'ब्रोक टू ब्रेकथ्रू' देश की सबसे बड़ी प्राइवेट डेयरी कंपनी के बनने की दास्तान

'ब्रोक टू ब्रेकथ्रू' में एक गांव और किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति किस तरह से औपचारिक बिजनेस एजुकेशन के बिना कैसे देश का एक सफल बिजनेसमैन बना यह उसका चित्रण तो है ही साथ ही दूध और आइसक्रीम जैसे जटिल बिजनेस को किस तरह से खड़ा किया गया यह उसकी केस स्टडी भी है

हरीश दामोदरन द्वारा हैटसन एग्रो प्रॉडक्ट पर लिखी किताब 'ब्रोक टू ब्रैकथ्रू’ के शुरुआती हिस्से ने मुझे करीब तीस साल पुरानी दुनिया में लौटा दिया। आर. जी. चंद्रमोगन द्वारा मात्र 13 हजार रुपये के निवेश से शुरू किया गया आइसक्रीम का बिजनेस धीरे- धीरे आगे बढ़ रहा था। यही वह समय था जब मैं देश की सबसे बड़ी आइक्रीम कंपनी क्वालिटी के साथ काम कर रहा था। आठवें दशक के अंतिम बरसों में मैं उत्तर प्रदेश के हल्दवानी से लेकर बदायूं और पीलीभीत जैसे कस्बेनुमा शहरों में अपने यात्राओं के दौरान इस बिजनेस की मुश्किलें देख रहा था। यह स्थितियां उत्तर प्रदेश के बरेली और बनारस जैसे बड़े शहरों में भी कुछ अलग नहीं थी क्योंकि बिजली जैसे बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिक्कत के चलते यह कारोबार आसान नहीं था। साथ ही कोई बड़ा इन्नोवेशन भी यह कंपनी नहीं कर पा रही थी। उस दौर में उत्तर भारत में कई आइसक्रीम कंपनियां आई और कुछ बरसों के बाद दम तोड़ती गई। वहीं नौवें दशक में क्वालिटी जैसी कंपनी को भी हिन्दुस्तान लीवर ने खरीद लिया। असल में उस कंपनी के प्रमोटरों के पास वह विजन नहीं था जो एक नये कारोबारी के पास था। इन परिस्थितियों और बिजनेस माहौल के बीच ही जिस तरह से हैटसन आइक्रीम के बिजनेस का विस्तार करती है और पार्टनरशिप फर्म से अपने अवतार बदलते हुए स्टॉक मार्केट में शेयरधारकों को भारी मुनाफा देने वाली 5600 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर और 30 हजार करोड़ रुपये के मार्केट कैपिटलाजेशन वाली देश की सबसे बड़ी निजी डेयरी कंपनी में तब्दील होती है। इसके पीछे आर. जी. चंद्रमोगन की कारोबारी दक्षता और फैसले लेने की विलक्षण प्रतिभा है जो कारोबार के नाकाम होने के करीब पहुंचने से लेकर कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ रहा था। चंद्रमोगन और हैटसन का यह सफर किसाब के टाइटल ‘ब्रोक टू ब्रेकथ्रू’ द राइज ऑफ इंडियाज लार्जेस्ट प्राइवेट डेयरी कंपनी को साबित करने में कामयाब होता है।

कंपनी के प्रमोटर आर. चंद्रमोगन के चरित्र को बहुत करीब से परखने की कोशिश इस किताब में हरीश दामोदरन ने की है। देश के सबसे अनुभवी और बेहतर पत्रकारों में शुमार कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर करीब तीन दशक से काम रहे और अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के रूरल अफेयर्स एडिटर हरीश दामोदरन का बिजनेस बॉयोग्राफी और कंपनी की हिस्ट्री को पाठकों के सामने रखने का कौशल पाठक को विषय के करीब लाने की एक कला की तरह  है।

वह इस कहानी के हर पक्ष को बहुत बारीकी के साथ सामने रखते हैं, जैसे वह विस्तार से बताते हैं कि कैसे चंद्रमोगन ने पढ़ाई बीच में छोड़ देने और उसके बाद एक आरा मिल में छोटी सी नौकरी करने के बाद 1970 में 25 हजार रुपये के निवेश से एक दुकाननुमा किराये की जगह में आइसक्रीम फैक्टरी की शुरुआत की। एक रिश्तेदार की सलाह पर शुरू किये गये इस बिजनेस के लिए तमिलनाड मर्केंटाइल बैंक से लिया गया 12 हजार रुपये का कर्ज और उनके पिता की तीन दुकानों की बिक्री से आए 13 हजार रुपये कुल निवेश था। यहां से अरूण आइसक्रीम की शुरूआत हुई। चंद्रमोगन की कंपनी को एक करोड़ रूपये के टर्नओवर तक पहुंचने में 18 साल लगे जो 1987-88 में संभव हुआ। इसके अगले 13 साल में कंपनी 100 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंची लेकिन इसके बाद आठ साल में कंपनी ने एक हजार करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल कर लिया। साल दर साल नया मुकाम हासिल करते हुए कंपनी 5000 करोड़ के टर्नओवर को पार चुकी है। हैटसन एग्रो प्राडक्ट के साथ चार लाख किसान जुड़े हुए हैं। यह कंपनी कर्मचारियों, वेंडरों और बिजनेस पार्टनर्स को मिलाकर करीब 50 हजार लोगों को रोजगार दे रही है।   

इस किताब के माध्यम से बहुत करीब से देखा जा सकता है कि जब देश में उदारीकरण की नीतियों के चलते एक आकांक्षी वर्ग खड़ा हो रहा था। साथ ही आइसक्रीम अपने आप में एक जटिल कारोबार था क्योंकि इसके लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की खासी कमी थी। आइसक्रीम को रखने के लिए फ्रीजर को बिजली की जरूरत होती है और उस समय अधिकांश जगहों पर इस बिजनेस के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधाएं अनुकूल नहीं थी। इसलिए बड़ी कंपनियां मेट्रो शहरों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर बिजनेस विस्तार के मौके देख रही थी। लेकिन उसी समय चेन्नै से अपना छोटा आइसक्रीम बिजनेस शुरू कर चंद्रमोगन की रणनीति वहां स्थापित बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा की बजाय छोटे शहरों में बिजनेस के नये मौके ढ़ूंढ़ने की रही। प्रॉडक्ट की क्वालिटी को बेहतर रखने की चंद्रमोगन की रणनीति ने उसे रॉ मेटेरियल की सीधे खरीद के लिए मजबूर किया और यहीं से इस आइसक्रीम कंपनी की डेयरी कंपनी में तब्दील होने की यात्रा शुरू होती है। असल में उस समय उत्तर भारत की बड़ी आइसक्रीम कंपनियों ने यह बैकवर्ड इंटीग्रेशन नहीं किया। सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल दूध के लिए वेंडरों के भरोसे रही। जिसकी गुणवत्ता से अक्सर इन कंपनियों को समझौता करना पड़ता था और स्किम्ड मिल्क पाउडर से लेकर व्हाइट बटर का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ता था। चंद्रमोगन ने यह समझौता नहीं किया। बेहतर गुणवत्ता के रॉ मैटेरियल के चलते ही हैटसन आइसक्रीम से डेयरी कंपनी में तब्दील हो गई। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ इस यात्रा में कई मोड़ आये और झटके भी आये। एक ऐसा मौका भी आया जब देश के आइसक्रीम बिजनेस को हिंदुस्तान लीवर एक एक करके अधिग्रहित कर रही थी और उस समय चंद्रमोगन को भी आइसक्रीम बिजनेस हिंदुस्तान लीवर को बेचने की सलाह दी गई। उस पर उनका जवाब था कि शुरुआती 13 हजार रुपये के निवेश के बकरार रहने तक वह उम्मीद नहीं छोड़ेंगे, जो बिजनेस में उनके भरोसे को दर्शाता है। हैटसन लगातार आगे बढ़ रही थी। इसका मूलमंत्र जहां उत्पाद की बेहतर गुणवत्ता था वहीं उपभोक्ताओं को अपने साथ बांधे रखने के लिए नये उत्पाद और प्रीमियम प्रॉडक्ट्स का लगातार कंपनी द्वारा बाजार में उतारा जाना इसका दूसरा पहलू था। कंपनी की मार्केटिंग रणनीति में बड़े कमीशन एजेंट्स की बजाय सीधे सेल और आइसक्रीम पार्लर स्थापित करने जैसे फैसले थे। विज्ञापनों और प्रोमोशन को कंपनी ने अपनी मार्केटिंग रणनीति का अहम हिस्सा बनाये रखा। इसके लिए राइस एंड राइस नाम की बड़ी अमेरिकी ब्रांड कंसल्टेंसी कंपनी की सेवाओं के लिए पैसा खर्च करने में चंद्रमोगन ने कोई झिझक नहीं की। हैटसन ने आरोक्य मिल्क, अरूण आइसक्रीम, हैटसन कर्ड, हैटसन घी, हैटसन पनीर, हैटसन डेयरी व्हाटनर, इबाको और ओयालो जैसे ब्रांड विकसित किये, जिनमें कई ग्लोबल ब्रांड्स का भाव देते हैं।

चंद्रमोगन तमिलनाडु के विरूदनगर जिले की छोटी जगह थिरूथंगल से आते हैं। यह इलाका देश में सबसे कम बारिश वाले इलाकों में से है। जाहिर है कि वहां खेती करना बहुत आसान काम नहीं है। लेकिन इस जिले की मिट्टी में कुछ तो खास है कि उसने के. कामराज जैसा राजनेता दिया जिसने अपनी विलक्षण प्रतिभा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर एक कुशल प्रशासक और रणनीतिकार की छवि बनाई। कांग्रेस में कामराज प्लान को राजनीति की दुनिया में कौन नहीं जानता है। साथ ही इस जिले में करीब 15 साल पहले मैने अपनी एक यात्रा के दौरान खुद अनुभव किया कि वहां कुछ तो खास है। इस कम बारिश वाले इलाके में सिवकाशी है जो प्रिटिंग, मैचबाक्स और पटाखों की देश की औद्योगिक राजधानी है और  देश का एक बड़ा बिजनेस सेंटर है। बहुत संभव है कि इन सबसे चंद्रमोगन को प्रेरणा मिली हो जिसके चलते यहां से आने वाला सामान्य किसान परिवार का बेटा एक कामयाब बिजनेसमैन के सफर तक पहुंचा।

इस समय हैटसन का डेयरी बिजनेस उसके आइसक्रीम के मूल बिजनेस से बड़ा है। यह आइसक्रीम कंपनी से डेयरी कंपनी बनी। वहीं देश की सबसे बड़ी आइसक्रीम कारोबारी सहकारी संस्था अमूल दूध के बिजनेस का लंबा सफर तय करने के बाद आइक्रीम बिजनेस में उतरी थी। देश में दूध और डेयरी कारोबार में अमूल को ही सबसे बड़ा ब्रांड माना जाता है। वह है भी, क्योंकि यह ब्रांड 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करता है। दूध बिजनेस में उतरी हैटसन के आरोक्य दूध ब्रांड ने अपनी गुणवत्ता के चलते तमिलनाडु में एक समय के कोआपरेटिव डेयरी फेडरेशन के लगभग एकाधिकार वाले मार्केट में जगह बनाई और तमिलनाडु में मार्केट लीडर के साथ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल से लेकर महाराष्ट्र तक अपने मार्केट का विस्तार किया। यह सब संभव हुआ किसानों के साथ सीधे साझेदारी के जरिये। कंपनी ने जिस तरह से किसानों से सीधे दूध की खऱीद का दायरा बढ़ाया उसने कंपनी का ट्रांसफोर्मेशन किया।

चंद्रमोगन ने टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग को हैटसन को एक बड़ी कंपनी में तब्दील करने के बड़े औजारों के रूप में इस्तेमाल किया। इसके लिए आइसक्रीम पार्लरों में बेहतर फ्रीजर्स हों, आइसक्रीम को ट्रांसपोर्ट करने के लिए फ्रीजर्स का इस्तेमाल हो या उत्पादन के लिए बेहतर मशीनों का इस्तेमाल करना हो। चंद्रमोगन ने अमेरिकी संस्थान एमआईटी से इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने वाले सोरिन ग्रामा और उसके सहयोगी सैम व्हाइट की दूध के कलेक्शन सेंटरों पर स्टोर्ड पावर से चिलर के जरिये दूध की कूलिंग की तकनीक की फंडिंग और उसका कमर्शियल उपयोग किया। हैटसन एग्रो को दूध की आपूर्ति करने वाले किसानों के दुधारू पशुओं की प्रजाति के संवंर्धन और उनके डाटा के सेंट्रलाइजेशन जैसे कदम दूसरी कंपनियों के लिए उदाहरण की तरह हैं। साथ ही तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर अधिक प्रोटीन वाले चारे की किस्म विकसित कराने में सहयोग देकर किसानों तक उसे पहुंचाया। हैटसन की इस यात्रा में कई जगह चंद्रमोगन देश में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कूरियन की तरह सोचने वाले व्यक्ति की तरह दिखते हैं जो हर मसले की बारिकियों पर ध्यान देते हैं और किसी तरह का दिखावा नहीं करते। साथ ही गुणवत्ता और कारोबार की जरूरत के मसलों पर कोई समझौता भी नहीं करते। इस बीच जैरी कैन से लेकर दूध की अल्यूमीनियम कैन के डीलर जैसे अतिरिक्त कमाई वाले बिजनेस में भी उन्होंने हाथ आजमाया। उन्होंने कोलकाता में दूध के मार्केट में उतरने और उसके लिए वहां प्लांट शुरू करने, मिल्कशेक के लिए फ्लेवर्ड कंसंट्रेट बनाने जैसे बिजनेस फैसलों को पलटा तो किसानों के साथ मिल्क कलेक्शन सेंटर पर रिटेल बिजनेस शुरू करने के फैसले को बदलते हुए पशुचारा जैसे बिजनेस को शुरू कर समय रहते भूल सुधार कर घाटे को कम किया। हैटसन की यह कहानी सीख देती है कि अगर आप अपने कारोबार से सीधे जुड़े काम में ही आगे बढ़ेंगे तो कामयाबी मिलती जाएगी। जमीनी हकीकत को समझकर फैसले करने और उनमें समय से सुधार करने का उन्हें फायदा हुआ।

हरीश दामोदरन की इस किसाब को मैं उनकी पहली किताब ‘इंडियाज न्यू कैपिटलिस्ट’ के विस्तार के रूप में देखता हूं। उन्होंने बिजनेस की दुनिया को किताब में समेटने की खास शैली अपनाई है जो विषय की गहराई को सामने लाती है। पहली किताब में हरीश दामोदरन ने कृषि की पृष्ठभूमि से आये और वहां से आई पूंजी का उपयोग कर बिजनेस एम्पायर खड़ा करने वाली शख्सियतों के सफर और उनके कारोबार की यात्रा को सामने रखा गया था। ब्रोक टू ब्रेकथ्रू में भी एक गांव और किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति किस तरह से औपचारिक बिजनेस एजुकेशन के बिना कैसे देश का एक सफल बिजनेसमैन बना यह उसका चित्रण तो है ही साथ ही दूध और आइसक्रीम जैसे जटिल बिजनेस को किस तरह से खड़ा किया गया यह उसकी केस स्टडी भी है।