आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भारत सरकार के एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन किसानों का रुझान दलहन व तिलहन फसलों की बजाय मक्का की ओर बढ़ने को लेकर आगाह भी किया है। एथेनॉल कीमतों में अंतर की नीति और केवल कुछ फसलों को प्रोत्साहन से देश की फसल विविधता और खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा हो सकता है।
सर्वेक्षण के मुताबिक, देश में मक्का की पैदावार वर्ष 2016 में 2.56 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2025 में 3.78 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई। जबकि इस दौरान सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों, मूंगफली और मोटे अनाजों की पैदावार घट गई या फिर स्थिर रही है। किसानों का रुझान दलहन और मोटे अनाजों की बजाय मक्का की ओर बढ़ा है।
सरकार की एथेनॉल मूल्य निर्धारण की नीति ने मक्का की ओर इस रुझान को बढ़ावा दिया है। मक्का आधारित एथेनॉल का दाम चावल और शीरे से बने एथेनॉल के मुकाबले अधिक रहता है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का आधारित एथेनॉल का दाम सालाना 11.7 फीसदी की दर से बढ़ा, जो चावल या शीरे से बने एथेनॉल की अपेक्षा अधिक है। इससे मक्का की खेती को बढ़ावा मिला। उम्मीद की जा रही थी किसान धान छोड़कर मक्का उगाना शुरू करेंगे।
मक्का को मिले नीतिगत प्रोत्साहन के चलते वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का का उत्पादन सालाना 8.77 फीसदी और क्षेत्र 6.68 फीसदी की दर से बढ़ा है। जबकि इस दौरान दलहन के उत्पादन और क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई। तिलहन की बुवाई का क्षेत्र चार साल में केवल 1.7 प्रतिशत की दर से बढ़ा जबकि मक्का को छोड़कर बाकी अनाजों के क्षेत्र में 2.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। फसलों के पैटर्न में यह बदलाव महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में साफ दिख रहा है। दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास की बजाय किसानों का रुझान मक्का की ओर बढ़ा है। हालांकि, मक्का को प्रोत्साहन के बावजूद धान का क्षेत्र कम नहीं हुआ है।
दलहन और तिलहन फसलें देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। फिर भी किसानों द्वारा इन्हें प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि यह असंतुलन खाद्य तेल आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ाने और घरेलू खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव के जोखिम को बढ़ा सकता है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता के बीच एक बढ़ते तनाव को उजागर करते हुए इन रुझानों को "प्रारंभिक चेतावनी" का संकेत करार दिया है। साथ ही उस नीतिगत चुनौती को भी रेखांकित किया है जिसके तहत कुछ खास फसलों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
आर्थिक सर्वेक्षण में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को देश की ऊर्जा सुरक्षा का अहम स्तंभ माना है। अगस्त 2025 तक, एथेनॉल मिश्रण से भारत को विदेशी मुद्रा में 1.44 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा की बचत हुई और लगभग 245 लाख टन कच्चे तेल की जगह एथेनॉल का इस्तेमाल हुआ। 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल करने के लिए शुगर आधारित एथेनॉल के अलावा चावल और मक्का आधारित एथेनॉल को बढ़ावा दिया गया।
इससे 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिली, लेकिन फसल विविधता और खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौतिपूर्ण स्थितियां पैदा हो सकती हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को लेकर समग्र दृष्टिकोण अपनाने और एक व्यापक रोडमैप तैयार करने का सुझाव दिया गया है।