कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर: आईसीएआर की रिपोर्ट में फसल चक्र बदलने की थी सिफारिश, लेकिन अमल नहीं

रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि क्या मार्च में तापमान बढ़ने को देखते हुए, जब गेहूं की फसल तैयार होती है, तब फसल चक्र में बदलाव किया जा सकता है? सीधे शब्दों में कहें तो जलवायु परिवर्तन को देखते हुए गेहूं की बिजाई से लेकर कटाई तक पूरा चक्र कुछ हफ्तों के लिए एडवांस किया जा सकता है या नहीं

भारत के दो प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब और किसान के किसानों के लिए मार्च 2022 की शुरूआत तक सब कुछ ठीक चल रहा था। उनकी गेहूं की फसल पककर तैयार होने वाली थी और ओले तथा बारिश ना पड़ने के कारण उन्हें बंपर पैदावार की उम्मीद थी। लेकिन उसके बाद अभूतपूर्व तरीके से गर्मी बढ़ी और इन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। मंडियों में गेहूं पहुंचने तक दाने 15 से 20 फ़ीसदी सिकुड़ चुके थे। किसानों के अनुसार प्रति एकड़ पैदावार 20 से 40 फ़ीसदी तक गिर गई। यह गिरावट जिले के हिसाब से अलग है। अभी तक सरकार ने नुकसान का कोई आकलन जारी नहीं किया है, न ही उसने फसल बीमा योजनाओं के तहत किसी मुआवजे की घोषणा की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन किसानों को मौसम की मार से नुकसान हुआ है उन्हें कुछ मुआवजा मिलेगा।

इस लेख में चर्चा का मुख्य बिंदु उस व्यापक स्टडी का बुरा हश्र है जिसे तैयार करने में करीब 8 साल लगे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 2011 में एक बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी जो दो चरणों में 2019 में पूरा हुआ। पहले का नाम नेशनल इनीशिएटिव ऑन क्लाइमेट रेसिलियंट एग्रीकल्चर है जो 2017 में पूरा हुआ। दूसरा भाग नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेसिलियंट एग्रीकल्चर 2019 में पूरा हुआ। पिछले साल संसद में सवाल के एक जवाब में इस व्यापक रिपोर्ट का जिक्र किया गया था और पूरी रिपोर्ट का लिंक भी दिया गया था। उस रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि क्या मार्च में तापमान बढ़ने को देखते हुए, जब गेहूं की फसल तैयार होती है, तब फसल चक्र में बदलाव किया जा सकता है? सीधे शब्दों में कहें तो जलवायु परिवर्तन को देखते हुए गेहूं की बिजाई से लेकर कटाई तक पूरा चक्र कुछ हफ्तों के लिए एडवांस किया जा सकता है या नहीं?

पूरी रिपोर्ट के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं

http://www.nicra-icar.in/nicrarevised/images/publications/Risk%20&%20vulnerability%20assessment%20of%20Indian%20agriculture%20to%20climate%20change.pdf

रिपोर्ट में कहा गया है, जलवायु परिवर्तन के अनुमान बताते हैं कि तापमान का बढ़ना लगभग निश्चित है और अधिकतम तापमान की तुलना में न्यूनतम तापमान (रात में) में अधिक वृद्धि हो रही है। फसल पैदावार निर्धारण में बढ़ता तापमान महत्वपूर्ण फैक्टर बनकर उभर रहा है। भारत के संदर्भ में बारिश में गिरावट पर जितना ध्यान दिया गया है उतना तापमान में वृद्धि पर नहीं। इस विश्लेषण में बताया गया है कि 271 जिलों में न्यूनतम तापमान का बढ़ना पैदावार में सबसे बड़ा जोखिम है। कई अध्ययनों में गेहूं जैसी रबी की फसल पर न्यूनतम तापमान बढ़ने के असर को देखा जा चुका है।

दूसरी सिफारिश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसमें कहा गया है कि बिजाई पहले शुरू करना और कम अवधि वाली वैरायटी अपनाना इस दिशा में बेहतर कदम हो सकता है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों, केंद्रीय और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों और सबसे बड़ी बात खुद आईसीएआर, जिसने यह स्टडी की थी, उसने इन सिफारिशों पर अमल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया।

अब बस यह उम्मीद की जा सकती है कि रिपोर्ट पर आपात आधार पर अमल किया जाए। इस बात के पर्याप्त सबूत मिलने लगे हैं कि फसलों, मवेशी और मछली की उत्पादकता पर असर पड़ेगा और इसका प्रभाव खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ कृषि पर निर्भर लोगों की आजीविका और सस्टेनेबिलिटी पर भी होगा। जलवायु परिवर्तन से फसलों और मवेशियों की ग्रोथ और पैदावार दोनों प्रभावित होगी। कहा जा सकता है कि बढ़ते तापमान और कम होती बारिश का कृषि उत्पादकता पर विपरीत असर होगा। हालांकि इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से फसलों की पैदावार बढ़ सकती है।

भारत में कई अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि अनुकूलन का कोई तरीका ना अपनाने से जलवायु परिवर्तन, खासकर तापमान में वृद्धि के कारण फसलों की पैदावार में गिरावट आएगी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस का स्तर बढ़ने का पौधों पर जो सकारात्मक असर होता है उससे कहीं अधिक तापमान बढ़ने का नकारात्मक असर होता है। कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर बढ़ने को कार्बन फर्टिलाइजेशन इफेक्ट कहते हैं। आठ साल में तैयार की गई स्टडी की सबसे अच्छी बात यह है कि उसमें जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कृषि पर असर का विश्लेषण किया गया है।

आगे संभावनाएं कुछ इस तरह हो सकती हैं- कुछ नए स्टार्टअप खड़े हो सकते हैं जो जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने का दावा करें। कुछ ने तो ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। ऐसे स्टार्टअप की बढ़-चढ़कर तारीफ भी होगी लेकिन आईसीएआर की ओर से तैयार अध्ययन रिपोर्ट को भुला दिया जाएगा। 

हमें जलवायु परिवर्तन के खतरे के प्रति जल्दी चेत जाना चाहिए। उस रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई थी उन पर अमल करना चाहिए। यहां कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशॅ का दोबारा जिक्र किया जा रहा है।

-कृषि के संदर्भ में तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं। ऐतिहासिक ट्रेंड से बढ़ते तापमान का पता चलता है और इससे सिंचाई के साधनों तक पहुंच के महत्व का भी पता चलता है। कम से कम 116 जिलों में सिंचाई के साधनों तक कम पहुंच सबसे अधिक जोखिम बनकर उभरा है। 

-सिंचाई के साधनों का विस्तार, उस तक सबकी पहुंचे पर किसी भी अनुकूलन रणनीति में अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। बारिश के पानी की हार्वेस्टिंग, उनका जगह-जगह संरक्षण और भूजल की रिचार्जिंग रेनफेड इलाकों में जल प्रबंधन के तीन महत्वपूर्ण बिंदु होने चाहिए। 

-सिंचाई वाले और रेनफेड दोनों इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की मांग का प्रबंधन पानी के अधिक सस्टेनेबल इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए फसल बिजाई के पैटर्न में बदलाव जरूरी है। रेनफेड इलाकों में ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिनके लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है।

-माइक्रो इरिगेशन जैसी टेक्नोलॉजी, नीतियों और अन्य बातों में इस तरह समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए कि वह विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएं पूरी कर सके।  सालाना बारिश में गिरावट 91 जिलों में बड़ा जोखिम बनकर सामने आई है। 

-54 जिलों में मार्च से मई के दौरान असामान्य रूप से अधिक तापमान वाले दिन की संख्या एक से अधिक बढ़ सकती है। इनमें से ज्यादातर जिले जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर पूर्वी राज्य और पंजाब में हैं।

-जलवायु परिवर्तन का जोखिम 109 जिलों में बहुत अधिक है। इनमें सबसे अधिक जिले उत्तर प्रदेश (22), राजस्थान (17), बिहार (10), केरल (8), उत्तराखंड (7), ओडिशा (6), पंजाब ( 5) हैं। बाकी जिले पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, मिजोरम, असम हिमाचल प्रदेश के हैं।

-अधिक जोखिम वाले 201 जिले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र में हैं। खेती और किसानों को जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से बचाने के लिए इन जिलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

(प्रकाश चावला सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)