नौ साल में सबसे कम रहेगा चीनी का बकाया, उत्पादन 281 लाख टन रहने का अनुमान

देश में 2025-26 सीजन के अंत तक चीनी का बकाया स्टॉक 41 लाख टन रहने का अनुमान है, जो नौ साल में सबसे कम होगा। उत्पादन घटकर 281 लाख टन रहने की आशंका है। कीमतें स्थिर रहने से मिलों को नुकसान और किसानों में गन्ना खेती को लेकर चिंता बढ़ी है।

चालू चीनी सीजन (2025-26) के अंत में 30 सितंबर, 2026 को देश में चीनी का बकाया स्टॉक 41 लाख टन रहने की संभावन है, जो पिछले नौ साल में सबसे कम है। नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्टरीज (एनएफसीएसएफ) के मुताबिक चालू सीजन में चीनी का उत्पादन 281 लाख टन रहेगा। वहीं देश में करीब 280 लाख टन चीनी की खपत और दस लाख टन चीनी के निर्यात के बाद स्टॉक घटकर 41 लाख टन पर आ सकता है। इस सीजन में अक्तूबर, 2025 में चीनी का शुरुआती स्टॉक 50 लाख टन था।

चालू सीजन की शुरुआत में चीनी उद्योग ने करीब 349 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था, जिसमें 34 लाख टन का डायवर्जन एथेनॉल के लिए होने का अनुमान था। लेकिन ताजा अनुमानों के मुताबिक चीनी उत्पादन 281 लाख टन रहेगा और 28 लाख टन का एथेनॉल के लिए डायवर्जन होगा। इस तरह चीनी का कुल उत्पादन (ग्रास प्रॉडक्शन) 309 लाख टन रहने का अनुमान है जो शुरुआती अनुमान से करीब 40 लाख टन कम है।

नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्टरीज लिमिटेड के चेयरमैन हर्षवर्धन पाटिल ने रूरल वॉयस को बताया कि चीनी उद्योग और किसान, सरकार द्वारा नीतिगत फैसलों में देरी की वजह से परेशान हैं। अगर यह स्थिति जारी रहती है तो आने वाले कुछ साल में देश में चीनी की उपलब्धता का संकट पैदा हो सकता है, क्योंकि गन्ने की खेती फायदेमंद नहीं रहने से किसानों का मोहभंग होने की आशंका बन गई है। चालू सीजन में बेहतर उत्पादन की संभावना के बावजूद उत्पादन के कम होने के सवाल पर उन्होंने बताया कि अक्तूबर में तेज बारिश, बादलों के छाये रहने से फसल को करीब एक माह तक धूप नहीं मिला। खेतों में पानी खड़ा रहने से फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा है। हालांकि उनका कहना है कि देश में चीनी की उपलब्धता ठीक है लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हो रही है।

उन्होंने बताया कि साल 2019 में सरकार ने चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत (एमएसपी) को 29 रुपये किलो से बढ़ाकर 31 रुपये किलो किया था। उस बात को छह साल बीत चुके हैं और तब से गन्ने के फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) में 650 रुपये प्रति टन की बढ़ोतरी हो चुकी है। चीनी की ही तरह पिछले तीन साल में चीनी से बनने वाले एथेनॉल की कीमतें भी स्थिर हैं। इस स्थिति से मिलों को आर्थिक मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। 

उन्होंने बताया कि चालू सीजन की शुरुआत में चीनी का एक्स फैक्टरी मूल्य 3980 रुपये प्रति क्विंटल तक चला गया था लेकिन बाद में वह गिरकर 3715 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गया। जनवरी 2026 में यह बढ़कर 3850 से 3875 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहा। महाराष्ट्र और कर्नाटक में एस ग्रेड चीनी का एक्स फैक्टरी मूल्य 3700 से 3760 रुपये के बीच है वहीं उत्तर प्रदेश और गुजरात में एम ग्रेड चीनी का एक्स फैक्टरी मूल्य 3900 रुपये से 4095 रुपये प्रति क्विंटल के बीच है। जबकि औसत लागत 4100 रुपये प्रति क्विंटल है। इस तरह औसतन 250 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान चीनी मिलों को हो रहा है। जिसके चलते चीनी मिलों को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने मांग की कि सरकार को चीनी का एमएसपी बढ़ाकर 41 रुपये प्रति किलो करना चाहिए और एथेनॉल का दाम भी बढ़ाना चाहिए।

सरकार ने 20 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी है। पाटिल ने बताया कि अभी तक ढाई लाख टन चीनी का निर्यात पूरा हुआ है जबकि ढाई लाख टन चीनी ईरान युद्ध के चलते ट्रांजिट में अटकी है। अभी तक कुल 7.5 लाख टन चीनी के ही निर्यात सौदे हुए हैं। उम्मीद है कि चालू सीजन में 30 सितंबर, 2026 तक करीब 10 लाख टन चीनी का निर्यात हो सकेगा। हालांकि भारत लिए वैश्विक बाजार बेहतर हो सकता है क्योंकि विश्व के सबसे बड़े निर्यातक ब्राजील ने चीनी के बजाय एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है, जिसके चलते वैश्विक बाजार में चीनी की उपलब्धता सीमित हो सकती है और उसके चलते चीनी के दाम बढ़ सकते हैं।

स्टॉक कम रहने की आशंका और उत्पादन गिरने के बावजूद चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होना उद्योग और किसान दोनो के लिए चिंता की बात है। वहीं पिछले बरसों में निजी उद्योग चीनी की सालाना खपत 285 से 290 लाख टन तक रहने की बात कह चुका है। खपत बढ़ने और निर्यात के दस लाख टन तक पहुंचने की स्थिति में अक्तूबर, 2026 की शुरुआत में चीनी का बकाया सटॉक 40 लाख टन से भी कम रह सकता है। सामान्य रूप से देश में तीन माह का बकाया चीनी स्टॉक रहने की कोशिश सरकार करती रही है।