ईरान संकट के कारण भारत के चावल निर्यात कारोबार पर असर पड़ना शुरू हो गया है, जिसके चलते निर्यातकों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (आईआरईएफ) ने एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें प्रमुख समुद्री मार्गों पर अस्थिरता के कारण शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात संचालन में गंभीर व्यवधान की जानकारी दी गई है।
निर्यातकों का कहना है कि इस संकट ने कई परिचालन समस्याएं पैदा कर दी हैं, जिनमें शिपिंग कंटेनरों की कमी, मध्य पूर्व के लिए जहाजों की आवाजाही रद्द होना और मालभाड़ा, ईंधन तथा बीमा लागत में तेज वृद्धि शामिल है। इन व्यवधानों के कारण माल की ढुलाई, डिलीवरी शेड्यूल और निर्यातकों के अनुबंधित भुगतान पर असर पड़ रहा है।
शिपिंग में व्यवधान और बढ़ती लागत
फेडरेशन के अनुसार इस संकट ने वैश्विक शिपिंग लॉजिस्टिक्स को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। सबसे बड़ी समस्या मध्य पूर्व के लिए कंटेनरों की उपलब्धता का न होना है, जिसका असर अन्य बाजारों के लिए होने वाली शिपमेंट पर भी पड़ रहा है। व्यवधान के कारण खाली कंटेनरों की आवाजाही और पुनः तैनाती प्रभावित हुई है, जिससे निर्यातकों को माल भेजने के लिए कंटेनर उपलब्ध कराने में कठिनाई हो रही है।
मालभाड़ा लागत में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। अंतरराष्ट्रीय थोक मालभाड़ा दरों में लगभग 15–20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि कंटेनर मालभाड़ा दरों में इससे भी अधिक तेजी आई है। एशिया से मध्य पूर्व के लिए कंटेनर दरें संकट से पहले 1,200-1,800 डॉलर प्रति एफईयू से बढ़कर वर्तमान में 3,500-4,500 डॉलर प्रति एफईयू तक पहुंच गई हैं, जो 80-150 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्शाती हैं।
इसके अलावा जहाजों में उपयोग होने वाले समुद्री ईंधन की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। बंकर फ्यूल की कीमत लगभग 520 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से बढ़कर लगभग 700 डॉलर तक पहुंच गई है, जिससे शिपिंग लागत और बढ़ गई है। निर्यातकों का कहना है कि इन अचानक बढ़ी लागतों के कारण मौजूदा निर्यात अनुबंधों और लाभ मार्जिन को बनाए रखना कठिन हो गया है।
बीमा और जोखिम शुल्क में वृद्धि
खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले जहाजों की लागत युद्ध जोखिम बीमा और अन्य अधिभारों के कारण भी बढ़ गई है। युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम, जो पहले जहाज के मूल्य का लगभग 0.10–0.125 प्रतिशत था, अब बढ़कर लगभग 1 प्रतिशत तक पहुंच गया है, यानी इसमें लगभग दस गुना वृद्धि हुई है। इसी प्रकार खाड़ी क्षेत्र से गुजरने के लिए बीमा प्रीमियम भी 0.125–0.20 प्रतिशत से बढ़कर 0.20–1 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो जोखिम के आकलन पर निर्भर करता है।
शिपिंग कंपनियों ने अतिरिक्त युद्ध जोखिम अधिभार भी लागू कर दिया है। कुछ मामलों में निर्यातकों ने प्रति कंटेनर लगभग 1,500 डॉलर तक का अतिरिक्त शुल्क लगने की सूचना दी है। इन अतिरिक्त लागतों के कारण निर्यातकों पर भारी वित्तीय दबाव पड़ रहा है, विशेष रूप से तब जब जहाज रद्द होने के कारण शिपमेंट में देरी हो रही है।
बासमती की कीमतों में गिरावट
इस संकट का असर घरेलू चावल बाजार पर भी पड़ने लगा है। निर्यातकों के अनुसार संकट शुरू होने के बाद पिछले 72 घंटों में भारत में बासमती चावल की कीमतों में लगभग 7-10 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। इससे निर्यातकों की कार्यशील पूंजी और लाभप्रदता पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि कीमतों में गिरावट, मालभाड़ा लागत में वृद्धि और शिपमेंट में देरी का संयुक्त प्रभाव निर्यातकों के नकदी प्रवाह पर गंभीर दबाव पैदा कर रहा है।
विभिन्न चरणों पर फंसा माल
निर्यातकों का कहना है कि इस समय निर्यात श्रृंखला के अलग-अलग चरणों में माल फंसा हुआ है। कुछ शिपमेंट जहाजों के रद्द होने के कारण लोडिंग पोर्ट पर ही अटके हुए हैं, जिससे भंडारण, डिमरेज और ग्राउंड रेंट जैसे शुल्क बढ़ते जा रहे हैं। कुछ माल रास्ते में ही फंसा हुआ है क्योंकि शिपिंग कंपनियों ने मार्ग बदल दिए हैं या देरी हो रही है। कुछ मामलों में माल गंतव्य बंदरगाह तक पहुंच चुका है, लेकिन बंदरगाहों पर भीड़ और लॉजिस्टिक अनिश्चितता के कारण डिलीवरी में देरी हो रही है।
परिवहन का समय भी काफी बढ़ गया है। पहले जो शिपमेंट स्वेज मार्ग से 25-30 दिन में पहुंचते थे, वे अब कुछ मामलों में 35-45 दिन ले रहे हैं, क्योंकि जहाजों को जोखिम वाले क्षेत्रों से बचने के लिए लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
सरकार से तत्काल राहत की मांग
इन परिस्थितियों को देखते हुए इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने सरकार और एपीडा से कई राहत उपायों की मांग की है। मुख्य मांगों में से एक यह है कि जहाजों के रद्द होने या संकट से जुड़े अन्य कारणों के चलते रुके हुए माल पर लगने वाले भंडारण, डिमरेज और अन्य बंदरगाह शुल्कों को माफ किया जाए।
निर्यातकों ने यह भी अनुरोध किया है कि रास्ते में फंसे माल को वापस लाने या वैकल्पिक बाजारों में मोड़ने की अनुमति दी जाए। इसके लिए सीमा शुल्क विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक के साथ समन्वय कर दस्तावेजी और भुगतान से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने की आवश्यकता होगी।
एक अन्य प्रमुख मांग यह है कि सरकार इस व्यवधान को फोर्स मेज्योर जैसी असाधारण स्थिति के रूप में मान्यता देने वाला आधिकारिक परामर्श जारी करे। निर्यातकों का कहना है कि इससे उन्हें खरीदारों द्वारा लगाए जाने वाले अनुचित जुर्माने, कीमतों में कटौती या अनुबंध रद्द करने जैसी स्थितियों से बचने में मदद मिलेगी।
बैंकिंग और कार्यशील पूंजी सहायता की मांग
फेडरेशन ने बैंकों से भी प्रभावित निर्यातकों को अस्थायी कार्यशील पूंजी सहायता देने की मांग की है। निर्यातकों ने सुझाव दिया है कि कोविड-19 के दौरान दी गई राहत की तरह अतिरिक्त क्रेडिट सीमा और अस्थायी वित्तीय छूट प्रदान की जाए। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि इस तरह का समर्थन निर्यात गतिविधियों को जारी रखने और भारत की निर्यात प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
व्यापार पर पड़ सकता है असर
निर्यातकों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है या और बढ़ता है, तो स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है। मालभाड़ा बढ़ने, माल की आवाजाही में अनिश्चितता और बीमा जोखिम बढ़ने के कारण भारत की चावल निर्यात आपूर्ति श्रृंखला लंबे समय तक प्रभावित रह सकती है।
फेडरेशन ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर संबंधित मंत्रालयों और शिपिंग प्राधिकरणों के साथ उठाए, ताकि लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को स्थिर किया जा सके और निर्यातकों को बढ़ते नुकसान से बचाया जा सके।
उद्योग जगत का कहना है कि समय पर हस्तक्षेप नहीं किया गया तो यह संकट न केवल निर्यातकों की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत की चावल आपूर्ति प्रतिबद्धताओं को पूरा करना भी मुश्किल हो सकता है।