ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज: विकासशील देशों को विकसित देशों के कृषि कारोबार पर निर्भरता से मुक्त करने की पहल

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में कृषि जैव विविधता, किसानों के अधिकारों और प्रस्तावित ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज को प्राथमिकता दी गई है। इन पहलों का उद्देश्य वैश्विक कृषि कारोबार पर निर्भरता घटाना और कीमतों में स्थिरता लाना है। नेताओं ने खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ खेती के लिए विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में लंबित कृषि वार्ताओं को आगे बढ़ाने का भी संकल्प लिया।

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में इस समूह के नेताओं ने कृषि क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलों को रेखांकित किया। ये पहल ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों देशों में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की दिशा को नया स्वरूप देने और कृषि की टिकाऊ प्रकृति को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ब्रिक्स नेताओं ने खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए उन पर मिलकर काम करने पर सहमति जताई।

पहला मुद्दा कृषि प्रणाली में जैव विविधता और किसानों के अधिकारों के विशेष महत्व से जुड़ा था। कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए किसानों के पारंपरिक ज्ञान और बीजों पर उनके अधिकारों की रक्षा करना तथा सामान्य जैव विविधता, विशेष रूप से कृषि जैव विविधता का संरक्षण करना बेहद जरूरी है।

दूसरा मुद्दा ब्रिक्स ग्रेन (अनाज) एक्सचेंज स्थापित करने की पहल को आगे बढ़ाने से संबंधित था। यह अनाज व्यापार के लिए एक मंच होगा, जिसकी दिशा में पहला कदम 2024 के कजान शिखर सम्मेलन में उठाया गया था। ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज के माध्यम से सदस्य देश वैश्विक कृषि कारोबार पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं और अंततः इसे समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इस संस्था से कृषि जिंसों के निर्यातक और आयातक, दोनों लाभान्वित हो सकते हैं। निर्यातकों को अपनी उपज का बेहतर और अधिक स्थिर मूल्य मिल सकता है, जबकि आयातकों को अनुकूल शर्तों और आपूर्ति की स्थिरता का लाभ मिल सकता है।

तीसरा मुद्दा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में कृषि संबंधी वार्ताओं को आगे बढ़ाना था, जो विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेदों के कारण लंबे समय से अटकी हुई हैं।

भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए जिन पहलों को आगे बढ़ाया, उनमें एक सहयोगात्मक, गैर-बाध्यकारी और किसान-केंद्रित नेटवर्क ब्रिक्स एग्रीन (AGRIN) की स्थापना तथा बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकारों पर वैश्विक मंच लाना शामिल हैं। ब्रिक्स एग्रीन का उद्देश्य कृषि जैव विविधता पर आवश्यक ध्यान केंद्रित करना है, जो टिकाऊ खाद्य प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण होने के बावजूद अक्सर उपेक्षित रह जाती है।

ब्रिक्स के पांच मूल सदस्यों में से चार और समूह के कुछ सहयोगी सदस्य ऐसे देश हैं, जहां जैव विविधता की प्रचुरता है। इन देशों में दुनिया की कम से कम 60-70 प्रतिशत जैव विविधता और उससे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान मौजूद है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के अनियमित स्वरूप का कृषि पर असर बढ़ने के साथ ही फसलों की मजबूती और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता बढ़ाने में कृषि जैव विविधता का महत्व अधिक स्वीकार किया जाने लगा है। अब यह स्थापित हो चुका है कि विविध कृषि प्रणालियां, जिनमें देशज फसलों और पशुधन की विभिन्न किस्मों का संरक्षण शामिल है, मौसम संबंधी कारणों से होने वाले खाद्य नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक हैं। कृषि जैव विविधता के संरक्षण और संवर्धन के लिए पारंपरिक किसानों के ज्ञान और उनकी कृषि पद्धतियों की रक्षा करना जरूरी है। इसके लिए किसानों के अधिकारों को मान्यता देना महत्वपूर्ण है।

खाद्य एवं कृषि के लिए पादप आनुवंशिक संसाधनों पर संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की अंतरराष्ट्रीय संधि, जिसे 2004 में अनुमोदित किया गया था, ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसानों के अधिकारों को औपचारिक मान्यता दी। भारत ने इससे पहले ही 2001 में पादप किस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम (PPV&FRA) लागू कर दिया था।

पीपीवीएफआरए लागू होने के लगभग ढाई दशक बाद ब्रिक्स ने नई दिल्ली में किसानों के अधिकारों पर वैश्विक मंच बनाने का प्रस्ताव रखा है। यदि इस मंच को प्रभावी ढंग से विकसित किया जाए तो यह किसान केंद्रित ज्ञान और बीज प्रणालियों को प्रोत्साहित करके पारंपरिक किसानों को सशक्त बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज: वैश्विक कृषि कारोबार पर निर्भरता घटाने की पहल

11 सदस्यीय ब्रिक्स समूह और वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स के भीतर ग्रेन एक्सचेंज स्थापित करने की दिशा में हुई प्रगति है। रूस ने 2024 में अपनी अध्यक्षता के दौरान इस व्यापार मंच का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य एक ऐसा एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना था, जहां कृषि जिंसों के उत्पादक और खरीदार बाहरी बिचौलियों के बिना सीधे कारोबार कर सकें। उम्मीद है कि यह मंच ब्रिक्स देशों में मांग और आपूर्ति की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करेगा। इससे सदस्य देशों को अपने जिंस व्यापार पर अधिक नियंत्रण हासिल करने में मदद मिल सकती है।

ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार मजबूत करने के अलावा यह संस्था मौजूदा जिंस एक्सचेंजों पर उनकी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है। इन वैश्विक एक्सचेंजों पर बड़े कृषि कारोबारियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव है।

अमेरिका और यूरोपीय संघ में दुनिया के सबसे बड़े, वैश्विक स्तर पर एकीकृत जिंस एक्सचेंज मौजूद हैं। इनमें अमेरिका का सीएमई ग्रुप (CME Group) और इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE), जबकि यूरोपीय संघ का यूरोनेक्स्ट (Euronext) शामिल हैं। ये एक्सचेंज बाजार में भाग लेने वालों को जोखिम प्रबंधन के लिए विभिन्न प्रकार के डेरिवेटिव उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।

यदि ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज प्रभावी ढंग से काम करता है, तो बिचौलियों की भूमिका कम होने और अंततः समाप्त होने से उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों देशों को लाभ हो सकता है। मुनाफाखोरी करने वाले बिचौलियों की भूमिका घटने से उत्पादक देशों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद होगी, जबकि प्रत्यक्ष लेनदेन से खरीदारों को कम कीमत पर जिंस मिल सकते हैं। रूस का तर्क रहा है कि ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज सदस्य देशों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य स्वयं निर्धारित करने का अवसर देगा।

लगभग आठ दशक पहले राउल प्रीबिश और हैंस सिंगर ने बताया था कि उत्तर के विकसित देशों और उनकी कंपनियों के प्रभुत्व वाली व्यापार व्यवस्था पर दक्षिण के जिंस उत्पादक देशों की निर्भरता उनके आर्थिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण रही है।

वैश्विक दक्षिण के देशों को लंबे समय तक जिंसों की कीमतों में गिरावट और अस्थिरता का सामना करना पड़ा। इससे उनके व्यापार की शर्तें लगातार कमजोर हुईं। उन्हें अपने विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक विदेशी मुद्रा आय से वंचित होना पड़ा और वे विदेशी पूंजी के प्रवाह पर निर्भर होते चले गए। इस प्रक्रिया ने उत्तर के विकसित देशों पर उनकी निर्भरता को और गहरा किया। अध्ययनों से पता चला है कि यदि जिंस व्यापार शर्तों में इस तरह गिरावट नहीं आई होती, तो दक्षिण के देशों को निर्भरता का बोझ नहीं उठाना पड़ता और वे अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अधिक स्वतंत्र रास्ता अपना सकते थे।

खाद्य कीमतों में अस्थिरता कम करने में मददगार हो सकता है एक्सचेंज

नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स नेताओं ने खाद्य कीमतों में अत्यधिक अस्थिरता के प्रभावों को कम करने के महत्व पर जोर दिया। ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज इस उद्देश्य को पूरा करने में मददगार हो सकता है। नेताओं ने अचानक आपूर्ति संकट से बचने की जरूरत भी रेखांकित की, जो खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।

अनाज एक्सचेंज शुरू करने की दिशा में 16वें शिखर सम्मेलन के अंत में दो महत्वपूर्ण फैसले किए गए थे। पहला, इसके कामकाज की प्रक्रिया और तौर-तरीकों पर विचार करना। दूसरा, इस संस्था के दायरे को अनाज से आगे बढ़ाकर अन्य कृषि उत्पादों और गैर-कृषि जिंसों तक बढ़ाने की संभावना तलाशना। इससे एक्सचेंज की व्यावहारिक उपयोगिता और आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ सकती है।

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि उत्पादों तथा कृषि एवं खाद्य उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले इनपुट के व्यापार को सुविधाजनक बनाने पर चर्चा करने का नेताओं का फैसला भी इस एक्सचेंज के लिए मददगार हो सकता है। इसके तहत मजबूत और भेदभावरहित आपूर्ति शृंखलाओं को बढ़ावा देने, मूल्य शृंखलाओं में सुधार करने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है।

डब्ल्यूटीओ में कृषि वार्ता को फिर आगे बढ़ाने की कोशिश

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य देशों ने बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए अपने प्रयासों में समन्वय करने पर सहमति जताई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा व्यापार नीतियों के कारण विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। ब्रिक्स नेताओं ने विशेष रूप से मौजूदा मंत्रिस्तरीय निर्णयों के अनुरूप डब्ल्यूटीओ में कृषि वार्ताओं को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्देश 2001 के दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में दिया गया था। इसके तहत डब्ल्यूटीओ के सदस्यों से कृषि समझौते की समीक्षा करने को कहा गया था, ताकि विकासशील देश अपनी विकास संबंधी जरूरतों, विशेष रूप से खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास को प्रभावी ढंग से ध्यान में रख सकें। नेताओं ने एक निष्पक्ष, संतुलित और विकासोन्मुख कृषि व्यापार प्रणाली को बढ़ावा देने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बदलती नीतियां और नियामकीय व्यवस्थाएं कृषि उत्पादन एवं व्यापार, खाद्य सुरक्षा और छोटे किसानों तथा पारिवारिक खेती पर निर्भर लोगों की आजीविका को तेजी से प्रभावित कर रही हैं।

यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब इस वर्ष की शुरुआत में आयोजित डब्ल्यूटीओ के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के एजेंडे में कृषि को शामिल नहीं किया गया था। इसे एक गंभीर चूक माना गया, क्योंकि इसके कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी। इनमें खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण (Public Stockholding - PSH) का स्थायी समाधान प्रमुख है। यह भारत सहित 30 से अधिक देशों के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण है।

जी-33 समूह के 40 से अधिक देश सार्वजनिक भंडारण के स्थायी समाधान का समर्थन करते हैं। ब्रिक्स नेताओं ने डब्ल्यूटीओ में कृषि वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए जो राजनीतिक समर्थन दिया है, उससे इस मुद्दे पर फिर से ध्यान केंद्रित होने की उम्मीद है।

इस प्रकार, ब्रिक्स की पहल केवल सदस्य देशों के बीच कृषि सहयोग बढ़ाने तक सीमित नहीं है। कृषि जैव विविधता और किसानों के अधिकारों के संरक्षण से लेकर अनाज व्यापार में बिचौलियों की भूमिका कम करने और डब्ल्यूटीओ में विकासशील देशों की चिंताओं को उठाने तक, ये प्रयास वैश्विक दक्षिण के देशों को खाद्य सुरक्षा और कृषि व्यापार के क्षेत्र में अधिक स्वायत्तता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।