पश्चिम एशिया संघर्ष का असर, खाद्य तेलों के दाम में हल्की बढ़ोतरी संभवः IVPA

भूराजनीतिक तनाव, जलवायु जोखिम और बढ़ती बायोफ्यूल मांग के बीच भारत के खाद्य तेल आयात में महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है। यह कीमत आधारित खरीद से आपूर्ति आधारित सोर्सिंग की ओर जा रहा है। कमजोर मानसून, कच्चे तेल की अस्थिरता और वैश्विक आपूर्ति बाधाएं कीमतों को बढ़ा सकती हैं, हालांकि नीतिगत समर्थन और कुशल आपूर्ति श्रृंखला से स्थिरता बने रहने की उम्मीद है।

भारत का खाद्य तेल क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। जलवायु झटके, भूराजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार तीनों का असर इस पर दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप खाद्य तेल का आयात कीमत आधारित से बदलकर आपूर्ति आधारित की ओर जा रहा है। 

इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) की उपाध्यक्ष भावना शाह ने 24वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘ब्लैक सी ग्रेन.कीव-2026’ (BLACK SEA GRAIN.KYIV-2026) में कहा, “तीन कारक 2026-27 में प्रभाव डालेंगे, ये हैं - कमजोर मानसून, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक स्तर पर बायोफ्यूल की बढ़ती मांग। हालांकि, समग्र रुझान थोड़ा सकारात्मक बना रहेगा क्योंकि उद्योग की कुशल आपूर्ति श्रृंखला और जरूरत पड़ने पर नीतिगत हस्तक्षेप के चलते भारत में स्थिति स्थिर बनी हुई है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि कमजोर मानसून, कच्चे तेल में अस्थिरता, उर्वरकों की कमी, गैस-आधारित उत्पादन में बाधाएं और बायोफ्यूल अनिवार्यता के कारण वैश्विक पाम तेल आपूर्ति में कमी से खाद्य तेल महंगाई में हल्की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, भारत की अतिरिक्त आपूर्ति को समाहित करने की क्षमता सुरक्षा कवच का काम करेगी। उन्होंने कहा, “भारत किसी भी अतिरिक्त आपूर्ति के लिए प्रमुख गंतव्य बना हुआ है। दुनिया में जहां भी अधिशेष होगा, भारत उसे खपत करने वाले केंद्र के रूप में देखा जाता है।” 

खाद्य तेल अब केवल खाद्य वस्तु नहीं रह गए हैं। ईंधन की कीमतों में तेजी आने पर फीडस्टॉक के डायवर्जन के कारण वैश्विक खाद्य तेल कीमतों में लगभग समानांतर बढ़ोतरी होती है। उन्होंने कहा कि नीतिगत और बाजार आकलन में खाद्य सुरक्षा, चारा आवश्यकताओं और ईंधन मांग को एक साथ ध्यान में रखना होगा, क्योंकि इनकी परस्पर निर्भरता कीमतों में अस्थिरता और व्यापार को प्रभावित कर रही है।

खाद्य तेल आयात लगभग 150 से 170 लाख मीट्रिक टन के दायरे में बना हुआ है। मार्च 2026 में आयात साल-दर-साल 11% बढ़कर 11.9 लाख टन रहा। हालांकि, ऊंची कीमतों के कारण दो महीनों का औसत 12% घट गया। तेल वर्ष 2025-26 के लिए खाद्य तेल आयात 165 लाख टन और घरेलू उत्पादन 96 लाख टन रहने का अनुमान है। भारत अपनी खाद्य तेल खपत का लगभग 60% आयात पर निर्भर है, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में शामिल है।

आयात स्ट्रक्चर के बारे में उन्होंने कहा कि सूरजमुखी तेल की मांग मजबूत बनी रहेगी, जबकि विशेषकर अर्जेंटीना में आपूर्ति बाधाओं के कारण सोयाबीन तेल की खेप में देरी हो सकती है। कीमतों में अंतर के चलते पाम तेल की शिपमेंट मजबूत बनी रहेगी। आयात में पाम तेल का दबदबा रहेगा। फिलहाल पाम लागत के लिहाज से आगे है।”

उन्होंने कहा कि तेल पाम राष्ट्रीय मिशन, तिलहन राष्ट्रीय मिशन, एमएसपी वृद्धि और आत्मनिर्भरता जैसे प्रयासों के बावजूद मध्यम अवधि में आपूर्ति की तंगी बनी हुई है। खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता की दिशा में, सरकार तेल पाम और तिलहन मिशन के माध्यम से क्रमशः विस्तार और विविधीकरण हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसके लिए कुल 2.5 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “विकसित होती नीतिगत रूपरेखा वैश्विक भूराजनीतिक तनाव के बीच आगे आयात पैटर्न और कीमतों की दिशा तय करेगी। भारत सरकार ने नीतियों को संतुलित कर, आपूर्ति सुनिश्चित कर, महंगाई को नियंत्रित कर और वैश्विक व्यवधानों के बावजूद स्थिरता बनाए रखते हुए बेहद निर्णायक कदम उठाए हैं।”