भारत का ऑयलमील निर्यात जून 2026 में सालाना आधार पर 31% घटकर 2,17,757 टन रह गया, जबकि जून 2025 में यह 3,13,404 टन था। अप्रैल-जून 2026 के दौरान कुल निर्यात 9,57,224 टन रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के 10.95 लाख टन की तुलना में 12.55% कम है।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक ऑयलमील बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर दबाव बना हुआ है। अर्जेंटीना और ब्राजील से मिलने वाले सस्ते सोयाबीन मील के कारण भारतीय सोयाबीन मील को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, घरेलू कीमतों में मजबूती और पशु आहार तथा पशुधन क्षेत्र की मजबूत मांग ने बड़े पैमाने पर निर्यात के लिए उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा को सीमित किया है।
जून में गिरावट से पहली तिमाही के दौरान निर्यात का रुझान मिला-जुला रहा। अप्रैल में 3,65,560 टन, मई में 3,73,907 टन और जून में 2,17,757 टन ऑयलमील का निर्यात हुआ। पिछले वर्ष की तुलना में अप्रैल में निर्यात 21.53% घटा, जबकि मई में 18.58% की वृद्धि दर्ज की गई। जून में निर्यात फिर 30.51% गिर गया।
एशियाई बाजारों में मजबूत मांग के कारण भारत से रेपसीड मील के निर्यात को सहारा मिला है। अप्रैल-जून के दौरान चीन भारत का सबसे बड़ा खरीदार रहा। चीन ने इस अवधि में 3,13,384 टन ऑयलमील आयात किया, जो पिछले साल के 1,87,361 टन से 67.26% अधिक है। इसमें अकेले 3,09,650 टन रेपसीड मील शामिल था।
बांग्लादेश ने अप्रैल-जून में 1,43,013 टन ऑयलमील आयात किया, जो सालाना आधार पर 13.19% अधिक है। वहीं, वियतनाम का आयात 55.96% बढ़कर 90,559 टन हो गया। इसके विपरीत, दक्षिण कोरिया का आयात 25.48% घटकर 1,08,186 टन और थाईलैंड का 12.50% घटकर 70,569 टन रह गया।
निर्यात पर शिपिंग बाधाओं का भी असर हो रहा है। लाल सागर क्षेत्र में जारी व्यवधान और ऊंची माल ढुलाई लागत ने निर्यात प्राप्तियों और पश्चिमी तथा यूरोपीय खरीदारों तक पहुंचने वाले समुद्री मार्गों को प्रभावित किया है। दूसरी ओर, घरेलू पशु आहार बाजार में डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स (DDGS) जैसे सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। यह इथेनॉल उद्योग का सह-उत्पाद है और इसके बढ़ते इस्तेमाल से पारंपरिक ऑयलमील की मांग प्रभावित हो रही है।
आगे ऑयलमील निर्यात की स्थिति वैश्विक कीमतों के मुकाबले भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता, घरेलू उपलब्धता और माल ढुलाई लागत पर निर्भर करेगी। ताजा आंकड़े बताते हैं कि एशियाई बाजारों में रेपसीड मील की मजबूत मांग से कुछ सहारा मिल रहा है, लेकिन सोयाबीन मील के निर्यात में कमजोरी कुल ऑयलमील निर्यात पर दबाव बनाए हुए है।