ईरान पर अमेरिका के ताजा हमलों से तेल व उर्वरक संकट और गहराया, वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

ईरानी ठिकानों पर अमेरिका के ताजा हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आया है। इन हमलों से वैश्विक उर्वरक और कृषि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और गहरा गया है। यूरिया, अमोनिया और फॉस्फेट की बढ़ती कीमतों के कारण किसान उर्वरकों का इस्तेमाल घटाने को मजबूर हैं, जिससे 2026 में अनाज उत्पादन घटने, खाद्य महंगाई बढ़ने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा संकट की आशंका तेज हो गई है।

मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई। अमेरिका की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरानी ठिकानों पर नए हमले के बाद यह तेजी आई है। इससे खाड़ी क्षेत्र में लंबे संघर्ष की आशंकाएं फिर बढ़ गईं और वैश्विक ऊर्जा, उर्वरक तथा खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। ताजा हमलों ने शांति की उम्मीदों को फिर कमजोर कर दिया है, जिससे कृषि इनपुट की आपूर्ति में कमी की आशंका बढ़ गई है। संकट के कारण मध्य पूर्व से यूरिया, अमोनिया और फॉस्फेट के निर्यात पहले ही प्रभावित हो चुके हैं, जिससे उर्वरकों की कीमतों में तेज उछाल आया है। 2026 में वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन घटने, खाद्य महंगाई बढ़ने तथा व्यापक खाद्य सुरक्षा संकट की आशंकाएं तेज हो गई हैं।

इस रणनीतिक समुद्री मार्ग के बंद होने से मध्य पूर्व से सल्फर, अमोनिया, यूरिया और फॉस्फेट उर्वरकों के निर्यात पर गंभीर असर पड़ा है। इससे वैश्विक बाजारों में कमी पैदा हो गई है और कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। अब 13वें सप्ताह में पहुंच चुका यह संकट केवल शिपिंग व्यवधान नहीं रह गया है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार यह एक व्यापक कृषि-खाद्य झटके में बदल चुका है, जो अगले छह से 12 महीनों के भीतर वैश्विक खाद्य संकट को जन्म दे सकता है।

मालवाहक जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होने से मध्य पूर्व के उर्वरक उत्पादकों को निर्यात बनाए रखने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सऊदी अरब की केमिकल कंपनियों ने कुछ माल होर्मुज से बचते हुए लाल सागर के बंदरगाहों के जरिए भेजने की कोशिश की है, लेकिन इसके बावजूद वैश्विक बाजार में सऊदी उर्वरकों की आपूर्ति लगभग आधी रह गई है। खाड़ी क्षेत्र के कई अन्य उत्पादक सल्फर और फॉस्फेट उत्पादों की आपूर्ति पूरी तरह नहीं कर पा रहे हैं।

इन व्यवधानों का असर केवल तेल और गैस व्यापार तक सीमित नहीं है। सामान्य तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली नैफ्था, एलएनजी, एलपीजी, हीलियम, अमोनिया और यूरिया की आपूर्ति भी फंस गई है, जिससे उर्वरक, प्लास्टिक और कृषि आपूर्ति श्रृंखलाओं में लगातार बाधाएं पैदा हो रही हैं।

खेतों को खाली छोड़ने की सोच रहे किसान

वैश्विक अनाज बाजार अब इस संकट का असर महसूस करने लगे हैं। यूरोप, अर्जेंटीना और अन्य क्षेत्रों के किसान उर्वरकों का उपयोग घटा रहे हैं, खरीद टाल रहे हैं, कम इनपुट वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं या बढ़ती उत्पादन लागत के कारण खेतों को बिना बोए छोड़ने पर विचार कर रहे हैं।

यूरोपीय आयोग के अनुसार, फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से यूरिया की कीमतों में 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अर्जेंटीना में बेंचमार्क यूरिया कीमतें संकट से पहले लगभग 500 डॉलर प्रति टन से बढ़कर करीब 1,000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं।

यूरोप के किसान पहले से ही ऊंची ऊर्जा कीमतों, सख्त पर्यावरणीय नियमों और बढ़ती कर्ज लागत का सामना कर रहे हैं। पूर्वी यूरोप के कृषि संगठनों ने चेतावनी दी है कि इस वर्ष छोड़ी गई कृषि भूमि का क्षेत्र तेजी से बढ़ सकता है, क्योंकि खेती आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रह गई है।

विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा उथल-पुथल पहले के उर्वरक संकटों से अलग है, क्योंकि इसमें आपूर्ति की कमी, ऊर्जा महंगाई और भू-राजनीतिक अनिश्चितता एक साथ जुड़ गई हैं। उर्वरक बाजार पिछले छह वर्षों में कई झटके झेल चुका है, जिनमें कोविड काल की लॉजिस्टिक बाधाएं और रूस-यूक्रेन युद्ध शामिल हैं। इन घटनाओं ने मौजूदा संकट से पहले ही कीमतों को संरचनात्मक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया था। अब यह नया संकट वैश्विक उर्वरक व्यापार और अनाज उत्पादन के पैटर्न को मूल रूप से बदलने की आशंका पैदा कर रहा है।

वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत और अमोनिया निर्यात का 30 प्रतिशत खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी बाधाओं के जोखिम में है, जिसके कारण व्यापार मार्ग लंबे और अधिक महंगे रास्तों की ओर मोड़े जा रहे हैं।

दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों के लिए खतरा और अधिक गंभीर है, क्योंकि वे खाड़ी क्षेत्र से आने वाली उर्वरक आपूर्ति पर भारी निर्भर हैं। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक उपलब्धता में कमी, बढ़ती माल ढुलाई लागत और ऊंची ऊर्जा कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उर्वरक महंगाई को और बढ़ा रही हैं।

उर्वरकों की कमी से खाद्यान्न उत्पादन घट सकता है

एफएओ ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा संकट जारी रहता है तो 2026 की पहली छमाही में वैश्विक उर्वरक कीमतें 15 से 20 प्रतिशत तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इसका फसल पर गंभीर असर पड़ सकता है, खासकर विकासशील देशों में, जहां किसानों की कर्ज और कृषि निवेश वित्त तक पहुंच सीमित है। संगठन ने आगाह किया कि अमोनिया, फॉस्फेट, सल्फर और यूरिया आधारित उर्वरकों की उपलब्धता घटने से अगले छह से नौ महीनों में गेहूं, मक्का और चावल जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों का उत्पादन कम हो सकता है।

इसका असर वैश्विक खाद्य बाजारों में दिखना शुरू हो गया है। मध्य-पूर्व संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं और ऊर्जा लागत बढ़ने के कारण अप्रैल में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स लगातार तीसरे महीने बढ़ा। विशेषज्ञ इस संकट को कई चरणों में फैलने वाली श्रृंखला प्रतिक्रिया के रूप में देख रहे हैं - ऊर्जा आपूर्ति में बाधा, उर्वरकों की कमी, बीज और पोषक तत्वों के उपयोग में कटौती, उत्पादन में गिरावट, जिंस कीमतों में बढ़ोतरी और अंततः खाद्य मुद्रास्फीति।

किसान सतर्कता के साथ अब बचाव की रणनीति अपना रहे हैं। अनेक जगहों पर किसान नाइट्रोजन उर्वरकों के इस्तेमाल में कटौती कर रहे हैं, फसल चक्र बदल रहे हैं और जौ, ओट्स तथा सोयाबीन जैसी कम उर्वरक वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।

अर्जेंटीना में कुछ किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उर्वरक कीमतों में जल्द राहत नहीं मिली तो गेहूं का कुछ क्षेत्र बिना बोवाई के रह सकता है। वहीं दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक निर्यातकों में शामिल रूस में घरेलू कीमतों में तेज बढ़ोतरी और कमी के बाद किसान संगठनों ने उर्वरकों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।

विश्लेषकों का कहना है कि निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर खेती छोड़ने की संभावना कम है, क्योंकि अधिकांश किसानों पर जमीन का किराया और बैंक ऋण जैसे स्थायी खर्चों का दबाव है, जिससे खेती पूरी तरह बंद करना आसान नहीं है। हालांकि यदि उर्वरक और ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सीमांत और कम उत्पादक भूमि पर खेती में बड़ी गिरावट आ सकती है।

वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर अल नीनो का भी दबाव

जलवायु संबंधी जोखिमों ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। FAO ने चेतावनी दी है कि अल नीनो की संभावित शुरुआत कई कृषि क्षेत्रों में सूखे को बढ़ा सकती है तथा वर्षा और तापमान के पैटर्न को बाधित कर सकती है, जिससे वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

व्यापक आपातस्थिति को रोकने के लिए एफएओ ने तत्काल अंतरराष्ट्रीय समन्वय की मांग की है। इसके सुझाए गए उपायों में पूर्वी अरब प्रायद्वीप और लाल सागर के रास्ते वैकल्पिक शिपिंग कॉरिडोर विकसित करना, निर्यात प्रतिबंधों से बचना, मानवीय खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित रखना तथा संवेदनशील देशों को वित्तीय और आपूर्ति सहायता प्रदान करना शामिल है।

संगठन ने कि उर्वरक आयात, फसल चयन और कृषि वित्तपोषण को लेकर सरकारों और किसानों द्वारा अभी लिए जा रहे फैसले यह तय करेंगे कि मौजूदा आपूर्ति संकट आने वाले एक वर्ष में पूर्ण वैश्विक खाद्य संकट में बदलता है या नहीं।