भारत का पशुधन क्षेत्र भले ही पशु आहार की चुनौती का सामना कर रहा हो, लेकिन देश के खेतों में ही एक विशाल संसाधन मौजूद है। भारत में हर साल 50 करोड़ टन से अधिक फसल अवशेष पैदा होते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ‘भारत में पशुधन उत्पादन बढ़ाने के लिए फीड एवं फोडर संसाधनों का व्यापक आकलन’ रिपोर्ट में फसल अवशेषों को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सबसे बड़े पशु आहार संसाधन के रूप में पहचाना गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इनके उपयोग में सुधार करना अनुसंधान की प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए।
यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पशुधन क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार व्यावहारिक पशु आहार परिस्थितियों में देश में हरे चारे की 14.1% और कंसंट्रेट फीड की 37.5% कमी है, जबकि सूखे चारे की कमी अपेक्षाकृत कम 2.4% है।
50 करोड़ टन से अधिक फसल अवशेष का संसाधन
फसल अवशेषों में मुख्य रूप से धान, गेहूं, मक्का, ज्वार और दलहनी फसलों जैसी खाद्यान्न फसलों की कटाई के बाद खेत में बची सामग्री शामिल होती है। ये अवशेष गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों के लिए सूखे चारे का प्रमुख स्रोत हैं। आकलन के अनुसार, फसल अवशेषों से कुल सूखे चारे की उपलब्धता करीब 50.80 करोड़ टन है। इसमें खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, मूंगफली और गन्ने से मिलने वाले अवशेष शामिल हैं।
हालांकि, पूरी मात्रा को पशुधन के लिए उपलब्ध नहीं माना जा सकता। फसल अवशेषों के एक बड़े हिस्से के अन्य उपयोग भी हैं, जिनमें पैकेजिंग, बायोमास आधारित बिजली उत्पादन और ईंधन शामिल हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि विभिन्न फीड संसाधनों के वास्तविक उपयोग का पूरा दस्तावेजीकरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए पशु आहार के लिए उपलब्धता के अनुमान व्यापक आधार पर तैयार किए गए हैं।
समस्या केवल मात्रा की नहीं, गुणवत्ता की भी
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसी संसाधन की प्रचुर उपलब्धता का मतलब यह नहीं है कि वह पोषण की दृष्टि से पर्याप्त भी हो। अधिकांश पारंपरिक फसल अवशेषों में ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और उपलब्ध खनिजों का स्तर कम होता है तथा उनकी पाचनशीलता भी कमजोर होती है। मूंगफली की सूखी पत्तियां, कुलथी और सोयाबीन के अवशेष जैसे कुछ अवशेषों को छोड़ दें तो अन्य अवशेष पूरक आहार के बिना पशुओं की रखरखाव संबंधी पोषण जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाते।
इनकी एक अन्य समस्या यह है कि फसल अवशेष भारी मात्रा में होते हैं और इनके भंडारण के लिए काफी जगह की जरूरत होती है। कम बल्क डेंसिटी के कारण इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना भी महंगा पड़ता है। इससे उत्पादन वाले क्षेत्रों से पशुपालन फार्मों या फीड प्रसंस्करण केंद्रों तक अवशेषों को आर्थिक रूप से पहुंचाना मुश्किल हो जाता है।
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इसका मतलब है कि केवल अधिक फसल अवशेष एकत्र करना भारत की पशु आहार समस्या का समाधान नहीं करेगा। चुनौती बड़ी मात्रा में उपलब्ध अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता वाले बायोमास को पोषण की दृष्टि से उपयोगी पशु आहार में बदलने की है।
धान की पराली एक बड़ा अप्रयुक्त अवसर
रिपोर्ट में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की पराली को जलाने की समस्या को संसाधनों की बर्बादी का उदाहरण बताया गया है। अगली फसल के लिए खेत खाली करने के उद्देश्य से हर साल लाखों टन धान का पुआल जला दिया जाता है। इससे प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ ऐसा संसाधन भी नष्ट होता है जिसका इस्तेमाल संभावित रूप से पशुओं के आहार के रूप में किया जा सकता है।
फसल अवशेषों के आकलन में इनके क्षेत्रवार उपयोग में अंतर को भी ध्यान में रखा गया है। चावल के अवशेषों में सामान्य तौर पर करीब 75% हिस्सा सूखे चारे के रूप में इस्तेमाल होने का अनुमान है, लेकिन पंजाब और हरियाणा में यह अनुपात केवल 30% है। इसका प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर पराली जलाना है। इसके विपरीत, इन राज्यों में गेहूं के भूसे का उपयोग करीब 85% होने का अनुमान है, जो पशु आहार के रूप में इसके स्थापित उपयोग को दर्शाता है।
यह बताता है कि एक ही फसल अवशेष का राष्ट्रीय स्तर पर पशु आहार के रूप में उपयोग स्थानीय पशुपालन प्रणालियों, बाजारों, संग्रहण ढांचे और अन्य उपयोगों के आधार पर काफी अलग हो सकता है।
कचरे को पशु आहार में बदल सकती है तकनीक
ICAR के अनुसार, अब ध्यान केवल अधिक फसल अवशेष पैदा करने पर नहीं, बल्कि उनकी पोषण गुणवत्ता और उपयोग दक्षता में सुधार करने पर होना चाहिए। रिपोर्ट में ऐसी तकनीकों की सिफारिश की गई है जो पोषण की दृष्टि से कमजोर फसल अवशेषों में मौजूद लिग्नो-सेलुलोसिक बंधनों को तोड़ सकें और उनमें नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्वों को समृद्ध कर सकें। इससे इन अवशेषों को मध्यम से उच्च पोषण मूल्य वाले पशु आहार में बदला जा सकता है।
रिपोर्ट में टोटल मिक्स्ड राशन (TMR), साइलेज निर्माण, पेलेटिंग और हे-मेकिंग जैसी प्रसंस्करण एवं संरक्षण तकनीकों को भी अनुसंधान और व्यापक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया गया है। कुछ अपेक्षाकृत सरल उपाय भी मददगार हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सूखे मोटे चारे को पोषक तत्वों से समृद्ध करना या रणनीतिक रूप से पूरक आहार देना तथा सूखे और हरे चारे को काटकर खिलाने से पशुओं द्वारा चारे का सेवन और उपयोग बढ़ाया जा सकता है और बर्बादी कम की जा सकती है।
कृषि-प्रसंस्करण उद्योग का कचरा भी बन सकता है चारे का स्रोत
यह अवसर केवल फसल अवशेषों तक सीमित नहीं है। भारत के बढ़ते खाद्य और कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों से बड़ी मात्रा में सह-उत्पाद और अपशिष्ट निकल रहे हैं। ICAR ने कई वैकल्पिक पशु आहार संसाधनों की पहचान की है। इनमें फलों का पल्प, डिस्टिलरी वेस्ट, कीटों से प्राप्त मील, समुद्री शैवाल, प्रोटीन आइसोलेट, पत्तियों से तैयार मील, कांटारहित कैक्टस, सिंगल-सेल प्रोटीन, बूचड़खानों और खाद्य उद्योगों से निकलने वाला कचरा तथा गैर-पारंपरिक ऑयलमील शामिल हैं।
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रिपोर्ट का कहना है कि इन संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन किया जाना चाहिए और जहां वे सुरक्षित तथा पोषण की दृष्टि से उपयुक्त हों, वहां उन्हें पशुओं के आहार में शामिल किया जाना चाहिए। इससे एक साथ पशु आहार के स्रोतों का विस्तार, कचरा निपटान की समस्या में कमी और कृषि तथा खाद्य प्रणालियों में सर्कुलरिटी को बढ़ावा दिया जा सकता है।
कचरा प्रबंधन से आगे बढ़कर पशु आहार सुरक्षा
यह अवसर इसलिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पशुधन उत्पादन गुणवत्तापूर्ण पशु आहार संसाधनों की उपलब्धता की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। ICAR के आकलन के अनुसार, भविष्य की पशु आहार सुरक्षा केवल आहार की आपूर्ति बढ़ाने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि उत्पादकता और फीड उपयोग दक्षता में सुधार भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। रिपोर्ट में फसल अवशेषों की गुणवत्ता सुधारना, कृषि-औद्योगिक सह-उत्पादों और अपशिष्टों के जरिए पशु आहार के स्रोतों का विस्तार, क्षेत्र-विशिष्ट फीडिंग रणनीतियां विकसित करना और चारा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना प्रमुख अनुसंधान प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है।
रिपोर्ट अंततः सोच में बदलाव की जरूरत की ओर संकेत करती है। फसल अवशेषों को केवल कृषि अपशिष्ट या निपटान की समस्या के रूप में देखने के बजाय उन्हें भारत की पशु आहार रणनीति के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखना होगा।