संकट के चौराहे पर कृषि: क्या तैयार है भारत?

कमजोर मानसून की आशंका और तेल एवं उर्वरकों की कीमतों में इजाफे से बढ़ती लागत के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए यह साल सामान्य नहीं है। पिछले कुछ समय से कृषि उत्पादों की कमजोर कीमतें इनकी मुश्किलें बढ़ा रही हैं

Image by Gajendra BEGAR from Pixabay

कमजोर मानसून की आशंका और तेल एवं उर्वरकों की कीमतों में इजाफे से बढ़ती लागत के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए यह साल सामान्य नहीं है। पिछले कुछ समय से कृषि उत्पादों की कमजोर कीमतें इनकी मुश्किलें बढ़ा रही हैं। हालांकि इसके बावजूद कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी बना हुआ है, क्योंकि तमाम प्रोत्साहनों के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग अभी जीडीपी के 17 प्रतिशत तक ही पहुंच सका है और सेवा क्षेत्र के ग्रोथ इंजन आईटी सेक्टर में भी हालात बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। यह बात अलग है कि सरकारी आंकड़ों में स्थिति बहुत बेहतर है। ताजा आंकड़ों में 2025-26 के लिए जीडीपी ग्रोथ दर 7.7 फीसदी रही है, जबकि कृषि और सहयोगी क्षेत्र केवल तीन फीसदी की दर से बढ़ा है। ग्रोथ के मजबूत आंकड़ों के बावजूद सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हैं, जो कहीं न कहीं संकट गहराने की स्वीकारोक्ति है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस साल मानसून सीजन में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का 90 फीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया है, जो सामान्य से कम है। जब देश का करीब 50 फीसदी कृषि क्षेत्र बारिश पर निर्भर हो तो कम बारिश बड़ी मुश्किल लेकर आती है। साथ ही, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से मई 2026 में डीजल 7.53 रुपये लीटर महंगा हो चुका है। इससे किसान की हर तरह की लागत बढ़ी है। मानसून पर अल नीनो का असर पड़ने की आशंका है। मानसून के पहले हिस्से में अलनीनो कमजोर है जबकि दूसरे हिस्से, अगस्त और सितंबर में इसका स्तर मॉडरेट हो जाएगा। हालांकि उसके बाद नवंबर से जनवरी तक स्ट्रांग अल नीनो की स्थिति बनेगी। यानी अभी की स्थिति को देखें तो शायद मानसून सीजन स्ट्रांग अल नीनो से पहले ही खत्म हो जाएगा। मानसून देरी से आया, लेकिन आ गया है। पूरे सीजन के दौरान और भौगोलिक स्तर पर बारिश किस तरह होती है, उससे स्थिति साफ होगी। वहीं नवंबर के बाद स्ट्रांग अलनीनो के चलते सर्दी के सीजन में तापमान सामान्य से अधिक रहेगा और बारिश होने की संभावना कमजोर हो जाएगी। इसका असर रबी की फसलों पर पड़ेगा। जाहिर है कि यह एक प्राकृतिक समस्या है और किसान इसके सामने बेबस है, लेकिन सरकार को समय रहते किसान के लिए इस मुश्किल को कम करने की रणनीति बनानी चाहिए।

दूसरा बड़ा मसला उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों का है। फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले से शुरू हुए खाड़ी युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए संकट खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व में पहली बार इस तरह का ऊर्जा संकट पैदा हुआ है। युद्ध के चलते होर्मुज स्ट्रेट से शिपिंग बाधित हुई है। भारत अपनी जरूरत की गैस और तेल का बड़ा हिस्सा तथा अधिकांश उर्वरक व इनका कच्चा माल इस रास्ते से लाता रहा है। लेकिन इस संकट के चलते हमें लगभग दोगुनी कीमत पर यूरिया का आयात करना पड़ा है। इसके चलते उर्वरक सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। भले ही सरकार यूरिया और डाईअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की कीमतों को नियंत्रित कर रही है, लेकिन अन्य विनियंत्रित उर्वरकों के दाम बढ़ गए हैं।

फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भी हमने बड़ा उर्वरक संकट झेला था। तब आयात लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। इस साल वह रिकॉर्ड भी टूट सकता है। लेकिन हमने उस संकट से कोई सबक नहीं लिया और उर्वरक आयात निर्भरता कम करने के लिए कोई दीर्घकालिक नीतिगत कदम नहीं उठाया। सरकार और नीति निर्धारकों ने अब इस पर जोर देना शुरू किया है। इसके लिए क्या विकल्प होने चाहिए और किस तरह के नीतिगत कदमों की जरूरत है, उसे केंद्र में रखते हुए हमने रूरल वर्ल्ड के इस अंक की कवर स्टोरी तैयार की है। अमेरिका के अलबामा स्थित इंटरनेशनल फर्टिलाइजर डेवलपमेंट सेंटर (आईएफडीसी) के ग्लोबल डायरेक्टर यशपाल सिंह सहरावत और उनके सहयोगियों ने वैज्ञानिक और व्यावहारिक विकल्प पेश किए हैं। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनी हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ सिबा प्रसाद मोहंती ने एक साक्षात्कार में मौजूद विकल्पों पर बात की है। साथ ही विश्व के सबसे प्रतिष्ठित सॉयल साइंटिस्ट प्रोफेसर रतन लाल का एक आलेख भारत के लिए जरूरी रणनीति पेश करता है, जो इस अंक की कवर स्टोरी का हिस्सा है।

दरअसल, ताजा संकट से इतर भी सरकार को कृषि के प्रति गंभीरता बढ़ाने की जरूरत है। खेती से किसान की आय घट रही है और उसके पास दूसरे क्षेत्रों में जाने के विकल्प सीमित हैं। भारतीय कृषि और किसान एक विरोधाभासी परिस्थिति में फंस गए हैं। एक ओर जहां देश में कुछ उत्पादों का आधिक्य यानी सरप्लस है और उन फसलों के दाम गिर रहे हैं, वहीं खाद्य तेलों, दालों और कपास का बड़े पैमाने पर आयात हो रहा है। मिशन रूप में सरकार की कोशिशों के बावजूद मामला फंसा हुआ है और इसका नुकसान किसानों को हो रहा है। हालांकि कुछ कृषि अर्थशास्त्री मानते हैं कि मौजूदा स्थिति को 1991 के संकट की तरह मानकर सुधार किए जाने चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत से दूर वे केवल मार्केटिंग सुधारों और सब्सिडी में कटौती की बात करते हैं। मुद्दा केवल सब्सिडी और मार्केटिंग सुधार का नहीं, बल्कि फसलों की उत्पादकता का स्थिर हो जाना और किसानों की आय में अपेक्षित सुधार नहीं होना भी है।