इस वर्ष भारत का सोया ऑयल उत्पादन घटकर 16 लाख टन रहने का अनुमानः USDA रिपोर्ट
USDA की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) की नई दिल्ली स्थित इकाई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सोयाबीन का क्षेत्र घटकर 1.05 करोड़ हेक्टेयर रह सकता है। इसके चलते कुल उत्पादन का अनुमान पहले के मुकाबले 8 प्रतिशत घटाकर 96 लाख मीट्रिक टन (MMT) कर दिया गया है।
वर्ष 2026-27 में भारत में सोयाबीन उत्पादन में गिरावट का अंदेशा है। इसका प्रमुख कारण मानसून की अनिश्चित बारिश और किसानों का अधिक लाभ वाली वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करना है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) की नई दिल्ली स्थित इकाई की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सोयाबीन का क्षेत्र घटकर 1.05 करोड़ हेक्टेयर रह सकता है। इसके चलते कुल उत्पादन का अनुमान पहले के मुकाबले 8 प्रतिशत घटाकर 96 लाख मीट्रिक टन (MMT) कर दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सोयाबीन की शुरुआती बुवाई को अल नीनो के प्रभाव से मानसून देर से आने के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ा। महाराष्ट्र के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में इसका असर विशेष रूप से देखा गया। जुलाई और अगस्त में बेमौसम तथा अनियमित बारिश ने फसल को और प्रभावित किया। इससे फलियों के बनने और तेल की संभावित उपज में कमी आई।
मौसम की अनिश्चितता से परेशान अनेक किसानों ने सोयाबीन की जगह कपास और मक्का की खेती को प्राथमिकता दी है। मक्के के पीछे बेहतर बाजार भाव और सरकार द्वारा तय महत्वाकांक्षी इथेनॉल मिश्रण लक्ष्य से जुड़ा समर्थन भी प्रमुख कारण रहा।
सोयाबीन उत्पादन में गिरावट का असर देश के कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र पर भी पड़ने की आशंका है। स्थानीय सोयाबीन क्रशिंग मात्रा 6 प्रतिशत घटकर 87 लाख टन रहने का अनुमान है। इससे सोयाबीन तेल उत्पादन घटकर करीब 16 लाख टन रह सकता है।
खाद्य तेल की संभावित कमी को पूरा करने के लिए भारत को आयात पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। पाम तेल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच रिफाइनर और उपभोक्ता सूरजमुखी तेल की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इसकी वजह से भारत का सूरजमुखी तेल आयात 41 प्रतिशत बढ़कर 31 लाख टन पहुंचने का अनुमान है। वहीं, भारत दक्षिण अमेरिका से अपेक्षाकृत सस्ता सोयाबीन तेल आयात करना जारी रखेगा। प्रसंस्करण के लिए बेनिन, नाइजर और टोगो जैसे अफ्रीकी देशों से नॉन-जेनेटिकली मॉडिफाइड (Non-GMO) कच्चे सोयाबीन का शुल्क मुक्त आयात भी जारी है।
घरेलू तिलहन की सीमित उपलब्धता से पशु आहार की लागत में भी तेज वृद्धि हुई है। कम क्रशिंग और मजबूत घरेलू मांग के कारण सोयामील की कीमतों में उछाल आया, जिससे फीड लागत 45 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई। बढ़ती लागत को नियंत्रित करने के लिए पोल्ट्री उत्पादकों ने उत्पादन में करीब 20 प्रतिशत की कटौती की।
महंगे सोयामील और सीमित घरेलू स्टॉक ने भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित किया है। भारतीय सोयामील का निर्यात चार वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गया है, क्योंकि वैश्विक खरीदार दक्षिण अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा सोयाबीन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी के बावजूद जुलाई और अगस्त में स्थानीय बाजार कीमतें 72 से 80 डॉलर प्रति क्विंटल तक पहुंच गईं, जो समर्थन मूल्य से काफी अधिक थीं। बेहतर बाजार भाव के कारण किसानों ने पुराने बचे हुए स्टॉक की बिक्री तेज कर दी, जिससे घरेलू सीजन के अंत में स्टॉक घटकर कई वर्षों के निचले स्तर 3 लाख टन पर आने का अनुमान है।

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