संयुक्त किसान मोर्चा ने जीन-एडिटेड चावल के बीज रिलीज करने का विरोध किया, सार्वजनिक कृषि अनुसंधान मजबूत करने की मांग

संयुक्त किसान मोर्चा ने DRR धान 100 और पूसा DST राइस 1 जैसी जीन-संपादित चावल किस्मों की प्रस्तावित रिलीज का विरोध किया है। संगठन ने पेटेंट, जैव-सुरक्षा, चावल जैव-विविधता और जैविक निर्यात को लेकर चिंता जताई। एसकेएम ने सार्वजनिक कृषि अनुसंधान के लिए अधिक बजट और व्यापक जैव-सुरक्षा नियमन की भी मांग की है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने जीन-एडिटेड चावल के बीज रिलीज करने का विरोध किया, सार्वजनिक कृषि अनुसंधान मजबूत करने की मांग

संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने जीन-संपादित चावल की किस्मों को जारी किए जाने की प्रस्तावित प्रक्रिया का विरोध करते हुए केंद्र सरकार से इसे रोकने और सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित कृषि अनुसंधान को मजबूत करने की मांग की है। एक बयान में किसान संगठन ने डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा डीएसटी राइस 1 नामक दो जीन-संपादित चावल किस्मों को जारी करने और उनके बीजों के प्रसार पर आपत्ति जताई। एसकेएम ने दावा किया कि आगामी रबी बुवाई के मौसम से पहले पूसा डीएसटी राइस 1 के बीजों का गुणन (मल्टीप्लिकेशन) शुरू हो चुका है और सरकार से इस प्रक्रिया को रोकने की मांग की।

संगठन की प्रमुख चिंताओं में पेटेंट तकनीक का इस्तेमाल शामिल है। एसकेएम ने कहा कि इन किस्मों को विकसित करने में CRISPR-Cas9 तकनीक का इस्तेमाल किया गया है और आरोप लगाया कि Corteva Agriscience से जुड़े लाइसेंस संबंधी समझौतों की पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। संगठन का कहना है कि बौद्धिक संपदा संबंधी प्रतिबंध किसानों के बीज बचाने के अधिकार और भारत की बीज संप्रभुता को प्रभावित कर सकते हैं।

एसकेएम ने जीन-संपादित किस्मों के भारत की पारंपरिक चावल जैव-विविधता पर संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। संगठन के अनुसार, किसानों द्वारा विकसित ऐसी देसी किस्में, जो लवणता और जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हैं, प्रदूषण के जोखिम का सामना कर सकती हैं।

किसान संगठन ने यह भी दावा किया कि जीन-संपादित चावल की शुरुआत से भारत के जैविक चावल निर्यात पर असर पड़ सकता है। इसके लिए उसने यूरोपीय संघ और अमेरिका में जैविक प्रमाणन से जुड़े उन नियमों का हवाला दिया, जिनमें जीन-संपादित उत्पादों पर प्रतिबंध हैं।

जैव-सुरक्षा के मुद्दे पर एसकेएम ने 2022 में SDN-1 और SDN-2 जैसी कुछ जीन-संपादन तकनीकों को भारत के मौजूदा GMO जैव-सुरक्षा नियमों से दी गई छूट की आलोचना की। संगठन का तर्क है कि इसके कारण दोनों चावल किस्मों को वह पर्याप्त पर्यावरणीय जैव-सुरक्षा परीक्षण नहीं मिला, जिसे वह आवश्यक मानता है। उसने जीन-संपादन तकनीकों से होने वाले अनपेक्षित आनुवंशिक बदलावों को लेकर भी चिंता जताई।

संगठन ने इन किस्मों के प्रदर्शन से जुड़े दावों पर भी सवाल उठाए और ICAR के परीक्षण आंकड़ों की अपनी व्याख्या का हवाला दिया। एसकेएम ने आरोप लगाया कि कुछ मानकों, जैसे मिलिंग प्रतिशत और हेड राइस रिकवरी, में इन किस्मों का प्रदर्शन मूल किस्मों की तुलना में कमजोर रहा, जबकि कुछ परीक्षणों में रोग की अधिक घटनाएं दर्ज की गईं।

एसकेएम ने कृषि अनुसंधान में सरकारी निवेश बढ़ाने और सार्वजनिक क्षेत्र की अनुसंधान क्षमता मजबूत करने की मांग की। संगठन ने कहा कि सार्वजनिक धन से होने वाले अनुसंधान का लाभ भारतीय किसानों को पेटेंट संबंधी प्रतिबंधों और अत्यधिक कॉरपोरेट मुनाफाखोरी के बिना मिलना चाहिए।

संगठन ने SDN-1 और SDN-2 जीन-संपादन तकनीकों को पूर्ण जैव-सुरक्षा नियमन के दायरे में लाने की भी मांग की। उसने किसान संगठनों और नागरिकों से जीन-संपादित चावल किस्मों की रिलीज का विरोध करने की अपील की और किसानों के अधिकार, खाद्य सुरक्षा तथा बीज संप्रभुता को कृषि नीति में प्रमुख मुद्दा बताया।

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