प्रयोगशाला से खेत तक की अधूरी यात्रा: क्यों पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे कृषि विज्ञान केंद्र?

कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच वह महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिन्होंने उत्पादकता, आय और तकनीक अपनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन सीमित बजट, रिक्त पदों और कमजोर आधारभूत ढांचे के कारण उनकी क्षमता पूरी तरह सामने नहीं आ पा रही। लेख में केवीके में व्यापक संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

भारत विश्व के अग्रणी कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। दूध, दलहन और जूट के उत्पादन में भारत पहले स्थान पर है, जबकि चावल, गेहूं, गन्ना, मूंगफली, कपास, फल और सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। वर्ष 1947 से 2020 के बीच देश में खाद्यान्न उत्पादन छह गुना, बागवानी उत्पादन दस गुना, दूध उत्पादन नौ गुना और मत्स्य उत्पादन तेरह गुना बढ़ा है।

हालांकि कृषि के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और समृद्ध प्राकृतिक संसाधन होने के बाद भी भारत में कृषि उत्पादकता और खेती से किसानों की आय अनेक देशों की तुलना में कम है। आमतौर पर इसका कारण जोत का छोटा आकार बताया जाता है। वास्तविकता यह है कि उत्पादकता का सीधा संबंध जोत के आकार से नहीं, बल्कि कृषि में तकनीक और पूंजी निवेश से होता है। जिस भूमि पर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और पर्याप्त निवेश होगा, वहां उत्पादकता भी अधिक होगी। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में औसत जोत भारत के बराबर या उससे छोटी होने के बावजूद कृषि उत्पादकता अधिक है। इसलिए कृषि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में पूंजी और तकनीकी निवेश बढ़ाना अनिवार्य है।

सरकार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं के माध्यम से कृषि में पूंजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन कृषि उत्पादकता कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अधिकांश किसान अब भी आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने में पीछे हैं और पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि देश में नई कृषि तकनीकों का विकास नहीं हो रहा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत देशभर में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के 100 से अधिक अनुसंधान संस्थान कार्यरत हैं। ये संस्थान हर वर्ष सैकड़ों उन्नत फसल किस्में और अनेक नई कृषि तकनीकें विकसित करते हैं। लेकिन कृषि प्रसार (एक्सटेंशन) प्रणाली के कमजोर और बिखरे स्वरूप के कारण इन तकनीकों का केवल सीमित हिस्सा प्रयोगशाला से खेत तक पहुंच पाता है।

कृषि तकनीकों को खेत तक पहुंचाने के लिए समय-समय पर कई प्रयोग किए गए, लेकिन वर्ष 1974 में पुडुचेरी में पहले कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) की स्थापना ने कृषि प्रसार के क्षेत्र में नई क्रांति की शुरुआत की। इन केंद्रों की सफलता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त 2005 को लाल किले से देश के प्रत्येक ग्रामीण जिले में 2007 तक एक कृषि विज्ञान केंद्र स्थापित करने की घोषणा की। इसके बाद देश के हर ग्रामीण जिले तथा कुछ बड़े जिलों में दो-दो कृषि विज्ञान केंद्र स्थापित किए गए।

वर्तमान में देशभर में 731 कृषि विज्ञान केंद्र बहु-विषयी संस्थानों के रूप में कार्य कर रहे हैं। इनका मुख्य उद्देश्य प्रयोगशाला से खेत तक तकनीक पहुंचाना है। ये केंद्र नई तकनीकों का परीक्षण एवं प्रदर्शन करते हैं, किसानों, महिला किसानों और कृषि प्रसार कर्मियों को प्रशिक्षण देते हैं, ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं तथा गुणवत्तापूर्ण बीज, पौध सामग्री और कृषि सलाह उपलब्ध कराते हैं।

प्राकृतिक एवं जैविक खेती, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), कृषि ड्रोन, दलहन-तिलहन उत्पादन बढ़ाने, फसल अवशेष प्रबंधन और जलवायु अनुकूल कृषि जैसी राष्ट्रीय पहलों के माध्यम से कृषि विज्ञान केंद्र किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 29 मई से 12 जून 2025 तक चले 'विकसित कृषि संकल्प अभियान' के दौरान कृषि विज्ञान केंद्रों ने देश के 728 जिलों के लगभग 1.35 करोड़ किसानों के साथ वैज्ञानिक संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि तकनीकी प्रबंधन अभिकरण (एटीएमए) और राज्य सरकारें भी कृषि प्रसार कार्य करती हैं, लेकिन वे भी काफी हद तक कृषि विज्ञान केंद्रों पर निर्भर हैं।

नीति आयोग के वर्ष 2018 के अध्ययन के अनुसार, कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा सुझाई गई तकनीकों को करीब 40 प्रतिशत किसान तुरंत अपनाते हैं, जबकि 25 प्रतिशत किसान अगले वर्ष इन्हें लागू करते हैं। इन तकनीकों को अपनाने से किसानों की उत्पादकता में लगभग 42 प्रतिशत, आय में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और कड़ी मेहनत में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं, कृषि विज्ञान केंद्रों से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले लगभग 25 प्रतिशत युवा स्वयं का उद्यम शुरू करते हैं। इन केंद्रों के हस्तक्षेप से लगभग 80 प्रतिशत किसानों ने अपनी खेती की पद्धतियों में बदलाव किया है। इसमें फसल विविधीकरण, बुवाई तकनीक, उर्वरक एवं कीटनाशकों का संतुलित उपयोग, कृषि यंत्रों का प्रयोग और जल का बेहतर प्रबंधन शामिल है।

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) द्वारा वर्ष 2019 में किए गए एक अन्य अध्ययन के अनुसार, कृषि विज्ञान केंद्रों में किए गए निवेश का लाभ-लागत अनुपात लगभग 12 है। यानी इन केंद्रों पर खर्च किया गया प्रत्येक एक रुपया लगभग 12 रुपये का प्रतिफल देता है। इससे इन केंद्रों की आर्थिक उपयोगिता स्पष्ट होती है।

इन उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद कृषि विज्ञान केंद्र कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। कृषि बजट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा इन केंद्रों पर खर्च होता है। प्रत्येक केंद्र में केवल 16 स्वीकृत पद हैं, जबकि संसदीय समिति (2025) की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं। समय पर धनराशि जारी न होना तथा विशेषज्ञों के वेतन, पदोन्नति और पेंशन से जुड़ी अनिश्चितताएं कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित कर रही हैं।

हालांकि कृषि विज्ञान केंद्रों को शत-प्रतिशत वित्तीय सहायता आईसीएआर से मिलती है, लेकिन उनका प्रशासनिक नियंत्रण आईसीएआर संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों और राज्य सरकारों जैसी विभिन्न संस्थाओं के पास होने के कारण वित्तीय और प्रशासनिक जटिलताएं पैदा होती हैं। इसके अलावा परीक्षण प्रयोगशालाओं, प्रशिक्षण हॉल और किसान छात्रावास जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी भी प्रयोगशाला से खेत तक तकनीक पहुंचाने की प्रक्रिया को कमजोर कर रही है।

बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, घटती कृषि योग्य भूमि और सीमित जल संसाधनों जैसी चुनौतियों के बीच कृषि विज्ञान केंद्र किसानों की आय सुरक्षा और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि कृषि विज्ञान केंद्रों को 'प्लान' से 'नॉन-प्लान' बजट में स्थानांतरित कर एकीकृत प्रशासनिक ढांचे के तहत लाया जाए। साथ ही रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए, कर्मचारियों के वेतन, पदोन्नति और पेंशन का समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाए, पर्याप्त बजट और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया जाए तथा एटीएमए का कृषि विज्ञान केंद्रों में विलय किया जाए।

यदि इन्हें जिला अस्पतालों की तर्ज पर 'कृषि विज्ञान एवं ग्रामीण उद्यमिता केंद्र' के रूप में विकसित किया जाए, तो किसानों को एक ही स्थान पर ज्ञान, तकनीक, प्रशिक्षण, कृषि इनपुट और परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे कृषि विज्ञान केंद्र वास्तव में प्रयोगशाला से खेत तक तकनीक पहुंचाने के अपने मूल उद्देश्य को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सकेंगे।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक हैं और कृषि विज्ञान केंद्र, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश से जुड़े हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)