कोविड वैक्सीन और दवाइयों पर ट्रिप्स छूट के भारत के प्रस्ताव पर अनिश्चितता बरकरार

ट्रिप्स छूट प्रस्ताव को लेकर विश्व व्यापार सगठन सदस्यों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। ट्रिप्स काउंसिल की औपचारिक बैठक में आठ- नौ सदस्यों ने निर्णय लिया है कि वह छूट प्रस्ताव को लेकर मसौदा आधारित बातचीत की शुरुआत करेंगे। इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय जनरल काउंसिल की बैठक में 21-22 जुलाई को लिया जा सकता है।इस प्रस्ताव को चीन, अमेरिका और रूस जैसे देशों का समर्थन जरूर मिला है लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि इस प्रस्ताव पर फैसला कितना जल्दी आ सकता है

 जब से विश्व व्यापार संगठन के (डब्ल्यूटीओ) अंतर्गत बौद्धिक संपदा के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) पर समझौते को अपनाया गया है, तब से विश्व भर  मे लोगों को दवाइयां सस्ती कीमतों पर न मिल पाना पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का सबब बना हुआ है । ट्रिप्स समझौता वह चार्टर है जो बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) को और मजबूती प्रदान करता है। पिछले 25 सालों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जहां बौद्धिक संपदा धारकों ने अपने पेटेंट या ट्रेड मार्क अधिकार वाले औषधीय उत्पादों के लिए उपयोगकर्ताओं से अधिक मुनाफा लेकर अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग किया। एचआईवी / एड्स महामारी के दौरान बड़ी-बड़ी दवा कंपनियों ने काफी  ज्यादा दाम वसूले थे । यह उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि कैसे दवा कंपनियों ने दामों के मामले में मनमानी की है। दवा कंपनियों की इस मनमानी पर रोक लगाने के लिए भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व में अन्य विकासशील देशों ने एक प्रस्ताव रखते हुए कहा है कि ट्रिप्स समझौते में अतिरिक्त लचीलापन लाया जाना चाहिए ताकि विश्व व्यापार संगठन के  सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने में सक्षम बनाया जा सके। डब्ल्यूटीओ के 2001 में दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में अपनाए जाने से पहले, ट्रिप्स समझौते और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रस्ताव को 60 विकासशील देशों द्वारा समर्थित किया गया था, जिनमें 41 अफ्रीकी देश शामिल थे।

कोविड -19 महामारी के दौरान भी भारत और दक्षिण अफ्रीका से कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया मिली। दोनों देशों ने अक्टूबर 2020 में एक संयुक्त प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाद में 61 सदस्यों द्वारा सह-प्रायोजित किया गया। इनमें अफ्रीकी समूह और अल्प विकसित देश (लीस्ट डवलप्ड कंट्रीज यानी एलडीसी) समूह शामिल हैं और इसे विश्व व्यापार संगठन के दो-तिहाई  से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। ट्रिप्स काउंसिल के समक्ष पेश किए गए इस प्रस्ताव में निदान, चिकित्सा विज्ञान, टीका, चिकित्सा उपकरण, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और अन्य स्वास्थ्य संबंधित उत्पादों , उपकरणों और उनके काम करने के तरीके और उपकरणों के निर्माण के साधन, संबंधित  ट्रिप्स समझौते के कुछ नियमो मे छूट(वेवर) की मांग की गई है ताकि कोरोना महामारी से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके । 

विश्व व्यापार संगठन को स्थापित करने वाले मरक्काश समझौते के अनुच्छेद नौ के प्रावधानों का इस्तेमाल कर प्रस्ताव में विश्व व्यापार संगठन की जनरल काउंसिल से यह अनुरोध किया है कि अगले तीन साल तक आईपीआर के चारों प्रारूपों को लागू करने और उपयोग करने पर रोक लगा दी जाए। प्रस्तावों में जिन चार प्रारूपों का जिक्र किया गया है, वह चारों कोरोना की रोकथाम या उपचार के लिए कॉपीराइट और उनसे  संबंधित अधिकार, औद्योगिक डिजाइन, पेटेंट, और ट्रेड सीक्रेट हैं। विश्व व्यापार संगठन समझौते के नियमों मे छूट दिया जाना कोई नई बात नहीं है। 1995 से लेकर अब तक कुल 9 बार छूट दी जा चुकी है जिनमें से तीन छूट ट्रिप्स समझौते में निर्धारित बाध्यताओं से संबंधित थी। 

आईपीआर छूट  प्रस्ताव का महत्व

यहां एक महत्वपूर्ण और स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर ट्रिप्स समझौते में छूट की मांग करते हुए इस प्रस्ताव से क्या अतिरिक्त लाभ हैं जब सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं पूरा करने के लिए पहले से ही ट्रिप्स समझौते में लचीलापन मौजूद है? पहला बड़ा लाभ यह है कि जहां मौजूदा लचीलापन दवाओं पर पेटेंट अधिकारों के प्रयोग से उत्पन्न होने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं को संबोधित करता है वहीं इस छूट प्रस्ताव में निदान, टीके, सहित सभी चिकित्सा उत्पाद शामिल हैं जिनकी मदद से वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और लोगों को इस वायरस से मुक्ति मिल सकती है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह प्रस्ताव विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के आईपीआर संबंधी नियमों में छूट की मांग नहीं करता है। कोरना महामारी का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए कई चिकित्सा उत्पाद अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। इनमें से कई उत्पाद, ऐसे हैं  जिनके पार्ट्स और कंपोनेंट प्रोप्राइटरी उत्पाद हैं यानी यह पेटेंट या ट्रेड मार्क अधिकारों के तहत आते हैं जो आईपीआर के विभिन्न पारूपों जैसे , कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, औद्योगिक डिजाइन और पेटेंट,आदि  के माध्यम से सुरक्षित हैं। आईपीआर के यह प्रारूप इन उत्पादों के बड़े पैमाने पर उत्पादन मे रुकावट पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए, डायग्नोस्टिक प्लेटफॉर्म के सॉफ्टवेयर सोर्स कोड पर कॉपीराइट उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं जिससे मरीजो को अत्यधिक दाम देने पडेंगे । अगर औद्योगिक डिजाइनों का उपयोग कर चिकित्सा उत्पादों या उनके कंपोनेंट को सुरक्षित किया जाता है तब भी कुछ ऐसी ही परेशानियां खडी  हो सकती हैं।

विश्व की बड़ी दवा कंपनियों के जोर देने के बाद ट्रेड सीक्रेट कानून प्रमुखता से लागू हुए। दवा कंपनियों का कहना था कि इस कानून की मदद से वह मार्केटिंग अधिकार मिलने के पहले पहले होने वाले क्लीनीकल ट्रायल परीक्षण के डेटा को सुरक्षित कर सकेंगे। कंपनियों ने ऐसे कानूनों को विश्व व्यापार संगठन के सभी सदस्य देशों में लागू कराने की मांग इसलिए की गई है ताकि नियामक एजेंसियां उनके डेटा का उपयोग करके उनकी  दवाओं के जेनरिक वर्जन की मंजूरी न दे सके। ट्रिप्स समझौता ऐसा करने के लिए सदस्य देश को बाध्य नहीं करता है बल्कि  यह समझौता केवल नियामक एजेंसियों द्वारा अनुचित व्यावसायिक उपयोग से क्लिनीकल ट्रायल के डेटा ​​की सुरक्षा को अनिवार्य करता है। ट्रेड सीक्रेट नियमों में अगर छूट मिलती है तो नियामक एजेंसियां इस डेटा का प्रयोग कर जनहित में कर सकती हैं और कम कीमत वाली जेनरिक दवाइयां जल्द से जल्द मार्केट में लाई जा सकती हैं ।

कोरोना के टीकों के उत्पादन की प्रक्रिया ने ऐसे कई उदाहरण सामने लाए हैं जहां कंपनियों ने अपने टीके की सुरक्षा और प्रभावकारिता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जनता के सामने सार्वजनिक करने की इजाजत नही दी। नेचर पत्रिका के हाल ही के एक संस्करण में एक संपादकीय ने खुलासा किया है कि दुनिया में बहुत बडी संख्या में लोगों ने कहा है कि वह अपना टीकाकरण नहीं कराएंगे जो काफी चिंताजनक है । इसका अर्थ यह है कि इन लोगों पर कोरोना का खतरा लगातार बना रहेगा जिससे इस महामारी से हमें जल्द छुटकारा मिल पाना काफी मुश्किल होगा लोगों द्वारा टीके को न लगाने के पीछे उनकी कई चिंताए हैं जिनका कारण है टीकों को दी गई वैधानिक मंजूरी में तेजी, दवा उद्योग पर संदेह और वैक्सीन पर फैलाए जा रहे अनेक भ्रम। (https://www.nature.com/articles/d41586-020-02738-y)। अगर कोरोना संबंधी उपकरण और उत्पादों के प्रभाविकता की जानकारी  को ट्रेड सीक्रेट में शामिल करने से इंकार कर दिया जाए तो लोगों की चिंताएं दूर की जा सकती हैं।

कोरोना महामारी में मेडिकल उत्पादों की मांग बहुत तेजी से बढी है जो आने वाले समय मे भी कम होती नही दिख रही है। लेकिन कई देशों में मांग के मुकाबले में आपूर्ति काफी कम रही है। इसलिए इन मेडिकल उपकरणों को ग्लोबल पब्लिक गुड्स की तरह देखा जाना जरूरी है जिनके उत्पादन के लिए नीजी और सार्वजनिक उपक्रम दोनों को साधन दिये जाने चाहिए। हालांकि कई विकासशील देशो में पर्याप्त सरकारी संसाधन और मेडिकल उत्पादों के उत्पादन को सुविधाजनक बनाने और उनकी उप्लब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रौद्योगिकी दोनों ही मौजूद नही हैं। हमेशा की तरह आईपीआर नियम टेक्नोलॉजी और आवश्यक जानकारी के हस्तांतरण में बाधा बनी हुई है।

भारत जैसे देशों को कोरोना के लिए रेमेडिसविर और टोसीलिज़ुमैब जैसी दवाइयां और वैक्सीन के उत्पादन के लिए आवश्यक तकनीक तक पहुंचने मे बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ कंपनियों को रेमेडिसविर और टोसीलिज़ुमैब का उत्पादन करने के लिए प्रवर्तक कंपनी गिलियड साइंसेज द्वारा स्वैच्छिक लाइसेंस दिया गया लेकिन यहां दो बडी परेशानियां है। पहला यह कि जिन दामों पर यह दवाइयां भारत में उप्लब्ध हैं  व काफी महंगे दाम हैं। दूसरा यह कि इन दवाइयों का निर्यात दूसरे देशों में नही किया जा सकता है। ट्रिप्स के पेटेंट प्रावधानों मे छूट मिलने से करोना की दवाइयां सस्ती कीमतों पर उप्लब्ध हो सकेंगी क्योंकि पेटेंट एकाधिकार खत्म होने से बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। 

ट्रिप्स छूट प्रस्ताव का भविष्य

जैसा कि उपर बताया गया है कि अभी तक इस छूट प्रस्ताव को विश्व व्यापार संगठन के 61 सदस्यों का समर्थन मिला है। हालांकि  कुछ प्रभावशाली देशों ने उनकी दवा कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया है। इस छूट प्रस्ताव का विरोध करने वाले देशों में  आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, यूरोपीय संघ, जापान, नॉर्वे, कोरिया , सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, बिट्रेन और अमेरिका शामिल हैं। मई की शुरुआत में अमेरिका ने छूट के प्रस्ताव को अपना समर्थन दिया है और " समाधान खोजने के लिए सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए मसौदे पर आधारित वार्ता " के लिए भी तैयार हो गया। लेकिन बाइडेन-हैरिस प्रशासन का समर्थन केवल को केवल वैक्सीन के लिए आईपीआर में छूट देने के लिए है। प्रस्ताव रखने वाले देशों द्वारा दवाओं और अन्य चिकित्सा उत्पादों के लिए उसका समर्थन नहीं है।

हालांकि कोरोना टीकों पर आईपीआर में छूट को लेकर अमेरिका से समर्थन मिलने के बाद छूट प्रस्ताव के भविष्य को लेकर आशावादी माहौल जरूर बना है लेकिन इसके बावजूद परिस्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। विरोध कर रहे देशों में से आस्ट्रेलिया को छोड़कर किसी भी अन्य देश ने  इस प्रस्ताव पर अपना मन नहीं बदला है। वहीं कोरोना वैक्सीन के मुख्य उत्पादक देशों में शामिल चीन और रूस ने इस छूट प्रस्ताव का समर्थन किया है। चीन ने विश्व व्यापार संगठन के सभी पक्षों से विचार- विमर्श में भाग लेने की इच्छा जताते हुए इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। चीन का कहना है कि वह दृढ़ता से कोरोना वैक्सीन को एक “पब्लिक गुड” बनाने के दिशा में प्रयास करता रहेगा और लोगों तक कम दाम मे वैक्सीन उप्लब्ध कराने के लिए अपना योगदान देता रहेगा ।  (https://www.fmprc.gov.cn/ce/cgmb/eng/fyrth/t1873782.htm)। राष्ट्रपति पुतिन का कहना है, “ कोरोना वैक्सीन से पेटेंट सुरक्षा को पूरी तरह से हटाने का जो विचार है वह वाकई में ध्यान देने योग्य है और रूस निश्चित रूप से इस तरह के दृष्टिकोण का समर्थन करेगा"। (https://newsaf.cgtn.com/news/2021-05-07/Putin-backs-russia-waiving-patents-on-its-COVID-वैक्सीन-103m35Qy98s/index.html)

पिछले हफ्ते छूट प्रस्ताव को लेकर विश्व व्यापार संगठन सदस्यों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। ट्रिप्स काउंसिल की औपचारिक बैठक में आठ- नौ सदस्यों ने निर्णय लिया कि वह छूट प्रस्ताव को लेकर मसौदा आधारित बातचीत की शुरुआत करेंगे। इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय जनरल काउंसिल की बैठक में 21-22 जुलाई को लिया जा सकता है।इस प्रस्ताव को चीन, अमेरिका और रूस जैसे देशों का समर्थन जरूर मिला है लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि इस प्रस्ताव पर फैसला कितना जल्दी आ सकता है। मसौदा आधारित बातचीत की प्रक्रिया फैसले में होने वाले देरी का एक मुख्य कारण बन सकती है। पहले भी इस तरह की बातचीत में काफी लंबा वक्त लगा था जैसे कि एच.आई.वी / एड्स महामारी के दौरान हुई दोहा डिक्लरेशन को लेकर ट्रिप्स और लोक सवास्थय पर हुई चर्चा।हालांकि, मौजूदा परिस्थिति कुछ अलग है क्योंकि अभी हमारे पास बर्बाद करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है। पूरे विश्व समुदाय को इस वक्त उचित दामों पर वैक्सीन और दवाईयों की सख्त जरूरत है क्योंकि तभी हम कोरोना महामारी से हकीकत में निजात पा सकते हैं।

अब तक तो विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी यह बात समझ आ चुकी है कि जब तक सब सुरक्षित नहीं हो जाते तब तक असलियत में कोई भी सुरक्षित नहीं है । इस प्रस्ताव पर जल्द से जल्द निर्णय तभी लिया जा सकता है जब इस परिस्थिति में समय की नाजुकता हो समझा जाए । सदस्यों द्वारा संचालित किसी भी बहुपक्षीय प्रणाली में विभिन्न मानदंडो की स्थापना के लिए प्रभावी गठबंधन अत्यंत आवश्यक है। विकसशील देश इसे बखूबी समझते हैं क्योंकि पहले भी इन्हें इससे फायदा हुआ है। यह भी एक बड़ा सत्य है कि ऐसे गठबंधनों को एक मजबूत नेतृत्व की आवश्यक्ता होती है, जैसा नेतृत्व भारत और दक्षिण अफ्रीका से विकसशील देशों को मिला। इसलिए इन दोनों देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस नाजुक वक्त में उनके उद्देश्य को जल्द से जल्द मंजिल मिले ताकि मानवता का कल्याण हो सके।

( डॉ. बिस्वजीत धर, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में  प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)