वनस्पति तेल आयात मई में 8% बढ़ा; कच्चा तेल आयात में उछाल, रिफाइंड पाम ऑयल आयात में भारी गिरावट

मई 2026 में भारत का वनस्पति तेल आयात सालाना आधार पर 8 प्रतिशत बढ़कर 13.65 लाख टन पहुंच गया। प्रतिस्पर्धी कीमतों के कारण कच्चे सोयाबीन तेल का आयात बढ़ा। शुल्क में अंतर के चलते कच्चे तेल की हिस्सेदारी 97 प्रतिशत तक पहुंच गई और रिफाइंड पाम तेल का आयात तेजी से घटा। मजबूत आयात और घरेलू उत्पादन के कारण खाद्य तेल का भंडार बढ़कर 22.13 लाख टन हो गया।

वनस्पति तेल आयात मई में 8% बढ़ा; कच्चा तेल आयात में उछाल, रिफाइंड पाम ऑयल आयात में भारी गिरावट

मई 2026 में भारत का कुल वनस्पति तेल आयात (खाद्य एवं गैर-खाद्य तेलों सहित) 13.65 लाख टन रहा, जो मई 2025 में आयातित 12.67 लाख टन की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 के दौरान कुल आयात में 13.39 लाख टन खाद्य तेल तथा 26,202 टन गैर-खाद्य तेल शामिल रहे।

मई में दर्ज यह वृद्धि चालू तेल वर्ष के व्यापक आयात रुझान को भी दर्शाती है। तेल वर्ष 2025-26 के पहले सात महीनों (नवंबर 2025 से मई 2026) के दौरान कुल वनस्पति तेल आयात 93.65 लाख टन तक पहुंच गया। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के 83.39 लाख टन की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है।

कीमतों और शुल्क संशोधनों से बढ़ा सोयाबीन तेल आयात

मासिक आधार पर देखें तो मई 2026 में खाद्य तेल आयात अप्रैल के 13.07 लाख टन से 2.4 प्रतिशत बढ़ा। यह वृद्धि मुख्य रूप से कच्चे सोयाबीन तेल की खरीद बढ़ने के कारण हुई। इस दौरान सोयाबीन तेल और पाम तेल के बीच कीमतों का अंतर काफी कम हो गया, जिससे सोयाबीन तेल अधिक प्रतिस्पर्धी बन गया और इसकी मांग बढ़ी।

केंद्र सरकार ने 1 जून 2026 से आयात शुल्क मूल्य (टैरिफ वैल्यू) में संशोधन भी किया है। कच्चे पाम तेल (CPO) की टैरिफ वैल्यू बढ़ाकर 1,218 अमेरिकी डॉलर प्रति टन तथा आरबीडी पाम तेल की टैरिफ वैल्यू बढ़ाकर 1,222 अमेरिकी डॉलर प्रति टन कर दी गई। दूसरी ओर, सरकार ने कच्चे सोयाबीन तेल की टैरिफ वैल्यू में मामूली कमी की, जिससे आयातकों की प्राथमिकताओं पर असर पड़ा।

रिफाइंड पाम तेल आयात में भारी गिरावट

SEA की रिपोर्ट की सबसे उल्लेखनीय बात रिफाइंड पाम तेल के आयात में बड़ी गिरावट है। मई 2026 में आरबीडी पामोलीन का कोई आयात दर्ज नहीं किया गया। नवंबर 2025 से मई 2026 के दौरान आरबीडी पामोलीन का कुल आयात घटकर केवल 47,270 टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 8,26,800 टन था।

यह गिरावट घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए अपनाई गई व्यापार एवं शुल्क नीतियों का परिणाम है। भारत सरकार ने कच्चे और रिफाइंड तेलों के बीच उच्च आयात शुल्क अंतर को बनाए रखा है, जिससे रिफाइंड तेलों का आयात आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो गया। परिणामस्वरूप कुल आयात में रिफाइंड तेलों की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत से घटकर केवल 3 प्रतिशत रह गई, जबकि कच्चे तेलों की हिस्सेदारी 84 प्रतिशत से बढ़कर 97 प्रतिशत हो गई। इससे घरेलू रिफाइनिंग, स्थानीय मूल्य संवर्धन और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिला है।

नेपाल से शुल्क मुक्त आयात जारी

हालांकि प्रत्यक्ष रूप से रिफाइंड पाम तेल का आयात कम हुआ है, लेकिन नेपाल से रिफाइंड तेलों का आयात बड़ी मात्रा में जारी है। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) समझौते के तहत मिलने वाले शून्य-शुल्क लाभ का उपयोग करते हुए नेपाल ने मई 2026 में भारत को अनुमानित 60,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया, जबकि अप्रैल में यह मात्रा 58,000 टन थी। नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच नेपाल ने भारत को कुल 2,80,349 टन रिफाइंड तेल भेजा। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रिफाइंड सोयाबीन तेल का रहा, जिसकी मात्रा 2,46,005 टन थी।

घरेलू खाद्य तेल भंडार में वृद्धि

मजबूत आयात और सरसों तेल के उच्च घरेलू उत्पादन के कारण भारत में खाद्य तेल का कुल भंडार 1 जून 2026 तक बढ़कर 22.13 लाख टन हो गया। यह 1 मई की तुलना में 1.46 लाख टन अधिक है। प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार बंदरगाहों पर 9.39 लाख टन का भंडार मौजूद था, जबकि पाइपलाइन स्टॉक 12.74 लाख टन रहा।

वैश्विक आपूर्ति स्रोत और बढ़ती चुनौतियां

भौगोलिक दृष्टि से इंडोनेशिया (17.2 लाख टन) और मलेशिया (17.6 लाख टन) भारत के लिए पाम तेल के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने रहे। सोयाबीन तेल की आपूर्ति में अर्जेंटीना 16.4 लाख टन के साथ सबसे बड़ा स्रोत रहा, जबकि सूरजमुखी तेल के प्रमुख निर्यातकों में रूस, अर्जेंटीना और यूक्रेन शामिल रहे।

हालांकि आपूर्ति श्रृंखला फिलहाल स्थिर बनी हुई है, लेकिन भारतीय रिफाइनरियों के सामने लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। पिछले एक वर्ष में कच्चे पाम तेल (CPO) की कीमत 22 प्रतिशत, आरबीडी पामोलीन की कीमत 23 प्रतिशत तथा सोयाबीन तेल की कीमत 22 प्रतिशत बढ़ चुकी है।

इन बढ़ती कीमतों के साथ-साथ भारतीय रुपये में पिछले एक वर्ष के दौरान लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट ने आयात लागत को और बढ़ा दिया है। यह स्थिति घरेलू आयातकों और रिफाइनिंग उद्योग के लिए एक प्रमुख वित्तीय चुनौती बनकर उभरी है।

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