भारत एक अरब से अधिक लोगों का पेट भरता है। लेकिन जो किसान यह संभव बनाता है, वह अनिश्चित मानसून, कृषि इनपुट की अस्थिर लागत, कीटों के बढ़ते दबाव और लगातार घटते मुनाफे जैसी चुनौतियों का सामना पहले से कहीं कम सहयोग के साथ कर रहा है। कृषि जनगणना के अनुसार, दशकों से भारतीय खेतों का औसत आकार लगातार घटता गया है और अब यह केवल 1.08 हेक्टेयर रह गया है। देश में कृषि जोतों की संख्या बढ़कर 14.65 करोड़ हो गई है, लेकिन इन किसानों को सहयोग देने वाली व्यवस्था उसी गति से विकसित नहीं हो पाई है।
इस स्थिति के मूल में मानवीय विशेषज्ञता की संरचनात्मक कमी है। वर्तमान में भारत में कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं (Extension Workers) और किसानों का अनुपात राष्ट्रीय मानकों से काफी कम है। दिशानिर्देशों के अनुसार सिंचित क्षेत्रों में यह अनुपात 1:1100 और पहाड़ी क्षेत्रों में 1:400 होना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक, कृषि विस्तार अधिकारी और सहकारी क्षेत्र के फील्ड कार्यकर्ता ही वे ज्ञानवाहक हैं जिनकी सलाह तय करती है कि किसान कौन सी फसल बोएगा, कौन सी दवा का छिड़काव करेगा और क्या उत्पादन करेगा। लेकिन ऐसे विशेषज्ञों की संख्या किसानों की जरूरतों की तुलना में बहुत कम है।
ऐसी परिस्थिति में आर्टिफिशियल इंजेलिजेंस मानवीय विशेषज्ञता के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी सहयोगी और क्षमता बढ़ाने वाली तकनीक बन जाती है।
वैश्विक स्तर पर यह आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख अनुमानों के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया में कुल खाद्य मांग 35 से 56 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है। दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल भारत इस चुनौती के केंद्र में है। सवाल यह नहीं है कि तकनीक खेती को बदलेगी या नहीं, क्योंकि वह पहले से ऐसा कर रही है। असली सवाल यह है कि यह बदलाव किसानों और कृषि विशेषज्ञों के साथ मिलकर होगा या उन्हें पीछे छोड़ देगा।
इसका उत्तर स्पष्ट रूप से किसानों से जुड़ा होना चाहिए।
एक अनुभवी कृषि वैज्ञानिक अपने साथ दशकों का स्थानीय और व्यावहारिक ज्ञान लेकर चलता है। उसे पता होता है कि किसी विशेष मिट्टी में कौन-सी फसल किस प्रकार प्रदर्शन करेगी, किसी क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु (Microclimate) खरीफ और रबी के बीच कैसे बदलती है और दबाव की स्थिति में किसी सहकारी संस्था की कृषि इनपुट आपूर्ति श्रृंखला कहां टूट सकती है। इस प्रकार का गहराई से जुड़ा और अनुभव आधारित ज्ञान किसी AI मॉडल द्वारा पूरी तरह दोहराया नहीं जा सकता।
लेकिन AI इस विशेषज्ञता का दायरा कई गुना बढ़ा सकता है। यदि पहले एक कृषि वैज्ञानिक केवल सौ किसानों को सलाह देता था, तो अब वही विशेषज्ञ AI आधारित निर्णय सहायता प्रणाली, स्वचालित फसल निगरानी और किसानों की अपनी भाषा में मोबाइल फोन पर उपलब्ध पूर्वानुमान आधारित कृषि सलाह के माध्यम से प्रभावी रूप से हजारों किसानों का मार्गदर्शन कर सकता है।
किसानों के पास भी ऐसा ज्ञान है जिसका कोई विकल्प नहीं है। पीढ़ियों से संचित स्थानीय मिट्टी की समझ, अनुभव के आधार पर कीटों की पहचान करने की क्षमता और बारिश आने के समय का सहज अनुमान - यह बड़ा मूल्यवान डेटा है, जिसे औपचारिक कृषि विज्ञान ने लंबे समय तक कम महत्व दिया है।
जब AI सिस्टम को खेत स्तर पर एकत्र किए गए आंकड़ों, अनुभवी कृषि वैज्ञानिकों की टिप्पणियों और किसानों की प्रतिक्रिया के आधार पर प्रशिक्षित किया जाता है, तो वे केवल उपग्रह आंकड़ों पर आधारित सिस्टम की तुलना में कहीं अधिक सटीक और उपयोगी बन जाते हैं। इस प्रक्रिया में इंसान को निर्णय प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाता, बल्कि वही पूरी प्रक्रिया का केंद्र बना रहता है।
मैकिंजे का अनुमान है कि एआई आधारित समाधानों के उपयोग से कृषि क्षेत्र को खेत स्तर पर 100 अरब डॉलर और उद्यम स्तर पर 150 अरब डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिल सकता है। इसके बावजूद भारत में प्रिसिजन खेती का उपयोग 5 प्रतिशत से भी कम है, जो प्रमुख कृषि अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। इसका अर्थ है कि अवसर बहुत बड़ा है, लेकिन इस अंतर को समझदारी से पाटने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।
भारत सरकार ने इस आवश्यकता को समझा है। सितंबर 2024 में स्वीकृत 2,817 करोड़ रुपये के डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत किसान-केंद्रित डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के रूप में एग्रीस्टैक (AgriStack) विकसित किया जा रहा है। इसके तहत तीन वर्षों में 11 करोड़ किसानों की डिजिटल पहचान तैयार की जाएगी और देश के सभी जिलों में डिजिटल फसल सर्वेक्षण शुरू किया जाएगा।
उपग्रह, मौसम और मिट्टी से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत करने वाली कृषि निर्णय सहायता प्रणाली जैसे प्रयास उस डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे हैं, जिस पर भविष्य की कृषि सलाह प्रणाली विकसित की जा सकती है। इसी प्रकार किसान ई-मित्र (Kisan e-Mitra) एआई चैटबॉट पहले से ही 11 क्षेत्रीय भाषाओं में प्रतिदिन औसतन 8,000 किसानों के प्रश्नों का समाधान कर रहा है। ये सभी संकेत बताते हैं कि भारत का कृषि डेटा पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से परिपक्व हो रहा है।
लेकिन केवल सरकारी इन्फ्रास्ट्रक्चर नीति और जमीनी स्तर के प्रभाव के बीच की दूरी को समाप्त नहीं कर सकती। यहां कृषि व्यवसायों, सहकारी संस्थाओं, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और एग्रीटेक प्लेटफॉर्म की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब कोई सहकारी संस्था अपने सदस्य किसानों की फसल योजना, कृषि इनपुट के उपयोग, फसल निगरानी और उत्पादन से जुड़े रिकॉर्ड को डिजिटल रूप देती है, तो वह एक ऐसा फीडबैक तंत्र तैयार करती है जिसका लाभ पूरे किसान नेटवर्क को मिलता है।
ऐसे समेकित आंकड़ों पर प्रशिक्षित AI मॉडल हजारों एकड़ क्षेत्र में शुरुआती तनाव के संकेतों की पहचान एक साथ कर सकते हैं, कीट प्रकोप फैलने से पहले चेतावनी दे सकते हैं और हस्तक्षेप का सही समय उस सटीकता के साथ बता सकते हैं जिसे कोई एक कृषि वैज्ञानिक अकेले इतने बड़े स्तर पर हासिल नहीं कर सकता।
खेतीबडी (KhetiBuddy) में हम बड़े कृषि नेटवर्क संचालित करने वाले ग्राहकों के साथ काम करते हुए इस बदलाव को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं। सबसे अधिक मूल्य वही प्लेटफॉर्म प्रदान करते हैं, जहां कृषि वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता को सलाह प्रणाली में शामिल किया जाता है, न कि उसकी जगह AI को बैठाया जाता है।
यह डर कि AI किसानों की जगह ले लेगी या कृषि वैज्ञानिकों को अप्रासंगिक बना देगी, तकनीक की वास्तविक भूमिका को गलत तरीके से समझने का परिणाम है। एक अच्छी तरह विकसित कृषि AI प्रणाली आदेश नहीं देती, बल्कि सही समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराती है, ताकि किसान या कृषि विस्तार कार्यकर्ता बेहतर निर्णय ले सकें।
निर्णय लेने की क्षमता, स्थानीय ज्ञान और भूमि के साथ किसान का रिश्ता हमेशा इंसानों के पास ही रहेगा। भारत की कृषि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इन दोनों शक्तियों - मानवीय विशेषज्ञता और आर्टिफिशियल इंजेलिजेंस - को कितने प्रभावी ढंग से एकीकृत कर पाते हैं।
कृषि व्यवसायों के लिए संदेश स्पष्ट है। अब डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश किसी प्रयोग के रूप में नहीं, बल्कि अपनी संचालन प्रणाली की मजबूत नींव के रूप में करना होगा। अपने कृषि नेटवर्क का डिजिटलीकरण करें, कृषि विशेषज्ञता को एआई आधारित सलाह प्रणालियों में शामिल करें और ऐसे डेटा संसाधन तैयार करें जिनका मूल्य समय के साथ लगातार बढ़ता रहे।
किसानों का ज्ञान पीढ़ियों से विकसित हुआ है। आर्टिफिशियल इंजेलिजेंस का काम केवल यह सुनिश्चित करना है कि यह ज्ञान हर उस खेत तक पहुंचे, जहां इसकी आवश्यकता है।
(विनय नायर, Khetibuddy के संस्थापक एवं सीईओ हैं)