जीएम चावल की कथित मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका, जल्द सुनवाई की मांग

जीएम फसलों पर 2024 के निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से तत्काल सुनवाई करने का आग्रह किया गया है। याचिका में आरोप है कि सरकार ने खरपतवार नाशक-सहिष्णु और जीन-एडिटेड चावल की किस्में जारी की हैं। इससे भारत की चावल आनुवंशिक विविधता और गैर-जीएम बासमती के निर्यात को खतरा होने की आशंका जताई गई है।

जीएम चावल की कथित मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका, जल्द सुनवाई की मांग
सुप्रीम कोर्ट से जीएम चावल से संबंधित एक अवमानना याचिका पर जल्द सुनवाई करने का आग्रह किया गया है। इस याचिका में केंद्र सरकार और वरिष्ठ अधिकारियों पर आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम एडिटेड) फसलों के संबंध में अदालत के निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है। यह मांग ऐसे समय की गई है, जब व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाए बिना खरपतवार नाशक-सहिष्णु जीएम बासमती चावल की किस्मों को खेती के लिए जारी किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
याचिकाकर्ता अरुणा रोड्रिग्स की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि खरपतवार नाशक-सहिष्णु जीएम बासमती चावल की खेती को अब मंजूरी दे दी गई है। इसलिए अवमानना याचिका पर जल्द सुनवाई की जानी चाहिए।
यह याचिका जीएम फसलों से संबंधित रोड्रिग्स की लंबे समय से चल रही जनहित याचिका का हिस्सा है। इसमें आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 23 जुलाई, 2024 के फैसले और इससे पहले दिए गए निर्देशों की जानबूझकर अवहेलना की है। मई में भी भूषण ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की थी। उस समय मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि वह इस अनुरोध पर विचार करेंगे।
जुलाई 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जीएम सरसों को जारी करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा 2022 में दी गई सशर्त मंजूरी की वैधता पर अलग-अलग राय व्यक्त की थी। हालांकि, न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह विशेषज्ञों, राज्य सरकारों और अन्य संबंधित पक्षों से परामर्श करके जीएम फसलों के अनुसंधान, खेती और व्यापार के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करे।
याचिका के अनुसार, मई 2024 में ‘रोबीनोवीड’ ब्रांड के तहत खरपतवार नाशक-सहिष्णु बासमती चावल की कथित व्यावसायिक शुरुआत हुई। इसके बाद मई 2025 में जीन-संपादित चावल की किस्में जारी की गईं। याचिका में डीआरआर राइस 100, जिसे ‘कमला’ के नाम से बेचा जाता है, और पूसा डीएसटी राइस 1 का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन किस्मों को व्यावसायिक रूप से जारी करना केंद्र सरकार द्वारा 2016-17 के दौरान अदालत को दिए गए उन आश्वासनों के विपरीत था, जिनमें कहा गया था कि इस मुद्दे पर न्यायिक विचार-विमर्श पूरा होने से पहले जीएम फसलों को पर्यावरण में जारी नहीं किया जाएगा।
याचिका में भारत के चावल जर्मप्लाज्म यानी आनुवंशिक संसाधनों के संभावित दूषित होने पर गंभीर चिंता जताई गई है। इसमें चावल की 80,000 से अधिक विशिष्ट आनुवंशिक प्रविष्टियों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चावल की उत्पत्ति और आनुवंशिक विविधता के प्रमुख केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को देखते हुए खरपतवार नाशक-सहिष्णु किस्मों को जारी करने के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। इससे 12 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के भारत के गैर-जीएम बासमती निर्यात कारोबार को भी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय नीति तैयार करने के अदालत के निर्देशों के बावजूद इन किस्मों को जारी किया गया। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने से भारत में जीएम और जीन-संपादित फसलों के नियमन से जुड़े ढांचे की फिर से गहन समीक्षा हो सकती है।

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