देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती के संकेत मिलने लगे हैं। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के ताजा रूरल इकोनॉमिक कंडीशंस एंड सेंटिमेंट्स सर्वे, राउंड12 (जुलाई 2026) के अनुसार, पिछले एक साल में आय बढ़ने की बात कहने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात घटकर 27.7 प्रतिशत रह गया है, जो सितंबर 2024 में शुरू हुए इस सर्वे का अब तक का सबसे निचला स्तर है। वहीं, 52.6 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने बताया कि पिछले एक साल में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं आया, जबकि 19.8 प्रतिशत परिवारों ने आय घटने की बात कही। इस प्रकार, 72.4 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है।
वहीं दूसरी ओर, उपभोग खर्च बढ़ने की बात कहने वाले ग्रामीण परिवारों का अनुपात घटकर 74.1 प्रतिशत रह गया। सर्वे शुरू होने के बाद केवल दूसरी बार यह आंकड़ा 75 प्रतिशत से नीचे आया है। ग्रामीण परिवार अपनी मासिक आय का लगभग दो-तिहाई (66.5%) हिस्सा उपभोग पर खर्च कर रहे हैं। जबकि उनकी आय का 12.5 प्रतिशत कर्ज चुकाने में खर्च हो जाता है।
सर्वे के अनुसार, पिछले वर्ष की तुलना में वित्तीय बचत बढ़ने की बात कहने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 17.8 प्रतिशत रह गया, जो सर्वे का अब तक का सबसे निचला स्तर है।
आमदनी में सुस्ती के साथ ग्रामीण परिवारों की अनौपचारिक कर्ज स्रोतों, जैसे रिश्तेदारों और साहूकारों, पर निर्भरता भी बढ़ रही है। विशेषज्ञ इसे ग्रामीण वित्तीय दबाव का शुरुआती संकेत मान रहे हैं। नाबार्ड का यह द्विमासिक सर्वे देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 20,000 ग्रामीण परिवारों पर आधारित है।
आधे से ज्यादा परिवारों की आय में कोई बढ़ोतरी नहीं
सर्वे के मुताबिक, 52.6 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने बताया कि पिछले एक साल में उनकी आय में कोई बदलाव नहीं आया। यह सर्वे शुरू होने के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं 19.8 प्रतिशत परिवारों ने आय घटने की बात कही। खास बात यह है कि नवंबर 2025 के बाद से लगातार ऐसे परिवारों का अनुपात घटता जा रहा है, जिनकी आय में बढ़ोतरी हुई है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि ग्रामीण आय बढ़ने की रफ्तार कमजोर पड़ रही है।
नाबार्ड के सर्वे में ग्रामीण परिवारों का उपभोग पर खर्च कम होने के भी संकेत मिले हैं। उपभोग खर्च बढ़ने की बात कहने वाले परिवारों का अनुपात घटकर 74.1 प्रतिशत रह गया, जबकि मई 2026 में यह 77.2 प्रतिशत और जुलाई 2025 में 76.6 प्रतिशत था। सर्वे शुरू होने के बाद यह केवल दूसरी बार है, जब यह आंकड़ा 75 प्रतिशत से नीचे आया है।
ग्रामीण परिवार आय का बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च कर रहे हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, औसतन मासिक घरेलू आय का 66.5 प्रतिशत उपभोग पर खर्च हो जाता है, जबकि 12.5 प्रतिशत आय कर्ज चुकाने में चली जाती है। यह दर्शाता है कि ग्रामीण परिवारों पर वित्तीय दबाव लगातार बना हुआ है।
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि वित्तीय बचत बढ़ने की जानकारी देने वाले परिवारों का अनुपात घटकर केवल 17.8 प्रतिशत रह गया है, जो सर्वे शुरू होने के बाद का सबसे निचला स्तर है।

रिश्तेदारों और साहूकारों से कर्ज
सर्वे का सबसे चिंताजनक पहलू ग्रामीण परिवारों की औपचारिक कर्ज स्रोतों से बढ़ती दूरी है। जुलाई 2026 में 51 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि वे केवल औपचारिक स्रोतों—बैंक, एनबीएफसी या माइक्रोफाइनेंस संस्थानों—से कर्ज लेते हैं। जबकि नवंबर 2025 में यह आंकड़ा 58.3 प्रतिशत था।
इसके विपरीत, केवल अनौपचारिक स्रोतों से कर्ज लेने वाले परिवारों की हिस्सेदारी बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गई। इनमें 16.2 प्रतिशत परिवार केवल मित्रों और रिश्तेदारों से कर्ज लेते हैं, जबकि 6 प्रतिशत केवल साहूकारों से उधार लेते हैं और 1.4 प्रतिशत दोनों स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा, 25.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ऐसे हैं, जो औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्रोतों से कर्ज लेते हैं। सर्वे के अनुसार, अनौपचारिक स्रोतों से लिए गए कर्ज पर औसतन 17.77 प्रतिशत ब्याज चुकाना पड़ता है। हालांकि, लगभग 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि उन्होंने ब्याज-मुक्त उधार लिया, जिससे संकेत मिलता है कि यह ऋण मुख्यतः मित्रों और रिश्तेदारों से लिया गया था।
अनौपचारिक कर्ज पर बढ़ती निर्भरता यह संकेत देती है कि ग्रामीण परिवारों पर नकदी का दबाव बढ़ रहा है या औपचारिक कर्ज तक उनकी पहुंच सीमित हो रही है।
कमजोर मानसून और महंगाई
ग्रामीण आय पर दबाव ऐसे समय में दिख रहा है, जब देश में महंगाई बढ़ रही है और मानसून भी कमजोर बना हुआ है। जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 17 महीनों का उच्चतम स्तर है। दूसरी ओर, अल-नीनो की आशंका के बीच मानसून में देरी और वर्षा की कमी ने कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है।
ग्रामीण परिवारों की भविष्य को लेकर उम्मीदों में भी गिरावट दर्ज की गई। अगले तीन महीनों में आय और रोजगार बेहतर होने की उम्मीद जताने वाले परिवारों का अनुपात सर्वे शुरू होने के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। अगले एक वर्ष में आय बढ़ने की उम्मीद रखने वाले परिवारों का अनुपात भी घटकर 66.8 प्रतिशत रह गया, जो अब तक का सबसे कम स्तर है। सर्वे के अनुसार, मानसून को लेकर अनिश्चितता और व्यापक आर्थिक परिस्थितियां इसके प्रमुख कारण हैं।