अंकटाड रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.2 फीसदी और 2022 में 6.7 फीसदी रहेगी

संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) रिपोर्ट, 2021 के मुताबिक इस साल वैश्विक विकास दर 5.3 फीसदी तक पहुंच जाएगी, जो पांच दशकों में लगभग इसकी सबसे तेज दर होगी। अगर भारत की बात करे तो इस साल आर्थिक विकास दर 7.2 फीसदी औऱ 2022 आर्थिक विकास दर 6.7 फीसदी होगी। लेकिन 6.7 फीसदी की विकास दर के बावजूद भारत अगले साल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा

अंकटाड रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.2 फीसदी और 2022 में 6.7 फीसदी रहेगी

संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) रिपोर्ट, 2021 में कहा गया है कि 2020 में शुरू हुए से सफल वैक्सीन रोल-आउट नीतिगत हस्तक्षेपों की निरंतरता और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की बदौलत इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था में उछाल आएगा। अंकटाड के मुताबिक 2020 में 3.5 फीसदी की गिरावट के बाद  इस साल वैश्विक विकास दर 5.3 फीसदी  तक पहुंच जाएगी, जो पांच दशकों में लगभग सबसे तेज वृद्धि  दर होगी। अगर  भारत की  बात करें तो 2021 में आर्थिक विकास दर 7.2 फीसदी औऱ  2022 में आर्थिक विकास दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन 6.7 फीसदी की विकास दर के बावजूद भारत अगले साल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

भारत में कोराना महामारी से उबरने के लिए आर्थिक लागत के कारण निजी खपत पर खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति पर  नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत में महामारी से पहले ही मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत पर थी यह कोराना महामारी के चलते कीमतों में अस्थायी गिरावट का कारण बना था ,लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ वैसे-वैसे खाद्य कीमतों में तेजी आई है वहीं दुसरी तरफ  निर्यात के कारण विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है। महामारी के कारण आपूर्ति की समस्याओं के बावजूद पेट्रोलियम की खपत और ऑटो बिक्री में लगातार सुधार के कारण  भारत तेजी से रिकवर कर रहा है।

अंकटाड की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दुनिया केअर्थव्यवस्था में जो रिकवरी आई है वह भौगोलिक और क्षेत्रीय आधार पर असमान रही है ।  मजबूत हो रही इस अर्थव्यवस्था में उच्च वर्ग के लोगों की इनकम में तो इजाफा हुआ है लेकिन मध्य वर्ग औऱ कम कमाने वाले संघर्ष कर रहे हैं।

बहुत से विकासशील देशों को वित्तीय स्वायत्तता की कमी और वैक्सीन तक पहुँच नहीं होने के कारण भी उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक अर्थव्यस्था में आ रहे  उछाल के साथ  विकसित और विकासशील देशो के अर्थव्य़वस्था के बीच एक लम्बी खाई बन रही है। 

अंकटाड की महासचिव रेबेका ग्रीनस्पैन ने कहा कि महामारी के दौर में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय तौर पर फैली आय में असमानताओं को रोका नहीं गया तो विकास लग्जरी लाइफ औऱ सुख और आनंद केवल कुछ लोग के पास ही सीमित रह जाएंगे।

कोराना महामारी से सबक लेते हुए अंकटाड ने प्रस्ताव दिया है कि  विकासशील देशों का समेकित ऋण राहत और यहां तक ​​कि कर्जो को माफ कर देना भी शामिल है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन, और व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में बेहतर नीति समन्वय बनाना साथ टीकाकरण के लिए विकासशील देशों को मजबूत तरीके से सहयोग देना  चाहिए।

रिपोर्ट के अनुसार  साल 2022 में  वैश्विक विकास दर  3.6 फीसदी रहने की शंका जताई है। साल 2020 से 22 तक  दुनिया को 13 ट्रिलियन डालर की हानि होने का अनुमान लगाया गया है। नीति-निर्माताओं ने समझदारी से काम नहीं लिया तो वृद्धि की दर अनुमानों से कम भी हो सकती है।

इस विज्ञप्ति में कहा गया है कि कोराना महामारी से दुनिया भर में,वैश्विक वित्तीय संकट (जीएफसी ) बढ़ा है खासतौर से विकासशील देशों को जिसमे मुख्य रूप से अफ्रिका और एशिया के देश सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

दुनिया पर आए इस संकट के झटके को छोड़ दिया जाय तो 2016 से लेकर 2019 में जो विकास दर थी वह साल 2030 तक लौटने की उम्मीद  है  यानि  कोरोना महामारी के पहले जो विकास दर प्रवृति थी वह भी अंसतोषजनक थी। 

महामारी से चार मुख्य सबक

अंकटाड रिपोर्ट, 2021 से कोराना महामारी से चार मुख्य सबक लेने की बात उभर कर आती है। सबसे पहले विकासशील देशों में वित्तीय लचीलेपन की कोई भी बात समय से पहले होनी चाहिए क्योंकि कई मामलों में वित्तीय निवेश करने का क्रम होता वह अस्थिर रहता है और ऊपर से कर्ज का बोझ असहनीय होता है। हालांकि 2020 में बढ़ते हुए बड़े त्रृण संकट से बचा गया था मगर विकासशील देशों की बाहरी कर्ज की स्थिरता बनी रही जिससे स्थिति और भी खराब हो गई।

विकासशील देशों पर कर्ज की अधिकता के बोझ को कम करने से बीते हुए दशक जैसी स्थिति ना बने इसके लिए ठोस ऋण राहत और कुछ मामलों में एकमुश्त कर्ज को माफ करने का करने का प्रस्ताव दिया है।

दूसरा, महामारी में इस बात पर आम सहमति देखी गयी की पब्लिक सेक्टर के हस्तक्षेप की जरूरत है, मगर उससे संबंधित सारे संसाधन उपाय पब्लिक  सेक्टर से जुड़े इस पर कम लोगो की सहमति है क्योकि पब्लिक सेक्टर इस तरह आपदा के समय जरूरी है मगर लम्बे समय के विकास के लिए इसकी जरूरत नही है।

रिपोर्ट के अनुसार  वैश्विक अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना जरुरी है क्योकि महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था मे जिन वजह से असमनाताएं बढ़ी है उस  राजनीतिक विचार स्थान के साथ उन प्रथाओं को समाप्त करने का आह्वान किया है।

तीसरा, बेहतर भविष्य निर्माण के लिए जरूरी सहायता प्रदान करने के लिए  महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में व्यवस्थित रूप से बहुत अधिक नीतिगत समन्वय की जरुरत है। जैसे 2008-09 के संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संरचना में सुधार का वादा किया गया था, मगर बड़े विकसित देशों  के विऱोध के चलते जल्दी ही उस रास्ते पर चलना छोड़ दिया गया ।

यहां तक कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में मौजूदा मज़बूत पुनर्बहाली के बावजूद, मूल्यों में टिकाऊ वृद्धि के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ विकसित देशों  द्वारा टीके पर छूट न देने के कारण विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा हाल के एक अनुमान के अनुसार, 2025 तक टीकाकरण की संचयी लागत 2.3 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी, जिसमें विकासशील देश इस लागत का बड़ा हिस्सा वहन करेगें।