दिल्ली में प्रदूषण के लिए केवल किसान दोषी नहीं, पराली का योगदान 5 फीसदी से अधिक नहीं: केंद्रीय कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को राज्यसभा में स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं। सर्दियों के दौरान भी कुल प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक नहीं है।

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के लिए अक्सर किसानों को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन अब इस मामले में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो इस धारणा को गलत साबित करते हैं।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को राज्यसभा में सवालों का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि दिल्ली–एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं। जब भी दिल्ली में धुआं बढ़ता है, किसानों को दोषी ठहरा दिया जाता है। लेकिन अब वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि शीतकाल में भी दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण में पराली का योगदान 5 फीसदी से ज्यादा नहीं है।

चौहान ने सदन को बताया कि प्रदूषण औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकालने वाले धुएं से होता हैं, लेकिन कई बार केवल किसानों को बदनाम किया जाता है। जबकि किसान एकमात्र कारण नहीं है। 

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केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि पराली जलाने से मित्र कीट, न्यूट्रिएंट्स, ऑर्गेनिक कार्बन नष्ट होते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटती है और प्रदूषण भी बढ़ता है, इसलिए सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना के तहत किसानों को पराली प्रबंधन मशीनों पर 50 फीसदी से 80 फीसदी तक सब्सिडी दी है।

इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में निरंतर गिरावट आ रही है। सरकार अब पराली को 'बोझ' के बजाय 'वरदान' बनाने की दिशा में काम कर रही है, जिसके तहत परली का उपयोग बायो-सीएनजी, पेलेट्स और थर्मल पावर प्लांट में ईंधन के रूप में किया जा रहा है।

पंजाब में पराली की आग में कमी  

कृषि मंत्री ने बताया की पराली जलाने की घटनाएं अब निरंतर कम होती चली जा रही हैं। पंजाब में उल्लेखनीय कमी आई है, लगभग केवल 5,000 पराली जलाने की घटनाएं पिछले साल हुई हैं। हरियाणा सरकार के अपने अलग प्रयास हैं, वहां भी पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए 3.5 लाख से अधिक मशीनें वितरित की गई हैं। मेरठ, शामली, हापुड़, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत और गौतमबुद्ध नगर में 11 पैलेटिंग विनिर्माण संयंत्र तथा 32.63 हजार टन भंडारण क्षमता विकसित कर पराली को संसाधन में बदला जा रहा है।

हरियाणा मॉडल की सराहना

हरियाणा मॉडल की सराहना करते हुए कृषि मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार इन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 1,000 रुपये, ‘मेरा पानी–मेरी विरासत’ के तहत धान के स्थान पर अन्य फसलों के लिए प्रति एकड़ 7,000 रुपये, DSR के लिए प्रति एकड़ 4,000 रुपये, पराली न जलाने पर रेड ज़ोन पंचायतों को एक लाख रुपये, येलो ज़ोन पंचायतों को 50 हजार रुपये और गौशालाओं तक पराली पहुंचाने के लिए प्रति ट्रांसपोर्ट 500 (अधिकतम 15 हजार रुपये) तक सहायता दे रही है।