भारत का कृषि परिवर्तन न तो आकस्मिक था और न ही पूर्वनिर्धारित। इसे दूरदर्शी नेतृत्व, वैज्ञानिक सोच और मजबूत संस्थागत निर्माण ने आकार दिया। खाद्यान्न की कमी से निकलकर कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की यात्रा के पीछे राष्ट्रनिर्माताओं की एक ऐसी पीढ़ी थी, जिनके योगदान ने देश के विकास की दिशा ही बदल दी। उनमें से बहुत कम व्यक्तित्व ऐसे हैं जिनकी छाप डॉ. राज एस. परोदा जितनी गहरी और स्थायी रही हो।
हाल ही प्रकाशित संस्मरण द विजनरी आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न एग्रीकल्चर, जिसे डॉ. संजय कुमार और अरुण तिवारी ने लिखा है, एक ऐसे वैज्ञानिक और प्रशासक की असाधारण यात्रा को सामने लाता है, जिनका जीवन भारत के कृषि पुनर्जागरण से गहराई से जुड़ा हुआ है।
ग्रामीण भारत की मिट्टी से जुड़े डॉ. परोदा ने कृषि को केवल एक वैज्ञानिक गतिविधि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्थिरता, किसान सम्मान और सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला के रूप में देखा। अपने पूरे करियर में वे भारतीय किसानों की कमजोरियों, आकांक्षाओं, संघर्षों और जुझारूपन के साथ गहराई से जुड़े रहे। यही जुड़ाव उनके नेतृत्व में वैज्ञानिक सख्ती और मानवीय संवेदनशीलता का दुर्लभ संतुलन लेकर आया।
डॉ. परोदा के नेतृत्व में भारत की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली में व्यापक आधुनिकीकरण और विविधीकरण हुआ। उनके मार्गदर्शन में बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन और उन्नत कृषि विज्ञान से जुड़े 30 से अधिक संस्थानों की स्थापना हुई या उन्हें महत्वपूर्ण रूप से सशक्त बनाया गया। इन सुधारों ने भारतीय कृषि को केवल अनाज आधारित व्यवस्था तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उत्पादकता, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि को भी नई दिशा दी।
उनके सबसे दूरदर्शी योगदानों में भारत के राष्ट्रीय जीन बैंक की स्थापना शामिल है, जिसे आज विश्व के सबसे महत्वपूर्ण फसल आनुवंशिक संसाधन भंडारों में गिना जाता है। जलवायु संकट, जैव विविधता के नुकसान और खाद्य असुरक्षा के बढ़ते खतरे के बीच आनुवंशिक संरक्षण में यह निवेश आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बन गया है।
यह संस्मरण भारत के कृषि इतिहास के एक निर्णायक दौर को भी याद करता है, जब 1987 से 2011 के बीच खाद्यान्न उत्पादन में हुई उल्लेखनीय वृद्धि। वैज्ञानिक नवाचार, नीतिगत समर्थन, संस्थागत समन्वय और किसानों की सक्रिय भागीदारी के जरिए भारत ने खाद्य असुरक्षा से आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाया। डॉ. परोदा ने न केवल हरित क्रांति की उपलब्धियों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि इसे मक्का, कपास, फल, सब्जियों और टिकाऊ कृषि प्रणालियों तक विस्तार करने में भी योगदान दिया।
उनका प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। ग्लोबल फोरम ऑन एग्रीकल्चरल रिसर्च के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में डॉ. परोदा ने कृषि नवाचार, सहयोगात्मक अनुसंधान और विकासशील देशों के लिए न्यायसंगत खाद्य प्रणालियों पर वैश्विक विमर्श को दिशा दी। उनका कार्य हमेशा इस व्यापक विचारधारा को प्रतिबिंबित करता रहा कि कृषि विज्ञान को मानवता की सेवा करनी चाहिए, असमानता को कम करना चाहिए और कमजोर वर्गों के भविष्य को सुरक्षित बनाना चाहिए।
“कोड परोदा” को विशेष रूप से प्रभावशाली बनाती है इसकी गहरी मानवीय संवेदना। कृषि वैज्ञानिक चयन बोर्ड के चेयरमैन डॉ. संजय कुमार और विंग्स ऑफ फायर के प्रसिद्ध लेखक अरुण तिवारी की यह रचना वैज्ञानिक प्रामाणिकता और साहित्यिक सौंदर्य का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। तिवारी के पूर्व कार्यों से परिचित पाठक यहां भी वही मिशन भावना, विनम्रता और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा महसूस करेंगे, जो एक जीवनी को प्रेरणास्रोत में बदल देती है।