आश्रित कृषि को आत्मनिर्भर कृषि बना सकती है सहकारिता

रूरल वॉयस ने अपनी पहली वर्षगांठ पर 23 दिसंबर को किसान दिवस पर अवसर पर  नई दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में  रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड NEDAC अवार्ड्स 2021  का आयोजन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी थे।

आश्रित कृषि को  आत्मनिर्भर कृषि  बना सकती  है सहकारिता

रूरल वॉयस ने अपनी पहली वर्षगांठ पर 23 दिसंबर को किसान दिवस पर अवसर पर  नई दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में  रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड NEDAC अवार्ड्स 2021  का आयोजन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चौधरी थे।

दीप प्रज्ज्वलन समारोह के बाद, रूरल वॉयस के प्रधान संपादक हरवीर सिंह ने रूरल वॉयस के विकास में कृषि और सहकारिता के क्षेत्र की प्रतिष्ठित हस्तियों के योगदान को स्वीकार किया।

हरवाृीर सिंह ने कहा  "मुख्यधारा के मीडिया से कृषि और ग्रामीण क्षेत्र की आवाज ठीक से नहीं सुनी जाती है और इसी वजह से वेबसाइट ruralvoice.in और eng.ruralvoice.in की जरूरत पड़ी। इसके बाद मे इसमेऑडियो-विजुअल मीडिया और इसलिए रूरल वॉयस एग्रीटेक शो की भी शुरू किया गया। इसका उद्देश्य भारत की 60 फीसदी आबादी से जुड़ना है जो ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित है।

पैनल चर्चा में पहले सत्र का विषय "सहकारिता और किसान समूहों के माध्यम से कृषि और ग्रामीण समृद्धि" था। इसमें प्रो. रमेश चंद, सदस्य (कृषि), नीति आयोग, संदीप के नायक डीजी, एनपीसी,  देवेंद्र कुमार सिंह सचिव, सहकारिता मंत्रालय और इफको के एमडी डॉ. यूएस अवस्थी ने अपने विचार रखे। 

प्रो. चंद ने तटस्थ रुख के लिए रूरल वॉयस की सराहना की। उन्होंने कहा, 'ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आवाज आमतौर पर पक्षपाती होती है। अगरआप अपना तटस्थ रुख बनाए रखते हैं, तो आप लंबे समय में सफल होंगे।

उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय के गठन के कारण और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने  कहा कि हम अमूल जैसे मॉडलों को दूसरे क्षेत्रों में लागू करने में असफल रहे।  साहकारिता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। इसके लिए उत्तर भारतीय संस्कृति को दोष देना सही नहीं है, जैसा कि कई लोग इसको पसंद करते हैं।

प्रोफेसर रमेश चंद के अनुसार, सहकारिता जरूरी है क्योंकि बाजार हमेशा परिपूर्ण और प्रतिस्पर्धी नहीं होते हैं। बाजार की विफलता के मामले में, सहकारी समितियां शायद सबसे अच्छे विकल्पों में से हैं।उन्होंने अफसोस जताया कि जब आकार की बात आती है, तो  इफको,अमूल जैसी बड़ी सहकारी संस्था भी दुनिया की सबसे बड़ी सहकारी समितियों में नहीं आती है।  उन्होंने इसके अलावा, कृषि अर्थव्यवस्था ग्रामीण भारत के केवल 31-32 फीसदी तक सिमट गई है। इसलिए इनपुट लागत कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए सहयोग अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इनपुट लागत कम करें और किसानों की आय में वृद्धि करें।लेकिन चंद के अनुसार सहकारी समितियों की सबसे बड़ी भूमिका आश्रित कृषि  से आत्मनिर्भर कृषि में परिवर्तन करने में है।

संदीप नायक ने कहा कि “सहकारिता प्रणाली में बहने वाले ऋण में भारी कमी आई है। वाणिज्यिक बैंक जितना उधार देते हैं, यह उसका एक छोटा सा अंश है।” इसे एनसीडीसी और नाबार्ड द्वारा पूरा करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि हमें सहकारी समितियों को टेक स्टार्ट-अप से जोड़ने की जरूरत है।

सहकारिता सचिव देवेंद्र कुमार सिंह ने कहा: "हमने आईआईएम से सहकारी समितियों और सामूहिकों के व्यवसाय विकास के लिए सुझाव मांगे हैं"। इसी तरह आईआईटी से तकनीकी सुझाव मांगे गए हैं। उन्होंने एमएसएमई मंत्रालय में अपने उद्यमों के पंजीकरण के बारे में बात की। दिलचस्प बात यह है कि 86 श्रेणियों में 6000 सहकारी समितियों ने उद्यम मंच पर अपना पंजीकरण कराया है। इस प्रकार, वे खुद को उद्यमी मानते हैं।

सहकारिता सचिव ने कहा कि सहकारिता मंत्रालय का तीन आयामी फोकस है। पैक्स का कम्प्यूटरीकरण, सहकारी समितियों पर राष्ट्रीय नीति और सहकारिता को मुख्य धारा में लाना।

इफको के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. उदयशंकर अवस्थी कहा कि हमें इस बात पर गर्व किया कि इफको ने अपने संसाधनों पर विकास किया है, जिसे वे एक अनूठी उपलब्धि मानते हैं। लेकिन शहरी लोग इफको के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे क्योंकि यह "ग्लैमरस शहरों की बजाय  गांवों में काम करती है ।"

विश्व सहकारी मॉनिटर ने इफको को नंबर 1 और अमूल को नंबर 2 के रूप में स्थान दिया है। डॉ. अवस्थी ने कहा कि  हमें इस पर गर्व होना चाहिए लेकिन इस पर बहुत कम बात होती है।"

 हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। हर मॉडल सफल नहीं हो सकता है, लेकिन जो मायने रखता है वह है सोचने का तरीका। डॉ. अवस्थी ने कहा, "हमें सफल होने के लिए भारतीय तरीके को अपनाने की जरूरत है।"