गन्ना मूल्य बकाया भुगतान पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पीआईएल, राज्य सरकार को चार सप्ताह में देना होगा जवाब

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के चीनी मिलों पर बकाया गन्ना मूल्य भुगतान में देरी पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है। जनहित याचिका में कहा गया है कि चीनी मिलों किसाानों का समय भुगतान नहीं कर रही हैं और इसके चलते किसानों की मुश्किलें बढ़ी हैं। चीनी मिलों के साथ राज्य सरकार की मिलीभगत से ऐसा होने की बात याचिका में कही गई है। न्यायालय ने याचिका पर विचार करते हुए 6 जुलाई को राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने के लिए कहा है

गन्ना मूल्य बकाया भुगतान पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पीआईएल, राज्य सरकार को चार सप्ताह में देना होगा  जवाब
फाइल फोटो

उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों के चीनी मिलों पर बकाया गन्ना मूल्य भुगतान में देरी के मुद्दे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। याचिका में कोर्ट  को बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के किसानों के गन्ना मूल्य भुगतान  में देरी हो रही है। किसानों को उनके गन्ना मूल्य का समय से भुगतान न करके उन्हें उनके हक से  वंचित किया जा रहा है। यह जनहित याचिका गन्ना किसानों के गन्ना मूल्य भुगतान की समस्या के सामाधान के लिए और किसानों के हितों की रक्षा के लिए पुनीत कौर ढांडा ने दायर की है। इस जनहित याचिका में कहा गया है कि यह सब राज्य सरकार और चीनी मिल मलिकों की  मिलीभगत से हो रहा है ,क्योंकि गन्ना किसानों के गन्ना मूल्य के समय से भुगतान कराने में राज्य सरकार असफल रही है।  गन्ने की खेती में बढ़ती लागत को मद्देनज़र रखकर किसानों को गन्ने का सही मूल्य मिल सके, इसके लिए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में भी संशोधन नहीं किया है। महामारी के इस मुश्किल दौर में सरकार किसानों की मदद करने के बजाय चीनी मिल के मालिकों का साथ दे रही है और बेची गई उपज के भुगतान मे कुछ ज्यादा ही देरी हो रही है। इससे किसानों और उनके परिवारों को कई परेशनियों से जूझना पड रहा है। इसके अलावा राज्य सरकार एसएपी में संशोधन के मामले में भी बुरी तरह से विफल रही है जिससे किसानों की परेशानियां और बढ गई हैं। 

याचिकाकर्ता के वकील विनीत ढांडा ने रूरल वॉयस को बताया कि  किसानों के गन्ने मूल्य के बकाया पैसे का भुगतान  करने औऱ एसएपी को संशोधित करने के लिए दायर इस जनहित याचिका  को 6 जुलाई को मुख्य न्यायधीश मुनीश्वर नाथ भंडारी और न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल के समक्ष पेश किया गया। याचिका संख्या WP Civil 965/2021आइटम नंबर 17 के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। हाइकोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए सरकार से चार सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है।

विनीत ढांडा ने बताया कि माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका को संज्ञान में लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। साथ ही उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया  है कि वह अन्य पक्षकारों को भी इसमें शामिल करे।

यूपी के चीनी मिल  मालिक किसानों के गन्ना मूल्य के भुगतान में कुछ ज्यादा ही देर कर रहे हैं क्योंकि राज्य सरकार गन्ना किसानों  का भुगतान  सही समय पर सुनिश्चित नही करा पा रही है । इससे किसानों की परेशानी बढ़ गयी है।

याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कई अखबारों और डिजिटल मीडिया में प्रकाशित लेखों का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि 10 मई 2021 को एक अखबार में प्रकाशित एक लेख में यह स्पष्ट तौर से उल्लेख किया गया है कि भारत सरकार के खाद्य सचिव सुधांशु पान्डेय ने कहा था कि इस साल भारत का चीनी निर्यात काफी अच्छा रहा है। इस साल 50 लाख टन चीनी के निर्यात सौदे उस समय तक हो चुके थे। लेकिन चीनी मिलों को हो रहे बड़े फायदों के बावजूद गन्ना किसानों के हक के पैसे उन्हें नही मिल रहे हैं ।

याचिकाकर्ता ने 16 मई,2021 को न्यूज बेबसाइट रूरल वॉयस पर प्रकाशित एक न्यूज रिपोर्ट के हवाले से गन्ना मूल्य बकाया की जानकारी दी है। इस रिपोर्ट में का शीर्षक था, “ गन्ना किसानों का बकाया 12000 करोड के पार ; चीनी मिल कमा रही बंपर फायदा”।  साथ ही 17 मई,2021 को छपे लेख जिसका शीर्षक था “चीनी मिलों द्वारा गन्ना मूल्य भुगतान की एक रोचक दास्तान ;मलकपुर मिल ने गन्ना किसानों का शून्य भुगतान किया” को भी पेश किया है।

"महाराष्ट्र राज्य और उत्तर प्रदेश राज्य के बकाया  गन्ना मूल्य भुगतान के तुलनात्मक चार्ट" की भी एक कॉपी इस याचिका के साथ दी गई है ।

याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय से यह निवेदन किया है कि न्यायालय (i) इससे संबंधित अधिकारियों के लिए एक आदेश या निर्देश जारी करे कि वो जल्द से जल्द 2020-21- 2021 पेराई सीजन तक के उत्तर प्रदेश के चीनी मिलों के ऊपर लंबित गन्ना किसानों के बकाया गन्ना मूल्य का  भुगतान करें , जो 12,000 करोड़ रुपये से अधिक है (अगर ब्याज जोड़ा जाएं तो यह आंकडा लगभग 15,000 करोड़ रुपये); (ii) संबंधी अधिकारियों को एसएपी बढ़ाने का निर्देश या आदेश जारी करे; (iii) ऐसा आदेश या निर्देश जारी करे जिसे न्यायालय "उचित और सटीक" समझे।