केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने ड्राफ्ट बीज विधेयक, 2025 (Draft Seeds Bill 2025) जारी किया है जो बीज अधिनियम, 1966 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 की जगह लेगा। भारतीय कृषि के भविष्य पर इस विधेयक के महत्व, विशेष रूप से मौजूदा बीज नियामक ढांचे पर संभावित प्रभाव को देखते हुए, देश के अग्रणी कृषि विशेषज्ञों के साथ इस पर परामर्श आवश्यक था।
प्रमुख थिंक टैंक नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) और ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) ने इंडियन सोसायटी ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग (ISGPB), इंडियन सोसायटी फॉर सीड टेक्नोलॉजी (ISST) और इंडियन सोसायटी ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (ISPGR) के साथ मिलकर 22 नवंबर, 2025 को नई दिल्ली के पूसा परिसर स्थित NASC कॉम्प्लेक्स में प्रस्तावित बीज विधेयक, 2025 पर एक विशेषज्ञ परामर्श बैठक का आयोजन किया।
यह परामर्श बैठक टीएएएस (TAAS) के चेयरमैन एवं आईएसपीजीआर (ISPGR) के प्रेसिडेंट डॉ. आर.एस. परोदा तथा एनएएएस (NAAS) के प्रेसिडेंट डॉ. हिमांशु पाठक की सह-अध्यक्षता में आयोजित की गई। विचार-विमर्श प्रस्तावित ड्राफ्ट सीड्स बिल 2025 के प्रावधानों की प्रासंगिकता, इसके दायरे और बीज क्षेत्र व भारतीय कृषि पर संभावित प्रभाव की समालोचनात्मक समीक्षा पर केंद्रित रहा।
इस मंथन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), एनएएएस, टीएएएस, आईएसजीपीबी, आईएसपीजीआर, आईएसएसटी, आईएआरआई, निजी बीज कंपनियों, बीज उद्योग संघों, किसानों और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसके बाद चयनित विशेषज्ञों के बीच गहन चर्चा की गई, जिसके आधार पर समूह की अंतिम प्रतिक्रिया का मसौदा तैयार किया गया।
हालांकि, प्रस्तावित विधेयक बीज नियमन में कुछ महत्वपूर्ण सुधार प्रस्तुत करता है, लेकिन किसानों के हितों की रक्षा तथा वैज्ञानिक प्रक्रिया सुदृढ़ करने के लिए इसके कई प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता महसूस की गई है।
1. ‘किसान’ की परिभाषा और अधिकारों की सुरक्षा
वर्तमान मसौदे में किसान की परिभाषा स्वयं खेती करने या प्रत्यक्ष निगरानी के आधार पर की गई है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि कानूनी अस्पष्टता से बचने और किसानों के बीज बचाने, उपयोग करने तथा आदान-प्रदान करने जैसे पारंपरिक अधिकारों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इस परिभाषा को पादप किस्मों एवं किसानों के अधिकार संरक्षण अधिनियम (PPV&FR Act) में दी गई परिभाषा के अनुरूप किया जाना चाहिए। इसके अलावा, स्वामित्व वाली किस्मों को अनधिकृत मार्केटिंग से बचाने के लिए “नकली बीज (Counterfeit Seed)” शब्द की स्पष्ट परिभाषा भी आवश्यक है।
2. राज्यों और किसानों की भागीदारी
केंद्रीय बीज समिति (CSC) में राज्यों की प्रतिनिधित्व संख्या को कम किए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। जहां 1966 के अधिनियम में 22 राज्यों का प्रतिनिधित्व था, वहीं नए मसौदे में इसे घटाकर केवल 5 कर दिया गया है। संतुलन बनाए रखने के लिए यह सिफारिश की गई कि प्रत्येक राज्य से एक सदस्य को शामिल किया जाए तथा किसानों के पांच रोटेटिंग प्रतिनिधियों को समिति में स्थान दिया जाए। इसके अलावा, केंद्रीय बीज समिति की अध्यक्षता कृषि सचिव द्वारा किए जाने और आईसीएआर के उप महानिदेशक (DDGs) को सह-अध्यक्ष बनाए जाने का सुझाव दिया गया।
3. “पंजीकरण” के स्थान पर “अधिसूचना और लिस्टिंग”
ड्राफ्ट में किस्मों की मंजूरी के लिए “पंजीकरण” शब्द का प्रस्ताव किया गया है, जिससे पीपीवी एंड एफआर अधिनियम (PPV&FRA) के तहत बौद्धिक संपदा आधारित किस्म पंजीकरण के साथ भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस परामर्श में “पंजीकरण” के स्थान पर “अधिसूचना और लिस्टिंग” शब्द के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया है। इससे नामकरण की मौजूदा प्रणाली बनी रहेगी और यह भी सुनिश्चित होगा कि सभी किस्में आईसीएआर के नेतृत्व वाले नेटवर्क के अंतर्गत कम से कम दो वर्षों तक मल्टी-लोकेशन वीसीयू (वैल्यू फॉर कल्टीवेशन एंड यूज) परीक्षण से गुजरें।
4. VCU और DUS परीक्षण
किसानों तक नवाचार को तेजी से पहुंचाने के लिए विशेषज्ञों ने निम्न सुझाव दिए हैं:
• समांतर परीक्षण: पीपीवी एंड एफआरए (PPV&FRA) के तहत DUS (डिस्टिंक्टनेस, यूनिफॉर्मिटी, स्टेबिलिटी) तथा इस अधिनियम के तहत VCU (वैल्यू फॉर कल्टिवेशन एंड यूज) से संबंधित आंकड़े एक साथ तैयार किए जाएं, ताकि व्यावसायीकरण की प्रक्रिया तेज हो सके।
• मान्यता प्राप्त अनुसंधान एवं विकास: मान्यता प्राप्त आरएंडडी सुविधाओं (श्रेणी-A) वाली कंपनियों द्वारा एक वर्ष में अपने स्तर पर तैयार किए गए आंकड़ों के साथ-साथ आईसीएआर (ICAR) के एक वर्ष के परीक्षण आंकड़ों को नई किस्मों की अधिसूचना के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए।
• डीएनए फिंगरप्रिंटिंग: एडवांस मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग के वर्तमान दौर में किस्मों की अधिसूचना के लिए डीएनए फिंगरप्रिंटिंग अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि उनकी पूर्ण आनुवंशिक पहचान सुनिश्चित हो सके। हालांकि, उपयुक्त मॉलिक्यूलर मार्कर और उनके संयोजन के चयन के लिए निरंतर रिसर्च सपोर्ट की आवश्यकता होगी।
5. “सीड विदाउट बॉर्डर्स” से जुड़े प्रावधान
भारत के बाहर किए गए परीक्षणों को मान्यता देने वाले प्रावधान - “सीड विदाउट बॉर्डर” - को पूरी तरह स्वीकार्य नहीं माना गया। इस पर सहमति बनी कि यदि ऐसे आंकड़ों को स्वीकार भी किया जाए, तो भारतीय परिस्थितियों में उनकी उपयुक्तता सुनिश्चित करने के लिए समान कृषि-जलवायु परिस्थितियों में भारत के भीतर कम से कम एक वर्ष का अनिवार्य परीक्षण किया जाना चाहिए।
6. मुआवजा और दंड
हालांकि ड्राफ्ट विधेयक में डीलरों द्वारा किए गए “मामूली” या “गंभीर” अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है, लेकिन खराब बीज गुणवत्ता के कारण किसानों को होने वाले फसल नुकसान के मुआवजे पर यह स्पष्ट रूप से मौन है। विशेषज्ञों ने अध्याय IX का नाम बदलकर “अपराध, दंड और मुआवजा” करने और किसानों के लिए स्पष्ट शिकायत निवारण दिशानिर्देश तय करने की सिफारिश की है। इसके अतिरिक्त, पंजीकृत किस्मों को गैर-अनुशंसित क्षेत्रों में बेचने को “मामूली” अपराध की श्रेणी से बढ़ाकर “लघु/गंभीर” अपराध की श्रेणी में शामिल करने का सुझाव दिया गया है।
7. प्रभावी निगरानी व्यवस्था
ड्राफ्ट विधेयक में बीज निरीक्षकों और विश्लेषकों के लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यताओं का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए। इसके तहत कम से कम कृषि में स्नातक डिग्री अनिवार्य की जाए तथा प्रत्येक पांच वर्ष में उनकी दक्षता जांच को भी अनिवार्य बनाया जाए।
निष्कर्ष
बीज विधेयक 2025, विकसित भारत–2047 के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें प्रस्तावित संशोधनों - विशेष रूप से राज्यों की भागीदारी, वैज्ञानिक सत्यापन और किसानों को मुआवजे - को शामिल करने से सरकार एक मजबूत और न्यायसंगत बीज पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर सकेगी, जो भारतीय किसानों को सशक्त बनाने के साथ-साथ बीज उद्योग के हितों की भी रक्षा करेगा।
(जाने-माने कृषि वैज्ञानिक, पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा TAAS के चेयरमैन तथा पूर्व महानिदेशक, ICAR एवं सचिव, DARE हैं।)