सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहा है यूरिया का आयात

पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई उर्वरक सुरक्षा की चिंता, महंगा आयात और बढ़ती सब्सिडी सरकार के सामने दोहरी चुनौती

28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध का सबसे प्रतिकूल प्रभाव एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों पर पड़ रहा है। दक्षिण एशियाई देश विशेष रूप से इससे गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। एशियाई विकास बैंक का अनुमान है कि यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो विकासशील एशियाई देशों की आर्थिक वृद्धि दर में 1.3 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और महंगाई में 3.2 प्रतिशत तक इजाफा हो सकता है।

यह अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व का ही नतीजा है कि इन देशों में से शायद ही किसी ने युद्ध शुरू करने के लिए जिम्मेदार देशों की स्पष्ट रूप से पहचान करने का साहस दिखाया हो। इजराइल का ईरान को पूरी तरह तबाह करने और वहां शासन में परिवर्तन कराने का उद्देश्य पूरा होगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन भारत सहित कई अन्य देश गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

पश्चिम एशिया वैश्विक यूरिया निर्यात के लगभग आधे और अमोनिया के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति करता है। ये दोनों ही फसल उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उत्पादकों में से एक, कतर स्थित क्यूएएफसीओ (QAFCO) ने युद्ध के कारण अपना संचालन स्थगित कर दिया है। उसका उत्पादन सामान्य स्तर पर लौटने में कितना समय लगेगा, यह फिलहाल नहीं कहा जा सकता।

वैश्विक सल्फर निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत खाड़ी क्षेत्र के उत्पादकों से आता है, जबकि कतर विश्व की कुल हीलियम आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई हिस्सा उपलब्ध कराता है। सल्फर और हीलियम दोनों ही उर्वरक उत्पादन, धातु प्रसंस्करण तथा सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए आवश्यक हैं।

एलएनजी की उपलब्धता इस युद्ध से पहले ही सीमित हो चुकी थी, क्योंकि यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों में रूस से एलएनजी आयात पर पूर्ण रोक शामिल था। इसके तहत 25 अप्रैल 2026 से अल्पकालिक अनुबंधों और 1 जनवरी 2027 से दीर्घकालिक अनुबंधों के माध्यम से एलएनजी आयात पर रोक लगाई गई है। रूस में उत्पादित या वहां से निर्यात की गई एलएनजी की प्रत्यक्ष या परोक्ष खरीद, आयात अथवा हस्तांतरण प्रतिबंधित कर दिया गया है। 

भारत में यूरिया उत्पादन की स्थिति

भारत में उर्वरकों की कुल खपत में यूरिया की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत है। डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) तथा नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (एनपीके) जैसे कॉम्प्लेक्स उर्वरक कुल खपत का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रखते हैं। शेष खपत सिंगल सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) से पूरी होती है।

उर्वरकों के मामले में भारत आयात पर काफी निर्भर है। यूरिया की खपत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है। कॉम्प्लेक्स उर्वरकों, विशेषकर डीएपी की कुल आवश्यकता का लगभग एक-तिहाई आयात से पूरा होता है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) के एक शोध-पत्र के अनुसार, यदि आयातित एलएनजी की हिस्सेदारी को भी शामिल किया जाए, तो 2024-25 में यूरिया के मामले में भारत की वास्तविक आत्मनिर्भरता केवल 46 प्रतिशत थी।

एलएनजी घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए प्रमुख कच्चा माल है। यह यूरिया निर्माण में कुल कच्चे माल की लागत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा होता है। वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 2.6 करोड़ टन एलएनजी का आयात किया, जिसका मूल्य 13.3 अरब डॉलर था। पत्रकार हरीश दामोदरन का आकलन है कि इसमें से लगभग 6.3 अरब डॉलर की एलएनजी का आयात केवल यूरिया बनाने के लिए हुआ।

ईरान युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। इंडियन पोटाश लिमिटेड के हाल के 25 लाख टन यूरिया खरीद टेंडर में प्राप्त दरें 935-959 डॉलर प्रति टन (लागत एवं मालभाड़ा सहित) रहीं। यह पिछले वर्ष की 410-420 डॉलर प्रति टन की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। इसका अर्थ है कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट में निर्धारित 1.26 लाख करोड़ रुपये की यूरिया सब्सिडी के प्रावधान की तुलना में सरकार का वास्तविक व्यय काफी अधिक हो सकता है। हालांकि राहत की बात है कि वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें बाद में घटकर लगभग 650 डॉलर प्रति टन पर आ गई हैं।

लेकिन यह याद रखना चाहिए कि घरेलू यूरिया उत्पादन की लागत अक्सर वैश्विक कीमतों से अधिक रही है। इसका कारण यह है कि कतर, सऊदी अरब और रूस जैसे देशों के पास एलएनजी के बड़े भंडार हैं, जिससे यूरिया उत्पादन के लिए उनकी इनपुट लागत काफी कम रहती है।

यूरिया को लेकर भारत की चिंताओं ने उसकी नीतियों को दिशा दी है, और भारत-ओमान यूरिया समझौता इस संदर्भ में अत्यंत सफल साबित हुआ है। भारत ने वर्ष 2005-06 में ओमान में एक संयुक्त उद्यम कंपनी ओएमआईएफसीओ (ओमान इंडिया फर्टिलाइजर कंपनी) में निवेश किया था। इस कंपनी में इफको और कृभको की 25-25 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी है। एलएनजी के बड़े भंडार वाले अन्य देशों में भी इसी प्रकार के संयुक्त उद्यम वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने का विकल्प प्रदान कर सकते हैं तथा भारतीय बाजार को स्थिरता दे सकते हैं।

सरकार यूरिया आयात पर निर्भरता की स्थिति के प्रति सजग रही है। इसी उद्देश्य से यूरिया क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने और भारत को यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए जनवरी 2013 में नई निवेश नीति की घोषणा की गई थी। इसके बाद वर्ष 2015 में नई यूरिया नीति लागू की गई, जिसका उद्देश्य भारत में पहले से संचालित 25 गैस आधारित यूरिया संयंत्रों के संचालन को ऑप्टिमाइज और रेगुलेट करना था।

इसके बाद से छह नए यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए हैं, जिनमें से चार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से तथा दो निजी कंपनियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप देश में यूरिया का घरेलू उत्पादन 2014-15 के 225 लाख टन से बढ़कर 2023-24 में 314.07 लाख टन हो गया। वर्ष 2024-25 के दौरान देश में 306.67 लाख टन यूरिया का उत्पादन किया गया।

चूंकि निजी निर्माता सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहते हैं, इसलिए वे इस क्षेत्र में निवेश को अधिक आकर्षक नहीं मानते। अतीत में बजटीय सीमाओं के कारण सब्सिडी भुगतान में देरी भी होती रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि घरेलू यूरिया उत्पादन इकाइयां आयातित एलएनजी पर निर्भर हैं। इसलिए किसानों द्वारा यूरिया का विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

यूरिया सब्सिडी में सुधार का इंतजार

वर्ष 2010 में यूपीए सरकार ने न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) व्यवस्था लागू की थी। इसके परिणामस्वरूप फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों पर सब्सिडी घटकर क्रमशः 45 प्रतिशत और 5 प्रतिशत रह गई (खरीफ 2025)। लेकिन यूरिया पर यह सुधार लागू नहीं किया गया और 2010-11 से इसकी कीमतों में संशोधन न होने के कारण यूरिया पर सब्सिडी बढ़कर 80-85 प्रतिशत (खरीफ 2025) तक पहुंच गई है।

इसका परिणाम यह हुआ कि नाइट्रोजन का उपयोग लगातार बढ़ता गया, जबकि फॉस्फोरस और पोटाश की खपत अपेक्षाकृत बहुत धीमी गति से बढ़ी। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में इन उर्वरकों की खपत का अनुपात 20:5:1 तक पहुंच गया है (उर्वरक विभाग, 24 मार्च 2026)।

नाइट्रोजन (यूरिया) के प्रयोग को तर्कसंगत बनाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं, क्योंकि खेतों में डाली गई यूरिया का एक-तिहाई से भी कम हिस्सा पौधों द्वारा अवशोषित किया जाता है, जबकि शेष भूजल और वायुमंडल को प्रदूषित करता है।

हालांकि, यह राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील विषय है, जिस पर दशकों से निर्णय लंबित है। किसानों के लिए यूरिया की कीमत बढ़ाने से खेती की लागत में वृद्धि होगी, जिसका प्रभाव अंततः न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण में भी दिखाई देगा।

(सिराज हुसैन, भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव हैं)