पेप्सिको-आलू किसान मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला निराशाजनक: किसान अधिकार कार्यकर्ता कविता कुरुगंती

किसान अधिकार कार्यकर्ता कविता कुरुगंती ने पेप्सिको-आलू किसान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निराशाजनक बताया है। उनका कहना है कि अदालत ने संरक्षित बीजों पर किसानों के अधिकारों को स्वीकार किया, लेकिन उन्हें प्रभावी सुरक्षा नहीं दी। यह विवाद गुजरात के किसानों पर पेप्सिको के मुकदमों से शुरू हुआ था।

किसान अधिकार कार्यकर्ता कविता कुरुगंती ने पेप्सिको और आलू किसानों से जुड़े लंबे समय से चल रहे मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को बेहद निराशाजनक बताया है। उनका कहना है कि फैसले में संरक्षित बीज किस्मों पर किसानों के कानूनी अधिकारों को स्वीकार तो किया गया है, लेकिन व्यवहार में इन अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं की गई।

यह मामला पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स की तरफ से गुजरात के आलू किसानों के खिलाफ कथित बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) उल्लंघन को लेकर की गई कानूनी कार्रवाई से जुड़ा है। कुरुगंती ने प्लांट वैरायटी के रूप में पेप्सिको को दिए गए पंजीकरण को चुनौती देते हुए पौध किस्म और किसान अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत इसे रद्द करने की मांग की थी।

कुरुगंती के अनुसार, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की दो सदस्यीय पीठ ने कानून की धारा 39(1)(iv) के तहत किसानों के अधिकारों को स्वीकार किया है। इस प्रावधान के तहत किसानों को संरक्षित किस्मों के बीज सहित अपनी उपज को बचाने, इस्तेमाल करने, बोने, दोबारा बोने, बदलने, साझा करने या बेचने का अधिकार मिलता है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें हैं।

हालांकि, कुरुगंती का कहना है कि अदालत ने उनके इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि बौद्धिक संपदा अधिकारों का इस्तेमाल किसानों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए करना सार्वजनिक हित का उल्लंघन माना जाना चाहिए और इसके आधार पर पेप्सिको का प्लांट वैरायटी पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि फैसले ने किसानों के अधिकारों को “कानून के मुताबिक अक्षरशः तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी भावना में नहीं।” उनका कहना है कि किसानों को अदालत में जाकर अपने अधिकार साबित करने की स्थिति में डाल दिया गया है, जबकि ये अधिकार कानून में स्पष्ट रूप से दिए गए हैं।

2018 से चल रहा है विवाद

यह विवाद 2018 और 2019 में उस समय शुरू हुआ, जब पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स ने गुजरात के कम से कम नौ आलू किसानों के खिलाफ एक पंजीकृत आलू किस्म पर अपने अधिकारों के कथित उल्लंघन को लेकर मुकदमा दायर किया था। कंपनी ने प्रत्येक किसान से एक करोड़ रुपये से अधिक के हर्जाने की मांग की थी।

इस कार्रवाई के बाद किसान संगठनों और कार्यकर्ताओं ने व्यापक विरोध किया। देशभर में चले अभियान के बाद पेप्सिको ने मई 2019 में सभी मुकदमे बिना किसी शर्त के वापस ले लिए थे। इसके बाद कुरुगंती ने पेप्सिको को दी गई प्लांट वैरायटी पंजीकरण को रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया। इसमें कई आधारों के साथ यह भी तर्क दिया गया कि किसानों के खिलाफ कंपनी की कार्रवाई सार्वजनिक हित का उल्लंघन है।

दिसंबर 2021 में संबंधित प्राधिकरण ने पेप्सिको का पंजीकरण रद्द कर दिया। कंपनी ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 2023 में दो आधारों पर पंजीकरण रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, जनवरी 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस फैसले को पलट दिया। इसके बाद कुरुगंती ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के जरिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस मामले की सुनवाई 5 अगस्त 2026 को दो सदस्यीय पीठ ने की।

कुरुगंती ने कहा कि यह मामला भारत के प्लांट वैरायटी संरक्षण कानून और पारंपरिक पेटेंट कानूनों के बीच अंतर को जाहिर करता है। उनके मुताबिक, PPV&FR अधिनियम का उद्देश्य केवल बौद्धिक संपदा की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों और उनके बीज संबंधी अधिकारों के साथ संतुलन स्थापित करना भी है।

उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पेप्सिको की ओर से कहा गया कि किसानों को धारा 39(1)(iv) के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की अनुमति होगी। कुरुगंती ने कहा कि वह किसानों के बीज अधिकारों की सुरक्षा के लिए आगे भी इस मामले पर नजर बनाए रखेंगी।