सालाना 41,000 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाली इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) विश्व की सबसे बड़ी सहकारी उर्वरक संस्था है। देश के खाद्य सुरक्षा संकट वाले दौर से निकल कर दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातकों में शुमार होने तक, इफको ने किसानों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई है। इफको के मैनेजिंग डायरेक्टर के.जे. पटेल के साथ रूरल वर्ल्ड (रूरल वॉयस के प्रिंट पब्लिकेशन) के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह और एक्जीक्यूटिव एडिटर अजीत सिंह ने एक इंटरव्यू में इफको की बदलती भूमिका, किसानों के साथ उसके भरोसेमंद रिश्ते और उर्वरक क्षेत्र की चुनौतियों पर बात की। साथ ही उनके नेतृत्व में इफको के विजन और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। मुख्य अंशः
इफको की स्थापना के 60 साल होने वाले हैं। स्थापना के समय से अब तक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। नई तरह की चुनौतियां सामने हैं। आपके नेतृत्व में इफको की भूमिका और कृषि क्षेत्र को आप कैसे देखते हैं?
वर्ष 1967 में जब इफको की स्थापना हुई, तब देश में उर्वरकों की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से हालात वाकई बहुत मुश्किल थे। नवंबर 1967 में इफको को एक कोऑपरेटिव सोसाइटी के तौर पर रजिस्टर किया गया। इसकी स्थापना सहकारिता के सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसके मालिक किसान हैं, जिसका उद्देश्य कृषक समुदाय की सेवा करना था। आज तक यही हमारा परम लक्ष्य है।
इसकी स्थापना के समय देश को उर्वरकों की सख्त जरूरत थी। आज के जितने बड़े-बड़े संयंत्रों को चलाना मुश्किल था। पहले इफको के कलोल और कांडला के छोटे प्लांट शुरू हुए। एक यूरिया और दूसरा फॉस्फेटिक का। जनवरी 1975 में हमने उर्वरक उत्पादक के तौर पर पर काम करना शुरू किया। शुरुआती जरूरत थी कि सरकार की मदद और कोऑपरेटिव के पैसे से फर्टिलाइजर बनाया जाए। इफको की स्थापना के 58 साल बाद आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। आज हमारी 35,600 से ज्यादा सहकारी समितियां हैं और हम देश के 4.5 करोड़ से ज्यादा किसानों से जुड़े हैं। उस समय खाद्य सुरक्षा की चिंता थी, आज खाद्य सुरक्षा स्थापित हो चुकी है। हम अनाज का आयात नहीं, बल्कि निर्यात करते हैं।
अगर हम उर्वरकों को देखें, तो इफको की भूमिका बहुत अहम हो जाती है क्योंकि आज भी हम किसानों को देश में बने फर्टिलाइजर उपलब्ध कराने में आत्मनिर्भर नहीं हैं। वैश्विक व्यापार का असर इफको जैसी सहकारी संस्थाओं पर पड़ता है। फिर भी हम नई टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और किसानों की भागीदारी के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
इफको पर किसान बहुत भरोसा करते हैं। क्या प्राइवेट कंपनियों के मुकाबले किसानों से इफको का यह रिश्ता फर्क पैदा करता है?
निश्चित तौर पर। जब मैं खेतों में जाता हूं और किसानों से मिलता हूं, तो अक्सर लोग कहते हैं- इफको का खाद आ गया, मतलब पहले उठाओ। बाकी किसी भी कंपनी का आया तो बाद में लेंगे। क्यों? क्योंकि यह किसानों की संस्था है। इसके बिजनेस से होने वाला लाभ किसानों तक पहुंच रहा है। इफको ने 1975 में उर्वरक उत्पादन शुरू किया था। तब से उर्वरकों और सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर किसानों का भरोसा इफको पर निरंतर बढ़ रहा है।
उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल के साथ गुणवत्ता वाले उर्वरक किफायती दाम पर उपलब्ध कराने की चुनौती है। इफको पर भी लागत घटाने का दबाव है। आप इसे कैसे देखते हैं?
यूरिया हमारे देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। लंबे समय से सरकार किसानों को 266 रुपये में यूरिया का बैग दे रही है। सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। सरकार की पॉलिसी इस बात पर आधारित है कि आप कितने प्रभावी और कितने एनर्जी एफिशिएंट हैं। आप संसाधनों की कैसे बचत करते हैं। इससे आप या तो फायदे में रहते हैं या नुकसान में। किसानों को सही गुणवत्ता के उर्वरक उपलब्ध कराना जरूरी है। सब्सिडी के जरिए किसानों को सस्ते दाम पर उर्वरक मिल पाते हैं। लेकिन इस पर सरकार को बड़ा खर्च करना पड़ता है। यहां इंडस्ट्री की भूमिका आती है कि इफको जैसे संगठन सरकार का बोझ कम करने में कैसे मदद कर सकते हैं।
इफको में हमारा मकसद सिर्फ वही प्रोड्यूस करते जाना नहीं जो हम प्रोड्यूस कर रहे हैं। अगर वही मकसद होता तो हम नैनो फर्टिलाइजर, बायोस्टिमुलेंट या बायो फर्टिलाइजर लेकर नहीं आते। कई साल से हम बायो फर्टिलाइजर बना रहे हैं। हम केमिकल फर्टिलाइजर्स से दूर जाने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। अगर हमें सब्सिडी से मुक्त होना है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादन लागत कम हो और इनोवेटिव फर्टिलाइजर डेवलप हों। इसके लिए हमने तीन-चार साल पहले इफको-नैनोवेंशंस प्रा.लि. की स्थापना की थी। इसमें 30-35 पीएचडी स्कॉलर और कृषि विशेषज्ञ काम कर रहे हैं। हमने हाल ही वहां इनोवेशन हब बनाया है।
नैनो के लिए कलोल यूनिट में नैनो बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (एनबीआरसी) है। हम नए प्रोडक्ट्स की भी पहचान कर रहे हैं जो किसानों को रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव से बचाएं। हमारी खेती की सस्टेनेबिलिटी इन इनोवेटिव प्रोडक्ट्स पर बहुत निर्भर करती है। प्राकृतिक या ऑर्गेनिक खेती और विशेष उर्वरकों पर आधारित खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि आयात पर निर्भरता और सब्सिडी का बोझ कम हो सके।
हर साल लगभग 400 लाख टन यूरिया खपत में 100 लाख टन आयात होता है। क्या यूरिया की बढ़ती मांग को पूरा करने और आयात निर्भरता घटाने के लिए नए प्लांट लगाने की योजना है?
यूरिया की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने एचयूआरएल के जरिये नये उत्पादन संयंत्र लगाये हैं। इससे कैपेसिटी बढ़ी है। देश की आबादी और औसत आयु बढ़ने के साथ कृषि उत्पादों की मांग हर साल बढ़ती जाएगी। उत्पादन बढ़ाने के लिए सिर्फ यूरिया पर निर्भर रहना ठीक नहीं। यूरिया एक केमिकल फर्टिलाइजर है, जिसमें कई दिक्कतें हैं। जब से नैनो यूरिया या नैनो डीएपी आया, हमने किसानों के साथ काम करना शुरू किया है। हमें सोचना है कि क्या हम केमिकल फर्टिलाइजर से कुछ खास उर्वरकों पर स्विच नहीं कर सकते? यूरिया के रूप में अमोनियाकल नाइट्रोजन मिट्टी में जाता है तो नाइट्रस ऑक्साइड बनकर बारिश के पानी के साथ मिट्टी को खराब कर रहा है। मिट्टी के अंदर ऑर्गेनिक कार्बन दिन-ब-दिन कम हो रहा है।
हम केवल यूरिया उत्पादन बढ़ाने के लिए नए यूरिया प्लांट लगाने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि देश प्राकृतिक गैस में भी आयात पर निर्भर है। हम नया यूरिया प्लांट लगाएंगे तब भी गैस के लिए दूसरे देशों पर ही निर्भर रहेंगे। हमारी सोच है कि हमें गैस सही कीमत पर मिले जो यूरिया की उत्पादन लागत के हिसाब से देश के लिए फायदेमंद हो। हमें यूरिया बनाकर रियायती दरों पर किसानों को बेचना है। इसलिए मैं ऐसा प्लांट नहीं लगा सकता जो इकोनॉमिक्स के हिसाब से काम न करे। अगर इकोनॉमिक्स पक्ष में है तो हम देश के बाहर ऐसा कर सकते हैं। हम पता लगा सकते हैं कि सस्ते रिसोर्स कहां उपलब्ध हैं। आजकल कोई भी देश कच्चा माल देने को तैयार नहीं है। सभी देश अपने यहां कुछ न कुछ वैल्यू एडिशन करवाना चाहते हैं। खाड़ी देश हो या इंडोनेशिया या मोरक्को, वे चाहते हैं कि आप उनके देश में निवेश करें। उनके देश में गैस को अमोनिया व यूरिया में बदलिए और अपने देश ले जाइए।
हमने कभी यह भी नहीं सोचा कि इफको को बिजनेस से क्या प्रॉफिट मिलेगा। जैसे 2021 में डीएपी की बहुत जरूरत थी, तब इफको के बोर्ड ने तय किया कि डीएपी का उत्पादन करेंगे, भले हमें नुकसान उठाना पड़े। इफको को देखकर दूसरी कंपनियों ने भी शुरुआत की। सरकार ने वादा किया और फिर इस बात पर सहमति बनी कि जो भी नुकसान होगा उसकी भरपाई की जाएगी। आज भी देश में डीएपी के उत्पादन में 71% योगदान इफको का है।
उर्वरक आयात पर अत्यधिक निर्भरता है। वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उर्वरकों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी?
एक तो हम केमिकल फर्टिलाइजर इस्तेमाल करने की होड़ से बाहर निकलें और अपने किसानों को यह भरोसा दिलाएं कि उसके बिना भी अच्छी खेती हो सकती है। खेती एक टेक्नोलॉजी है, किसानों को उस टेक्नोलॉजी पर अमल करना होगा। किसानों की सोच में बड़ा बदलाव लाना होगा। यूरिया, डीएपी या एनपीके और पोटाश जैसे केमिकल फर्टिलाइजर लंबे समय तक काम नहीं आने वाले। पैदावार से समझौता किए बिना किसान कैसे बदलाव करें, उस दिशा में किसानों को ले जाना है। खेती के लिए उपलब्ध जमीन कम होती जा रही है। हम नहीं चाहते कि किसानों को ज्यादा केमिकल फर्टिलाइजर बनाकर दें, लेकिन माइंडसेट बदलने में तो समय लगेगा।
किसानों के बीच जैविक या प्राकृतिक खेती को कैसे बढ़ावा दिया जा रहा है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया है कि हर किसान कम से कम एक एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती करे। अगर सभी किसान अपनी थोड़ी-सी जमीन पर भी ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत करें तो इससे बड़ा बदलाव आ सकता है। ऑर्गेनिक खेती का मतलब यह नहीं कि इसमें कोई फर्टिलाइजर नहीं दिया जा रहा है। कई तरह के ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर उपलब्ध हैं, किसान उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
हम ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर की उपलब्धता पर भी ध्यान दे रहे हैं। ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर, स्पेशलिटी फर्टिलाइजर, ग्रोथ प्रमोटर, बायो-स्टिमुलेंट- हम कैसे इन्हें बनाएं, कैसे किसानों तक पहुंचाएं और उन्हें प्रशिक्षित करें। हम सुनिश्चित करेंगे कि उनका पैसा बर्बाद न हो। हम किसानों को केमिकल फर्टिलाइजर के बारे में जागरूक कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। देश भर में हमने 750 से 800 किसानों का नेटवर्क तैयार किया है। इन्हें गांव के हर किसान तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई है। हमारे ब्रांड एंबेसेडर के रूप में ये लोग किसानों को ऑर्गेनिक खेती या केमिकल-फ्री खेती के फायदे और केमिकल फर्टिलाइजर के बुरे असर के बारे में समझाएंगे।
इफको नैनो फर्टिलाइजर को प्रमोट कर रही है। किसानों का रेस्पॉन्स कैसा है?
नैनो का भविष्य बहुत बढ़िया है। नैनो फर्टिलाइजर को नैनोटेक्नोलॉजी के आधार पर बनाया गया है। इस पर काफी रिसर्च हुई है। नैनो फर्टिलाइजर के लिए इफको और एनबीआरसी ने एक इनिशिएटर और इनोवेटर के तौर पर बहुत कोशिशें की हैं। हमने साबित किया कि जो बना रहे हैं, वह खेत में कारगर है। नैनो फर्टिलाइजर को बहुत से ट्रायल, फील्ड ट्रायल और अलग-अलग जगहों पर आईसीएआर लैब और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में परखा गया है।
नैनो के बारे में सबसे जरूरी बात यह है कि यह पारंपरिक फर्टिलाइजर से अलग है। इसके इस्तेमाल की गहरी जानकारी होनी चाहिए। पारंपरिक उर्वरकों को खेतों में छिड़ककर डाला जाता है। नैनो उर्वरकों का उपयोग बुवाई के समय बीज ट्रीटमेंट में किया जा सकता है। नैनो डीएपी से कितने प्रतिशत सॉल्यूशन में ट्रीटमेंट करना है, यह जानकारी बहुत जरूरी है।नैनो उर्वरकों के उपयोग की विधि (SOP) हर किसान को समझानी होगी। उसके आधार पर बीजों का ट्रीटमेंट होगा। कितने दिनों में पत्तियां निकल जाएंगी जो नैनो नाइट्रोजन को सोख लेंगी। पौधे की उम्र के हिसाब से स्प्रे करना होगा। स्प्रे भी एक खास कंसंट्रेशन में करना चाहिए। मिट्टी में किस न्यूट्रिएंट की कमी है और फसल को किस न्यूट्रिएंट की जरूरत है, नैनो उर्वरकों का उपयोग इन पर निर्भर करता है।
इन बातों को समझकर अगर किसान नैनो का इस्तेमाल करें तो बेहतर परिणाम मिलेंगे। कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश यहां तक कि पंजाब में भी किसान नैनो फर्टिलाइजर का इस्तेमाल कर रहे हैं। नैनो फर्टिलाइजर का प्रयोग करने वाले किसान हमारे बोर्ड में भी हैं। हम उनसे भी इनपुट लेते हैं। सब इसे ठीक कहते हैं। देश में लगभग साढ़े चार करोड़ किसान कोऑपरेटिव सोसाइटी के माध्यम से इफको से जुड़े हैं। नैनो के हर जागरूकता कार्यक्रम में हमें अच्छा इनपुट मिलता है।
ड्रोन के जरिए नैनो फर्टिलाइजर के स्प्रे की पहल भी इफको ने की है, इसके पीछे क्या सोच है?
नैनो दानेदार पारंपरिक फर्टिलाइजर से अलग, एक लिक्विड फर्टिलाइजर है। इसको स्प्रे करने में किसानों को परेशानी आ रही थी। तब हमने 225 करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश कर 1,800 से अधिक ड्रोन खरीदे। हमने ड्रोन दीदी प्रोग्राम के लिए 300 ड्रोन दिए। हम चाहते हैं कि ड्रोन टेक्नोलॉजी किसानों के लिए फर्टिलाइजर स्प्रे में काम आए। इसी तरह नैनो के स्प्रेयर किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं ताकि एक बार किसान नैनो उर्वरकों की शुरुआत करें। एक बार शुरुआत होगी तो किसान एक-दूसरे को देखेंगे और फिर यह बढ़ेगा। हम नैनो की बिक्री की बजाय इसकी ट्रेनिंग पर ध्यान दे रहे हैं। इफको के 700-800 एडिशनल फील्ड रिप्रेजेंटेटिव एग्रीकल्चर ग्रेजुएट हैं। वे किसानों को नैनो फर्टिलाइजर के साथ ऑर्गेनिक फार्मिंग, केमिकल फर्टिलाइजर के दुष्प्रभाव और सागरिका जैसे प्रोडक्ट की जानकारी भी देते हैं।

नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के बाद अब किस तरह के उत्पाद या इनोवेशन लाए जा रहे हैं?
हम देख रहे हैं कि जिन किसानों को नैनो उत्पादों के स्प्रे में कठिनाई होती है, उनके लिए क्या विकल्प हो सकते हैं। हमने नैनो एनपीके ग्रेन्युलर उत्पाद तैयार किया है। इसे एफसीओ में मंजूरी मिल चुकी है। अब हम किसानों को नैनो एनपीके ग्रेन्युलर के रूप में नया विकल्प उपलब्ध कराएंगे। हमने नैनो मिशन के तहत केले के रस और सी-वीड का इस्तेमाल करके एक नया उत्पाद ‘धरामृत’ विकसित किया है।
उर्वरकों के असंतुलित उपयोग की समस्या लंबे समय से चर्चा में है। क्या इस पर सरकार की कोई नीति आनी चाहिए?
इस विषय पर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी जिसमें केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल, उर्वरक विभाग की सचिव, ICAR, कृषि विश्वविद्यालयों और उर्वरक उद्योग से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। हम सब्सिडी पर खर्च करते हैं। लेकिन उर्वरक सब्सिडी का पैसा सीधे किसानों तक नहीं जाता, न ही इंडस्ट्री को जाता है। बड़ा हिस्सा उन देशों को जाता है जहां से हम कच्चा माल खरीदते हैं। मतलब हम जो पैसा खर्च करते हैं उसका बड़ा हिस्सा विदेश चला जाता है। आज उर्वरक सब्सिडी का सालाना बिल 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। यदि हम नई तकनीक के माध्यम से पारंपरिक उर्वरकों का उपयोग 25 प्रतिशत भी कम कर दें, तो लगभग 50,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। यह पैसा किसानों की आय बढ़ाने, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं पर खर्च किया जा सकता है।
हाल ही मैं अमेरिका के अटलांटा गया था, जहां कोका-कोला की शुरुआत हुई थी। वहां कोका-कोला वर्ल्ड सेंटर और उनकी लैब देखने का मौका मिला। एक जगह लिखा था कि जब कोका-कोला का आविष्कार हुआ, तब पहले साल उसकी औसत बिक्री प्रतिदिन केवल 9 बोतल थी। आज हर दिन दुनिया में लगभग 2 अरब बोतलें कोका-कोला या उससे जुड़े उत्पादों की बिकती हैं।
इसी तरह हमने 2021 में नैनो उर्वरक लॉन्च किए। अभी पांच साल भी पूरे नहीं हुए और हम हर साल लगभग 4 करोड़ बोतलें बेच रहे हैं। अब हमने नैनो की बिक्री बढ़ाने पर जोर देना बंद कर दिया है। डीलरों से साफ कह दिया है कि कोई जबरन टैगिंग नहीं करेगा। कोई टैगिंग करेगा तो उसकी डीलरशिप बंद कर देंगे। जो किसान स्वेच्छा से लेना चाहते हैं, वही लें। इसके उत्पादन के लिए हमने लगभग 1900 करोड़ रुपये का निवेश किया है और हमारी सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 29 करोड़ बोतलों की है। फिलहाल हम 4 करोड़ बोतलें ही बना रहे हैं। यह हमारे लिए संतोष की बात है कि देश में इतने किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं।
क्या आपको लगता है कि भारत को नए उर्वरक मॉलिक्यूल विकसित करने की जरूरत है ताकि देश में उपलब्ध संसाधनों से नए उर्वरक बनाए जा सकें?
हमें केवल नए मॉलिक्यूल विकसित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी देखना होगा कि पूरे उर्वरक उद्योग को व्यावसायिक रूप से अधिक प्रभावी और आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए। अगर हम आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी की बात करते हैं, तो हमें ऐसे उर्वरक विकसित करने होंगे जिनमें देश में उपलब्ध संसाधनों का अधिक उपयोग हो। उदाहरण के लिए हमने नैनो, धरामृत और सागरिका जैसे उत्पाद विकसित किए हैं।
हम यह भी देख रहे हैं कि भारत में उपलब्ध रॉक फॉस्फेट को कैसे पौधों के पोषण के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। राजस्थान में फॉस्फेट के भंडार हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर फॉस्फोरिक एसिड उत्पादन के लिए उनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं है। हम ऐसी तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे इस रॉक फॉस्फेट का इस्तेमाल किया जा सके। अगर यह सफल हुआ तो आयात पर निर्भरता कम होगी।
इफको अब केवल उर्वरक उत्पादक सहकारी संस्था नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में सक्रिय कंपनियों का एक बड़ा समूह है। राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर इसके कई ज्वाइंट वेंचर हैं। एमडी के तौर अगले एक साल में किस तरह के बदलाव और ग्रोथ देखते हैं?
हमारा पहला लक्ष्य है कि इफको की सभी सहायक कंपनियां और संस्थाएं पूरी क्षमता के साथ काम करें। हमने जहां भी निवेश किया, उसकी क्षमता और उद्देश्य को पूरी तरह उपयोग में लाया जाए। पंजाब में हमारी एक परियोजना कोविड के कारण रुक गई थी। अब हम अपने स्पेनिश पार्टनर्स के साथ बात कर रहे हैं ताकि उसे फिर शुरू किया जा सके। अगर लुधियाना के आसपास आलू, टमाटर या अन्य कृषि उत्पादों को प्रोसेस करके फ्रोजन फूड में बदल सकें और उसे देश-विदेश में बेच सकें, तो इससे किसानों की आय बढ़ेगी।
हम ऊर्जा के क्षेत्र में भी नए विकल्प तलाश रहे हैं। उर्वरक उत्पादन के लिए बिजली की बहुत जरूरत होती है। इसलिए हम सोलर और विंड पावर का उपयोग बढ़ा रहे हैं। शुरुआत में हम सोलर पावर खरीदेंगे और धीरे-धीरे कैप्टिव सोलर और विंड पावर जेनरेशन की तरफ बढ़ेंगे।
हम नैनो का एक प्लांट ब्राजील में लगा रहे हैं। जब हम ब्राजील के किसानों से बात कर रहे थे, तो उन्होंने हमसे पूछा कि क्या हम उनके लिए टेलर-मेड नैनो फर्टिलाइजर बना सकते हैं, जो उनकी मिट्टी और फसलों के हिसाब से हो। हमने अपने वैज्ञानिकों के साथ चर्चा की। उन्होंने कहा कि यह तकनीकी रूप से संभव है। जब हम नैनो नाइट्रोजन, नैनो P2O5 और नैनो कॉपर जैसी तकनीक विकसित कर सकते हैं, तो इस तरह के उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। इसी सोच के तहत ब्राजील में प्लांट लगाया जा रहा है। यह प्लांट जून-जुलाई तक स्थापित हो जाएगा। इस पर 50 करोड़ रुपये से कुछ कम का निवेश होगा। शुरुआत में इसकी क्षमता लगभग 15 लाख लीटर होगी। आगे मांग बढ़ने पर इसका विस्तार किया जा सकता है।
सरकार सहकारिता को बढ़ावा दे रही है। नई सहकारिता नीति भी आई है। इसे आप कैसे देखते हैं?
अलग सहकारिता मंत्रालय बनने के बाद जिस तरह सहकारी संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, वह अभूतपूर्व है। सहकारी संस्थाएं भरोसे और साझेदारी पर आधारित होती हैं, इसलिए इनका आर्थिक और सामाजिक महत्व बहुत बड़ा है। उदाहरण के तौर पर, हम हर साल 400-500 करोड़ रुपये के बैग खरीदते हैं। ये उर्वरकों की पैकेजिंग में इस्तेमाल होते हैं और हम इन्हें सप्लायर्स से खरीदते हैं। अब हम सोच रहे हैं कि क्यों न अपनी ही मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाकर बैग का उत्पादन करें। इससे हमारी जरूरत पूरी होने के साथ अन्य उद्योगों को भी बैग की आपूर्ति की जा सकेगी।
वैश्विक तनाव को देखते हुए उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चिंताएं खड़ी हो गई हैं। उर्वरक आत्मनिर्भरता के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
हमारे कांडला प्लांट को चलाने के लिए हर साल 8-8.5 लाख टन फॉस्फोरिक एसिड की आवश्यकता होती है। इसका बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है। जहाँ-जहाँ से यह कच्चा माल आ रहा है, हम उसकी पूरी सप्लाई को लगातार मॉनिटर कर रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि भविष्य में इसकी कमी तो नहीं हो सकती। अगर ऐसी संभावना दिखती है तो हम अन्य देशों के साथ साझेदारी की संभावनाएं तलाशते हैं। कई देशों के साथ हमारी बातचीत चल रही है। जॉर्डन और यूएई के अलावा मोरक्को और सेनेगल जैसे देशों में भी अच्छी गुणवत्ता के फॉस्फेट भंडार हैं।
अगले 10 साल में इफको को एक समूह के रूप में कहां देखते हैं?
सबसे पहले तो मैं यह देखना चाहूँगा कि अगले दस वर्षों में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग 50 फीसदी तक कम हो जाए। हम नई पीढ़ी के उर्वरकों और आधुनिक तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं। सरकार की नीतियाँ, उर्वरक उद्योग की पहल और किसानों की बढ़ती जागरूकता से आने वाले वर्षों में खेती में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा। अब केवल नैनो उर्वरकों की बात नहीं रह गई है। कई कंपनियां स्पेशलिटी और हाई-वैल्यू फर्टिलाइजर विकसित कर रही हैं। डिजिटल तकनीक भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हमारा ई-बाजार प्लेटफॉर्म इसका उदाहरण है।
यह धारणा बन रही है कि किसानों की नई पीढ़ी खेती में नहीं आना चाहती। इसे आप किस तरह देखते हैं?
मुझे लगता है कि खेती को शिक्षा का हिस्सा बनाना बहुत जरूरी है। हम अन्य विषयों में बदलाव की बात करते हैं, लेकिन खेती को लेकर शिक्षा में उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है। देश की बड़ी आबादी खेती से जुड़ी है। इसलिए प्राइमरी स्कूल से लेकर सेकेंड्री या कॉलेज स्तर तक खेती से जुड़े विषय जरूर पढ़ाए जाने चाहिए। इसके लिए मैं स्टेट एजुकेशन बोर्ड से अनुरोध करता हूं। इससे खेती को लेकर लोगों के नजरिए में बड़ा बदलाव आएगा।
किसानों को अक्सर समाज में कम पढ़ा-लिखा समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि अगर उन्हें सही जानकारी और अवसर मिले तो वे नई तकनीकों को तेजी से अपनाते हैं। आज सबसे कमजोर कड़ी एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन सिस्टम है, इसे मजबूत करने की जरूरत है। हम एआई और नई तकनीक की बात तो कर रहे हैं, लेकिन जो किसान इन तकनीक का उपयोग करेंगे उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता है।