हार्वेस्टिंग के बाद नुकसान और प्रसंस्करण सुविधाओं तक सीमित पहुंच भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था के विकास में बाधक

दुनिया के सबसे बड़े खाद्य उत्पादकों में शामिल होने के बावजूद, भारत अपनी कृषि उपज का बड़ा हिस्सा हार्वेस्टिंग के बाद अपर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर और सीमित प्रसंस्करण सुविधाओं के कारण गंवा रहा है। विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण के विस्तार, मार्केट लिंकेज को मजबूत करने और वित्तीय पहुंच में सुधार से नुकसान कम हो सकता है, किसानों की आय बढ़ सकती है तथा टिकाऊ ग्रामीण आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।

एआई इमेज

भारत इतने बड़े पैमाने पर खाद्य उत्पादन करता है, जिस पर दुनिया को ईर्ष्या होनी चाहिए। फिर भी इस उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा कभी ऐसी अवस्था में उपभोक्ताओं की थाली तक नहीं पहुंच पाता, जिसमें उसका मूल्य, पोषण या किसान की मेहनत और सम्मान सुरक्षित रह सके। फसल की हार्वेस्टिंग के बाद होने वाले नुकसान और प्रसंस्करण सुविधाओं की सीमित पहुंच कोई छिपी बात नहीं हैं। ये ग्रामीण आय को प्रतिदिन प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि अच्छी फसल का मौसम भी एक किसान परिवार को आर्थिक जोखिम से नहीं बचा पाता, और यही वह संरचनात्मक कमी है जो देश को अपनी कृषि उपज को उच्च मूल्य वाले उत्पादों और स्थायी समृद्धि में बदलने से रोकती है।

हाल के राष्ट्रीय आकलनों से पता चलता है कि हार्वेस्टिंग के बाद होने वाले नुकसान फसल और क्षेत्र के अनुसार काफी भिन्न हैं। जल्दी खराब होने वाले और अक्सर अनुचित ढंग से संभाले जाने वाले फल एवं सब्जियां सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। कुछ फसलों की बर्बादी तो 5 से 16 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। इस सालाना नुकसान का मूल्य 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है। हालांकि, इस नुकसान के बावजूद खाद्य असुरक्षा में कमी आई है और कुपोषण की दर 2010 के 20 प्रतिशत से घटकर 14 प्रतिशत रह गई है।

इस समस्या की मानवीय कीमत बहुत गहरी है। एक किसान जो महीनों तक अपनी फसल की देखभाल करता है, उसके पास उसे बेचने के लिए बहुत सीमित समय होता है। यदि आसपास प्रसंस्करण इकाई या कोल्ड स्टोरेज उपलब्ध नहीं है, तो उसके पास जल्दी बेचने के अलावा कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं बचता, चाहे उस दिन बाजार जो भी कीमत दे रहा हो। यह मजबूरी में की गई बिक्री है। लेकिन यह ऐसी समस्या नहीं है जिसे एक सब्सिडी से हल किया जा सके। यह उस व्यवस्था का परिणाम है जिसमें प्रसंस्करण क्षमता और क्वालिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर उन क्षेत्रों से दूर स्थापित किए जाते हैं जहां वास्तव में खाद्य उत्पादन होता है।

नीतिगत स्तर पर इस दिशा में प्रयास किए गए हैं। पिछले एक दशक में कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउस और प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयों के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गईं और उनका विस्तार किया गया, जिन्हें सार्वजनिक निवेश और वित्तीय पहल का समर्थन भी मिला। इसके बावजूद, कई कृषि क्लस्टरों में प्रसंस्करण और क्वालिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच सीमित है। परिणामस्वरूप, कृषि उपज का एक बड़ा हिस्सा मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ते समय मूल्य संवर्धन और बाजार विविधीकरण के पर्याप्त अवसरों से वंचित रह जाता है।

इस अंतर को पाटने का अर्थ है प्रसंस्करण को एक ऐसी गतिविधि के रूप में पुनः परिभाषित करना, जो दूर-दराज के बड़े केंद्रों में सीमित न होकर उत्पादन क्षेत्रों के निकट स्थापित हो। गांव या कृषि क्लस्टर स्तर पर स्थापित एक छोटी इकाई, जो उपज की छंटाई, ग्रेडिंग, सफाई, प्रसंस्करण और संरक्षण कर सके, कृषि की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। इससे न केवल नुकसान कम होता है, बल्कि खेत के निकट ही मूल्य संवर्धन के अवसर भी पैदा होते हैं, जिससे कृषि उपज कच्चे कमोडिटी बाजारों से निकलकर उच्च मूल्य वाली आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन सकती है।

ऐसी व्यवस्था किसानों को अपनी उपज बेचने का सही समय चुनने, बेहतर खरीदारों तक पहुंचने और उन आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ने का अवसर देती है जो गुणवत्ता और निरंतरता के लिए बेहतर मूल्य चुकाती हैं। प्रसंस्करण सुविधाएं नजदीक उपलब्ध होने पर नुकसान में 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है और किसान मजबूरी में बिक्री से बचकर 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक आय अर्जित कर सकते हैं। बेहतर कृषि प्रबंधन और फसल की सावधानीपूर्वक संभाल में निवेश भी बढ़ता है, क्योंकि उसका लाभ स्पष्ट और शीघ्र दिखाई देता है।

वित्त तक पहुंच निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल पूंजी पर्याप्त नहीं होती। छोटे प्रसंस्करण उद्यमों और किसान समूहों को संचालन संबंधी क्षमता, मार्केट लिंकेज और स्थिर मांग की भी आवश्यकता होती है ताकि वे टिकाऊ व्यवसाय विकसित कर सकें। वे मॉडल सबसे अधिक सफल होते हैं जो वित्तीय सहायता को तकनीकी सहयोग और बाजार पहुंच के साथ जोड़ते हैं, जिससे प्रसंस्करण क्षमता वास्तविक आर्थिक मूल्य में परिवर्तित हो सके।

मेरे विचार में, भारत की विकास यात्रा की सबसे बड़ी कमी केवल उत्पादन बढ़ाने में नहीं, बल्कि उपज से अधिक मूल्य सृजित करने की क्षमता में है। हार्वेस्टिंग के बाद होने वाले नुकसान को कम करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी बड़ा अवसर उत्पादन क्लस्टरों के माध्यम से प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने में है। इसके लिए वित्त सुलभ हो और मार्केट लिंकेज मजबूत हो।

जब किसानों को ये सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो वे केवल अपनी उपज को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखते, बल्कि उसकी गुणवत्ता में सुधार करते हैं, बेहतर बाजारों तक पहुंच बनाते हैं। इससे उन्हें हार्वेस्टिंग के बाद मूल्य में अधिक हिस्सेदारी प्राप्त होती है। इसका लाभ कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है। इससे ग्रामीण आय में वृद्धि होती है, अधिक लचीला सप्लाई चेन और खाद्य इकोसिस्टम तैयार होता है जो बड़ी मात्रा में होने वाले उत्पादन को स्थायी समृद्धि में बदल सकता है।

(विक्की डोडानी Agrizy के सह-संस्थापक हैं।)