके इस्तेमाल की कुछ सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए, रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्रक्रिया में उपचार के दौरान काफी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। यह पानी से कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे लाभकारी खनिजों को भी हटा देती है। दूसरी ओर, आयन एक्सचेंज और एक्टिवेटेड एल्युमिना जैसी प्रक्रियाओं में कठोर रसायनों का इस्तेमाल होता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।
इन सीमाओं को दूर करने के लिए एनआईटी राउरकेला की शोध टीम ने बेकार फेंके जाने वाले कटहल के छिलकों को सक्रिय कार्बन में परिवर्तित किया। इस तकनीक के बारे में बताते हुए प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा ने कहा, “हमने कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन तैयार किया और पानी से फ्लोराइड को पकड़ने की इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए इसे जिरकोनियम से संशोधित किया। प्रयोगशाला में निर्धारित परिस्थितियों के तहत इस सामग्री ने उत्साहजनक परिणाम दिखाए। इसने लगभग 10 मिनट में 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटा दिया।”

प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और रिसर्च ग्रेजुएट डॉ. प्रतिमा मिंज
इस तकनीक को विकसित करने वाली शोध टीम में एनआईटी राउरकेला की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और रिसर्च ग्रेजुएट डॉ. प्रतिमा मिंज शामिल हैं। टीम ने इस तकनीक के लिए पेटेंट भी प्राप्त किया है। इसकी आवेदन संख्या 202531080242 है, जिसे 25 अगस्त 2025 को दर्ज किया गया था।
प्रयोगशाला परीक्षणों में लगभग 1 से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर फ्लोराइड सांद्रता वाले पानी से इस सामग्री ने करीब 10 मिनट में 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाया। परीक्षण की परिस्थितियों के अनुसार, 10 से 20 मिनट के भीतर फ्लोराइड हटाने की दक्षता 90 से 97 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। ये परिणाम पेयजल शोधन में इस सामग्री के संभावित उपयोग की ओर संकेत करते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां भूजल में फ्लोराइड का स्तर चिंता का विषय है।
यह तकनीक विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां विश्वसनीय जल शोधन सुविधाओं की उपलब्धता सीमित है। इससे समुदाय स्तर पर विकेंद्रीकृत जल शोधन व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है। 
अगले चरण में शोध टीम इस सामग्री का एक भौतिक प्रोटोटाइप विकसित करने की योजना बना रही है। इसके बाद इसके व्यावहारिक उपयोग, लंबे समय तक प्रदर्शन और परिचालन लागत का आकलन किया जाएगा।
प्रोफेसर मिश्रा ने कहा, “दीर्घकाल में, आगे के परीक्षणों और सत्यापन के आधार पर यह तकनीक फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों के समुदायों के लिए जल शोधन समाधान विकसित करने में योगदान दे सकती है।”

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