ईरान युद्ध के कारण महंगाई एक बार फिर बढ़ने का दबाव बनने लगा है। HSBC के आकलन के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत में खुदरा महंगाई 6% के पार जा सकती है। ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने मौजूदा रुख में बदलाव करते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार करना पड़ सकता है।
HSBC के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस समय भारत “दोराहे” पर खड़ा है। महंगाई की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से नीचे आती हैं या ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो महंगाई RBI की ऊपरी सीमा को पार कर सकती है। वहीं, यदि औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो महंगाई 4.5-5% के दायरे में नियंत्रित रह सकती है और सख्त मौद्रिक नीति की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कच्चा तेल क्यों है निर्णायक
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी आयातित तेल पर निर्भरता है। देश की लगभग 85% पेट्रोलियम जरूरतें आयात के जरिए पूरी होती हैं। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इससे ईंधन महंगा होता है, परिवहन लागत बढ़ती है और अंततः खाद्य पदार्थों व जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होता है। इस तरह यह प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर व्यापक महंगाई पैदा करता है।
अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत में महंगाई लगभग 55-60 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकती है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में पहले ही उछाल आ चुका है और ब्रेंट हाल के हफ्तों में 100 डॉलर से ऊपर बना हुआ है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान रहने से इसके कई प्रभाव सामने आ सकते हैं। जैसे माल ढुलाई महंगी होना, आपूर्ति में कमी और आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती। ये सब कारक महंगाई को और बढ़ा सकते हैं। तेल आयात बिल बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ेगा, जिससे आयातित महंगाई और तेज हो सकती है।
रिजर्व बैंक क्या करेगा?
यदि महंगाई 6% से ऊपर जाती है, तो RBI के पास सख्त मौद्रिक नीति अपनाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होंगे। HSBC के मुताबिक, कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहने पर चालू वित्त वर्ष में कम से कम 25 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक 7-9 अप्रैल को होनी है।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक अनिश्चितताएं पहले ही मांग पर दबाव डाल रही हैं। फिलहाल भारत में महंगाई RBI के निर्धारित दायरे में है, लेकिन स्थिति तेजी से बदल रही है। यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी रहती हैं, तो महंगाई 6% के पार जाने का खतरा वास्तविक है।