एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस: छोटे किसानों के अनुकूल नीति बनाने पर शिवराज सिंह चौहान का जोर

‘एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन’ का 7वां संस्करण बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में शुरू हुआ। यह सम्मेलन कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा को एक साथ जोड़ने की दिशा में एक प्रमुख पहल है। इसका आयोजन पहली बार भारत में किया जा रहा है और इस वर्ष इसकी थीम ‘पावरिंग द ग्लोबल साउथ’ रखी गई है।

एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस: छोटे किसानों के अनुकूल नीति बनाने पर शिवराज सिंह चौहान का जोर

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि देश का किसान अब केवल ‘अन्नदाता’ ही नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा को अपनाकर ‘ऊर्जादाता’ भी बनने जा रहा है। बुधवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित तीन दिवसीय ‘7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस’ के उद्घाटन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि खेती और सौर ऊर्जा का संगम किसानों की आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग प्रशस्त कर रहा है। उन्होंने जोर दिया कि एग्रीवोल्टाइक नीति ऐसी होनी चाहिए, जो देश के 85 प्रतिशत से अधिक छोटे और सीमांत किसानों के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टाइक तकनीक के तहत एक ही खेत में ऊपर सौर पैनलों से बिजली पैदा की जा सकती है और नीचे फसलें उगाई जा सकती हैं। यह ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ जैसा सशक्त मॉडल है। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन और खेती में बिजली का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इसलिए खेती के साथ ऊर्जा उत्पादन को जोड़ना किसानों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम है।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि एक दौर था, जब भारत खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न आयात पर निर्भर था, लेकिन आज देश के अन्नदाताओं की मेहनत की बदौलत गेहूं और धान के सरकारी भंडार भरे हुए हैं। भारतीय कृषि क्षेत्र लगातार 4.5 प्रतिशत की मजबूत विकास दर बनाए हुए है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। कृषि उत्पादों का निर्यात 52.55 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। हाल ही में रबी सीजन 2026-27 की बुवाई भी शुरू हो गई है, जिसमें दलहन और तिलहन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

शिवराज सिंह चौहान ने वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के समक्ष जमीनी हकीकत स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत में औसत भूमि जोत का आकार मात्र 0.96 हेक्टेयर है और 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं। उनके पास इतनी जमीन नहीं है कि वे खेती छोड़कर केवल सौर ऊर्जा संयंत्र लगा सकें। इसलिए एग्रीवोल्टाइक मॉडल ऐसा होना चाहिए, जो छोटे किसानों के खेतों में व्यावहारिक रूप से सफल हो और कृषि उत्पादन किसी भी कीमत पर प्रभावित न हो। सौर पैनलों की ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और जुताई की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि किसान हर साल अपनी पसंद के अनुसार फसल और फसल चक्र बदल सकें।

चौहान ने व्यावहारिक चुनौतियों के समाधान पर जोर देते हुए कहा कि पैनलों से गिरने वाले वर्षा जल के सुरक्षित निकास और संचयन की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि खेतों में मिट्टी का कटाव न हो और पानी की हर बूंद का सदुपयोग किया जा सके। उन्होंने बिजली की खरीद, ग्रिड तक पहुंच और किसानों को समय पर पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

उन्होंने सुझाव दिया कि किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को इन परियोजनाओं से सक्रिय रूप से जोड़ा जाए। साथ ही, उपकरणों के संचालन, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण स्थानीय ग्रामीण युवाओं एवं महिलाओं को दिया जाए, ताकि गांवों में ही रोजगार के नए अवसर पैदा हों। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ देती है या अनुबंध समाप्त होने पर सौर पैनल हटाने पड़ते हैं, तो इसका वित्तीय या भौतिक बोझ किसान पर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए परियोजना शुरू होने से पहले ही जिम्मेदारियां तय की जानी चाहिए।

इस अवसर पर केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि 7वां एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस अब तक आयोजित छह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तुलना में सबसे बड़ा है। इसमें रिकॉर्ड भागीदारी के कारण अतिरिक्त हॉल की व्यवस्था करनी पड़ी।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 249 गीगावाट थी, जो अब बढ़कर 560 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। इसमें गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की स्थापित क्षमता 308 गीगावाट से अधिक हो गई है। इस क्षमता में पिछले ढाई वर्षों के दौरान ही 100 गीगावाट की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2012-13 में गैर-जीवाश्म ऊर्जा से उत्पादित बिजली की लागत लगभग 11 रुपये प्रति यूनिट थी, जो बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण अब घटकर 2.60 रुपये प्रति यूनिट रह गई है।

प्रह्लाद जोशी ने टेरी (TERI) के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि एग्रीवोल्टाइक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है। इस उपयुक्त भूमि में महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है।

उन्होंने कहा कि यदि इस उपयुक्त भूमि के मात्र 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएं स्थापित कर दी जाएं, तो भारत वर्ष 2050 तक अपनी अनुमानित बिजली मांग को पूरा करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ अध्ययनों में एग्रीवोल्टाइक व्यवस्था के तहत फसलों की पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

जोशी ने बताया कि प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। इससे किसानों को दिन में सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध कराने और रात में सिंचाई से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिली है।

उन्होंने घोषणा की कि सरकार जल्द ही पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण के तहत एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। उन्होंने कहा कि अध्ययनों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा हो सकते हैं। इससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार की तलाश में जिला मुख्यालयों और बड़े शहरों की ओर पलायन करने की मजबूरी कम होगी।

उद्घाटन समारोह में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाईक, भारत एवं भूटान में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव अतीश चंद्रा, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के महानिदेशक आशीष खन्ना उपस्थित रहे।

उद्घाटन सत्र के दौरान एग्रीवोल्टाइक से संबंधित तकनीकी उपकरणों और संचार सामग्रियों का भी विमोचन किया गया। इनका उद्देश्य किसानों और अन्य हितधारकों को खेत स्तर पर सटीक निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है। तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा किया जा रहा है। इसमें जर्मनी के पर्यावरण, जलवायु कार्रवाई, प्रकृति संरक्षण और परमाणु सुरक्षा मंत्रालय (BMUV) का सहयोग प्राप्त है। 

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